- कविता में धूप और छांव के प्रतीकों के माध्यम से जीवन के संघर्ष और उम्मीद की बात
- मंजिल की अनिश्चितता और धैर्य की आवश्यकता पर जोर
- प्रेम और विरह के अनुभवों के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा
-कठिनाइयों का सामना करते हुए हिम्मत न हारने का संदेश है।
Lokesh Shukla 11 घंटे
*** गीत ***धूप के तेवर बड़े संगीन से हैं
पाँव के छालों सफर रुकने न पाये
पांव छोटे, ज़िंदगी के सफ़र लम्बे
कौन जाने है कहां मंज़िल हमारी
*** गीत ***धूप के तेवर बड़े संगीन से हैं
पाँव के छालों सफर रुकने न पाये
पांव छोटे, ज़िंदगी के सफ़र लम्बे
कौन जाने है कहां मंज़िल हमारी
हो गया मुश्किल बहुत बचकर निकलना
हर तरफ बैठे मचानों पर शिकारी
छांव की तासीर भी चुभने लगी है
मन कभी पर हौसला चुकने न पाये
धूप के .....
कब तलक देते तसल्ली थके मन को
प्यास थोड़ी सी बुझाई आंसुओं ने
क्यूं मिलन की राह होती बहुत छोटी
औ' विरह के छोर थामे निर्जनों ने
दिन ढलेगा शाम आखिर आयेगी
आस्था का ये शिखर झुकने न पाये
धूप के.....
छांव सुधियों की कभी जब घेरती है
आहटों में पल वसंती डोलते हैं
मरुस्थलों में भी महक उठती हैं सांसें
प्रीत के पल माधुरी रस घोलते हैं
टूटते हालात में ये मौन रिश्ता
धैर्य रखना ये कभी मिटने न पाये
धूप के .......




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