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الخميس، 29 يناير 2026

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाते हुए केंद्र और यूजीसी को जारी किया नोटिस: अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को

जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट
जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता
नियमों के दुरुपयोग की आशंका
सामान्य वर्गों के खिलाफ भेदभाव की संभावना
याचिकाएं मृत्युंजय तिवारी, अधिवक्ता विनीत जिंदल और राहुल दीवान ने कीं कीं दायर 

कानपुर 29 जनवरी 2026
नई दिल्ली: 29 जनवरी 2026
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाते हुए केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट है और इसके दुरुपयोग की आशंका अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश:
 मुख्य बिंदु
सुनवाई की पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची।
आदेश: यूजीसी के 2026 के नए रेगुलेशन (समानता संबंधी नियम) पर अगले आदेश तक रोक।
नोटिस: केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को जारी किया गया।
कारण:
जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता।
नियमों के दुरुपयोग की आशंका।
सामान्य वर्गों के खिलाफ भेदभाव की संभावना।
विवादित प्रावधान
नियम 3(सी): जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित।
आरोप:
गैर-आरक्षित वर्गों को संस्थागत सुरक्षा से बाहर रखा गया।
संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन।
याचिकाकर्ताओं के तर्क
याचिकाएं मृत्युंजय तिवारी, अधिवक्ता विनीत जिंदल और राहुल दीवान ने दायर कीं।
तर्क दिया गया कि नियम समाज को बांट सकते हैं और सभी वर्गों को समान संरक्षण नहीं देते।
अदालत से मांग की गई कि परिभाषा को जाति-निरपेक्ष और संविधान अनुरूप बनाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
नियम अस्पष्ट हैं और इनके गलत इस्तेमाल की आशंका है।
न्यायविदों की समिति द्वारा इन नियमों की समीक्षा का सुझाव।
अदालत ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी वातावरण होना चाहिए।
आगे की प्रक्रिया
अगली सुनवाई: 19 मार्च 2026।
तब तक यूजीसी के नए रेगुलेशन स्थगित रहेंगे।
केंद्र और यूजीसी को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश।
👉 यह मामला उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभाव-निवारण की परिभाषा को लेकर बेहद अहम है।
 इन याचिकाओं में कौन-कौन से संवैधानिक तर्क उठाए गए हैं और उनका कानूनी महत्व क्या है।
1. अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
मूल सिद्धांत: अनुच्छेद 14 कहता है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं कर सकता।
याचिकाकर्ताओं का तर्क:
यूजीसी के नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST और OBC तक सीमित है।
इससे सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों और शिक्षकों को समान संरक्षण नहीं मिलता।
यह "समानता के अधिकार" का उल्लंघन है क्योंकि भेदभाव किसी भी जाति के खिलाफ हो सकता है।
न्यायिक दृष्टिकोण:
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि अनुच्छेद 14 का मतलब है "समानता के लिए समान व्यवहार"।
अगर किसी वर्ग को सुरक्षा दी जाती है और दूसरे को नहीं, तो यह असमानता है।
2. अनुच्छेद 15 – भेदभाव का निषेध
मूल सिद्धांत: अनुच्छेद 15(1) कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
याचिकाकर्ताओं का तर्क:
यूजीसी का नियम केवल कुछ जातियों को ही भेदभाव से सुरक्षा देता है।
यह अनुच्छेद 15(1) के खिलाफ है क्योंकि इससे अन्य जातियों के खिलाफ भेदभाव को मान्यता मिल सकती है।
अनुच्छेद 15(4) और 15(5):
ये प्रावधान राज्य को SC, ST और OBC के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देते हैं।
लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि "विशेष प्रावधान" का मतलब यह नहीं कि अन्य वर्गों को सुरक्षा से बाहर कर दिया जाए।
3. अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
मूल सिद्धांत: गरिमामय जीवन का अधिकार।
तर्क:
शैक्षणिक संस्थानों में किसी भी प्रकार का भेदभाव छात्रों और शिक्षकों की गरिमा को प्रभावित करता है।
इसलिए परिभाषा को सीमित करना अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के रूप में भी देखा जा सकता है।
4. संवैधानिक संतुलन
याचिकाकर्ताओं का दृष्टिकोण:
संविधान का उद्देश्य है समावेशी समानता।
अगर नियम केवल कुछ जातियों को ही सुरक्षा देते हैं, तो यह "सकारात्मक भेदभाव" (affirmative action) की सीमा से बाहर चला जाता है।
संभावित न्यायिक प्रश्न:
