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वीरेन्द्र कुमार सिंह, प्रमुख अधिवक्ता और पूर्व श्रमिक नेता: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता : भारत के कपड़ा उद्योग और कपास किसानों को समाप्त कर देगा

भारत को 18% भारी टैक्स वहीं बांग्लादेश 0% ड्यूटी के साथ खुले बाजार में व्यापार
भारतीय कपड़ा उद्योग पूरी तरह बंद होने की कगार पर पहुंच जाएगा।
भारत अमेरिका से कपास आयात करने का विकल्प चुनता तो देश के कपास किसानों का बाजार बर्बाद
भारतीय मिलें घरेलू कपास छोड़ अमेरिकी कपास खरीदने लगेंगी।
किसानों और श्रमिकों का एक साथ आना शक्तिशाली गठबंधन बन सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
कानपुर: 4 अगस्त 2026
वीरेन्द्र कुमार सिंह, एक प्रमुख अधिवक्ता और पूर्व श्रमिक नेता ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (India-US Trade Deal) को लेकर केंद्र सरकार पर आरोप कि इस भारतीय गारमेंट्स पर 18% का अमेरिकी टैरिफ (Tariff) लगाया गया है, जबकि मुख्य प्रतिस्पर्धी देश बांग्लादेश को अमेरिकी कपास (US Cotton) आयात करने की शर्त पर 0% ड्यूटी (टैरिफ) का लाभ मिल रहा है। की निरन्तरता मे कानपुर के वस्त्र उद्योग के संबंध में अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि कानपुर, जिसे कभी 'भारत का मैनचेस्टर' कहा जाता था, आज भी बुनाई उद्योग में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह शहर  देश के भीतर बल्कि विदेशों में भी वस्त्र और परिधान निर्यात करता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को "निंदनीय"  है, सरकार की किसी नीति या निर्णय से वस्त्र उद्योग और श्रमिकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी पूरे भारत में किसानों और कपड़ा श्रमिकों के साथ मिलकर आंदोलन छेड़ेगी। यह दर्शाता है कि यह मुद्दा केवल कानपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक राष्ट्रीय निहितार्थ हैं, खासकर कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में।
कानपुर से लेकर कोलकाता तक के कपड़ा श्रमिक इस मुद्दे पर एकजुट होंगे। उनका उद्देश्य मोदी सरकार के निर्णय को रोकने के लिए "बाध्य करना" है। यह एक महत्वपूर्ण बयान है क्योंकि यह विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के श्रमिकों के बीच संभावित सहयोग का संकेत देता है, जो एक बड़े और संगठित विरोध आंदोलन का रूप ले सकता है। कानपुर और कोलकाता दोनों ही भारत के ऐतिहासिक वस्त्र उद्योग के केंद्र रहे हैं, और इन दोनों शहरों के श्रमिकों का एक साथ आना सरकार पर काफी दबाव डाल सकता है।
 कानपुर का वस्त्र उद्योग "पूरब का मैनचेस्टर" कहा जाता था जिसका एक समृद्ध इतिहास रहा है, ब्रिटिश शासन के दौरान अपने चरम पर था और इसे । यहाँ की मिलें बड़े पैमाने पर उत्पादन करती थीं और लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करती थीं। स्वतंत्रता के बाद भी, कानपुर एक महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र बना रहा, लेकिन धीरे-धीरे बदलती आर्थिक नीतियों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कारण कई मिलें बंद हो गईं।
 कानपुर का बुनाई उद्योग आज भी जीवित है और महत्वपूर्ण है। यह छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों के रूप में विकसित हुआ है जो अभी भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में योगदान दे रहे हैं। ऐसे में, सरकार की कोई भी नीति जो इस उद्योग को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है, न केवल श्रमिकों के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकती है।
 श्रम अधिकारों और औद्योगिक नीति के बीच  स्पष्ट अन्तर है। एक तरफ, सरकार आर्थिक सुधारों और आधुनिकीकरण के नाम पर नीतियां लागू करती है, वहीं दूसरी ओर, इन नीतियों का सीधा प्रभाव श्रमिकों और उनके परिवारों पर पड़ता है। सिंह का बयान इस बात पर प्रकाश डालता है कि श्रमिक समुदाय अपने अधिकारों और आजीविका की रक्षा के लिए संगठित होने और विरोध करने के लिए तैयार है।
कांग्रेस पार्टी द्वारा किसानों और कपड़ा श्रमिकों के समर्थन में आंदोलन छेड़ने की घोषणा  महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दल इन मुद्दों को अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं। किसानों और श्रमिकों का एक साथ आना एक शक्तिशाली गठबंधन बना सकता है, जो सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
वीरेन्द्र कुमार सिंह का बयान कानपुर के वस्त्र उद्योग की वर्तमान स्थिति, सरकारी नीतियों के संभावित प्रभावों और श्रमिक आंदोलन की बढ़ती शक्ति को दर्शाता है। यह स्थिति भारत के औद्योगिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है, जहाँ श्रमिक और किसान अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष कर रहे हैं।

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