- - बिहार में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी
- - नागरिकता सूचियों पर चर्चा हो रही है।
- - विशेषज्ञों का कहना है प्रक्रिया से लगभग 65 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूचियों से बाहर हो सकते
- - सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल
- -बिना दस्तावेज़ के मतदाताओं को हटाना लोकतंत्र के लिए खतरा
- - याचिकाकर्ताओं का तर्क नए दस्तावेज़ों से कई नागरिकों के मतदान के अधिकार पर खतरा
- - निपटारा बिहार की राजनीति के साथ देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
सोशल मीडिया पोस्ट से
Bhandari S.INC भंडारी सिनिंक@s_bhandari2·10h
बिहार में जो SIR की प्रक्रिया चल रही है- “मतदाता सूचि नहीं बल्कि नागरिकता सूचि बन रही है” आज की चर्चा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में चल रही SIR पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी और रिट पर संभावित निर्णय पर है। इस पर आदरणीय श्री @ShravanGarg सर ने आशंका जताई है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आधार कार्ड को नागरिकता के लिए अमान्य करार दिए जाने की टिप्पणी को से लगता है कि रिट का निर्णय चुनाव आयोग के पक्ष में हो सकता है। लेकिन चुनाव आयोग 8 करोड़ वोटर्स का पुनरीक्षण एक माह में कर सकता है, तो फिर नेता प्रतिपक्ष आदरणीय श्री
@RahulGandhi सर ने जो महादेवपुरा में भी मात्र 6 लाख वोटर्स की जाँच भी कम समय में कर सकता है। ऐसा करने से राहुल जी के आरोप की जाँच हो जाएगी कि वहाँ एक लाख से अधिक वोटर के नाम जोड़े गए हैं या नहीं, और साथ में यह भी जाँच हो जाएगी कि जो एक लाख से अधिक वोटर का नाम जुड़े है, वो सारे नाम सही हैं व भारतीय नागरिक हैं अथवा नही ?
Ocean Jainमहासागर जैन@ocjain4 ·Jul 26जुलाई 26
बड़ी खबर एनजीओ एडीआर ने फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, एसआईआर अभियान को रोकने की मांग की, "मतदाता उत्पीड़न" का हवाला दिया। ~ बिहार में 64 लाख फर्जी वोट के उजागर होने के बाद एसआईआर को रोकने के लिए जवाबी हलफ़नामा दायर किया गया ~ अवैध मतदाताओं को बाहर निकाले जाने पर विदेशी-वित्तपोषित एनजीओ क्यों घबरा रहे हैं
नई दिल्ली : 15अगस्त 2025:
बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। बिहार के लगभग 7.9 करोड़ मतदाताओं में से 6.5 करोड़ को बिना किसी नए दस्तावेज़ के पिछले रजिस्ट्रेशन के आधार पर चिन्हित किया गया है, जिससे यह मामला विवाद का विषय बन गया है। इस पुनरीक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत पहले 7 आवश्यक दस्तावेज़ के स्थान पर 11 दस्तावेजो को पेश करने की अनुमति दी गई है, जयह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रक्रिया मतदाता हितैषी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया के लिए आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया है, जिससे यह मुद्दा और भी विवादास्पद हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया से लगभग 65 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूचियों से बाहर हो सकते हैं, जिनका पंजीकरण अद्यतन नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि बड़ी संख्या में मतदाता बिना दस्तावेज़ हटा दिए जाते हैं, तो वे हस्तक्षेप कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य विधानसभा चुनाव नवंबर 2025 में होने वाले हैं, और ऐसे में यह प्रक्रिया तेज़ गति से पूरी की जानी चाहिए。
याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया के खिलाफ तर्क दिया है कि यह नागरिकों के मतदान के अधिकार को खतरे में डाल सकती है। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि दस्तावेज़ की संख्या बढ़ाने से जरूर समावेशी है, लेकिन बिहार में अधिकांश लोगों के पास आधार कार्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं। इस पर कोर्ट ने कहा है कि लोकतंत्र की जड़ों तक इस मुद्दे को समझना चाहिए।
बिहार में एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी है, जिसमें विभिन्न विवादास्पद बिंदुओं पर चर्चा की जा रही है। यह मामला न केवल स्थानीय राजनीति में बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। अदालत इस विषय पर अपने अगले आदेश की प्रतीक्षा कर रही है।
बिहार में जो SIR की प्रक्रिया चल रही है- “मतदाता सूचि नहीं बल्कि नागरिकता सूचि बन रही है” आज की चर्चा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में चल रही SIR पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी और रिट पर संभावित निर्णय पर है। इस पर आदरणीय श्री @ShravanGarg सर ने आशंका जताई है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आधार कार्ड को नागरिकता के लिए अमान्य करार दिए जाने की टिप्पणी को से लगता है कि रिट का निर्णय चुनाव आयोग के पक्ष में हो सकता है। लेकिन चुनाव आयोग 8 करोड़ वोटर्स का पुनरीक्षण एक माह में कर सकता है, तो फिर नेता प्रतिपक्ष आदरणीय श्री
@RahulGandhi सर ने जो महादेवपुरा में भी मात्र 6 लाख वोटर्स की जाँच भी कम समय में कर सकता है। ऐसा करने से राहुल जी के आरोप की जाँच हो जाएगी कि वहाँ एक लाख से अधिक वोटर के नाम जोड़े गए हैं या नहीं, और साथ में यह भी जाँच हो जाएगी कि जो एक लाख से अधिक वोटर का नाम जुड़े है, वो सारे नाम सही हैं व भारतीय नागरिक हैं अथवा नही ?
Ocean Jainमहासागर जैन@ocjain4 ·Jul 26जुलाई 26
बड़ी खबर एनजीओ एडीआर ने फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, एसआईआर अभियान को रोकने की मांग की, "मतदाता उत्पीड़न" का हवाला दिया। ~ बिहार में 64 लाख फर्जी वोट के उजागर होने के बाद एसआईआर को रोकने के लिए जवाबी हलफ़नामा दायर किया गया ~ अवैध मतदाताओं को बाहर निकाले जाने पर विदेशी-वित्तपोषित एनजीओ क्यों घबरा रहे हैं
नई दिल्ली : 15अगस्त 2025:
बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। बिहार के लगभग 7.9 करोड़ मतदाताओं में से 6.5 करोड़ को बिना किसी नए दस्तावेज़ के पिछले रजिस्ट्रेशन के आधार पर चिन्हित किया गया है, जिससे यह मामला विवाद का विषय बन गया है। इस पुनरीक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत पहले 7 आवश्यक दस्तावेज़ के स्थान पर 11 दस्तावेजो को पेश करने की अनुमति दी गई है, जयह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रक्रिया मतदाता हितैषी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया के लिए आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया है, जिससे यह मुद्दा और भी विवादास्पद हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया से लगभग 65 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूचियों से बाहर हो सकते हैं, जिनका पंजीकरण अद्यतन नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि बड़ी संख्या में मतदाता बिना दस्तावेज़ हटा दिए जाते हैं, तो वे हस्तक्षेप कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य विधानसभा चुनाव नवंबर 2025 में होने वाले हैं, और ऐसे में यह प्रक्रिया तेज़ गति से पूरी की जानी चाहिए。
याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया के खिलाफ तर्क दिया है कि यह नागरिकों के मतदान के अधिकार को खतरे में डाल सकती है। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि दस्तावेज़ की संख्या बढ़ाने से जरूर समावेशी है, लेकिन बिहार में अधिकांश लोगों के पास आधार कार्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं। इस पर कोर्ट ने कहा है कि लोकतंत्र की जड़ों तक इस मुद्दे को समझना चाहिए।
बिहार में एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी है, जिसमें विभिन्न विवादास्पद बिंदुओं पर चर्चा की जा रही है। यह मामला न केवल स्थानीय राजनीति में बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। अदालत इस विषय पर अपने अगले आदेश की प्रतीक्षा कर रही है।




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