क्या यूजीसी का नियम "समानता" को बढ़ावा देता है या "नया भेदभाव" पैदा करता है?
क्या अनुच्छेद 15(4) और 15(5) का उपयोग करके अन्य वर्गों को सुरक्षा से बाहर किया जा सकता है?
👉 यह मामला भारतीय संविधान में समानता बनाम सकारात्मक भेदभाव की बहस को फिर से सामने लाता है।
इंदिरा साहनी (1992) और एन.एम. थॉमस (1976) दोनों ही फैसले भारतीय संविधान में “समानता बनाम आरक्षण” की बहस को दिशा देने वाले ऐतिहासिक निर्णय हैं। इंदिरा साहनी केस ने आरक्षण की सीमा और ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा तय की, जबकि एन.एम. थॉमस केस ने यह स्पष्ट किया कि समान अवसर का मतलब है असमान परिस्थितियों में भी न्यायसंगत अवसर देना।
1. इंदिरा साहनी केस (1992) – मंडल आयोग विवाद
पृष्ठभूमि:
मंडल आयोग ने OBC के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की थी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर होना चाहिए, जाति-आधारित नहीं।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (9-न्यायाधीश पीठ):
आरक्षण की सीमा: कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता।
क्रीमी लेयर: सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों में भी आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
अनुच्छेद 16(4): राज्य को पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण देने का अधिकार है, लेकिन यह “समान अवसर” के सिद्धांत के साथ संतुलित होना चाहिए।
महत्व:
इस केस ने आरक्षण नीति को स्थायी रूप से आकार दिया।
पहली बार “क्रीमी लेयर” की अवधारणा लागू हुई।
यह स्पष्ट किया गया कि आरक्षण का उद्देश्य है समानता लाना, न कि असमानता को स्थायी करना।
2. एन.एम. थॉमस केस (1976) – समान अवसर की व्याख्या
पृष्ठभूमि:
केरल सरकार ने SC/ST कर्मचारियों को पदोन्नति के लिए आवश्यक परीक्षा पास करने में अतिरिक्त समय दिया।
अन्य कर्मचारियों ने इसे अनुच्छेद 16(1) (समान अवसर) का उल्लंघन बताया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (7-न्यायाधीश पीठ):
अनुच्छेद 16(1) और 16(4): कोर्ट ने कहा कि 16(4) कोई अपवाद नहीं बल्कि 16(1) का विस्तार है।
समान अवसर का अर्थ: समान अवसर का मतलब है कि पिछड़े वर्गों को उनकी वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए न्यायसंगत अवसर दिया जाए।
सकारात्मक भेदभाव: कोर्ट ने माना कि विशेष प्रावधान बनाना असमानता नहीं, बल्कि वास्तविक समानता की ओर कदम है।
महत्व:
इस केस ने “समानता” की व्याख्या को औपचारिक समानता (formal equality) से आगे बढ़ाकर वास्तविक समानता (substantive equality) तक विस्तारित किया।
यह फैसला बाद के सभी आरक्षण मामलों की नींव बना।
3. दोनों फैसलों का तुलनात्मक महत्व
पहलू इंदिरा साहनी (1992)एन.एम. थॉमस (1976)
मुख्य मुद्दा OBC आरक्षण और क्रीमी लेयर SC/ST पदोन्नति में छूट
अनुच्छेद 16(4), 14 16(1), 16(4), 15(4)
निर्णय आरक्षण 50% से अधिक नहीं; क्रीमी लेयर बाहर 16(4) अपवाद नहीं, बल्कि 16(1) का विस्तार
समानता की व्याख्या संतुलित समानता (आरक्षण + सीमा) वास्तविक समानता (सकारात्मक भेदभाव)
प्रभाव आरक्षण नीति का स्थायी ढांचा समानता की व्यापक व्याख्या
4. वर्तमान संदर्भ में महत्व
इंदिरा साहनी: आज भी आरक्षण की सीमा और क्रीमी लेयर का सिद्धांत इसी केस से तय होता है।
एन.एम. थॉमस: यह केस बताता है कि समानता का मतलब है समान परिणाम पाने का अवसर, न कि केवल समान नियम।
दोनों फैसले मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि संविधान का उद्देश्य है समावेशी समानता – यानी सभी वर्गों को न्यायसंगत अवसर देना।
 सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी नियमों पर दी गई रोक को किस संवैधानिक परंपरा से जोड़ा जा सकता है और यह इंदिरा साहनी तथा एन.एम. थॉमस जैसे ऐतिहासिक फैसलों से कैसे मेल खाता है।
1. संवैधानिक परंपरा: समानता बनाम सकारात्मक भेदभाव
भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14 और 15 का मूल उद्देश्य है सभी नागरिकों को समान संरक्षण देना।
लेकिन साथ ही, अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) राज्य को यह अधिकार देते हैं कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान बना सके।
इस संतुलन को ही सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार परिभाषित किया है:
एन.एम. थॉमस केस (1976): समान अवसर का मतलब है वास्तविक समानता, यानी पिछड़े वर्गों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार अतिरिक्त अवसर देना।
इंदिरा साहनी केस (1992): सकारात्मक भेदभाव की सीमा तय की गई (50% आरक्षण सीमा, क्रीमी लेयर का सिद्धांत)।
2. यूजीसी नियमों पर रोक और इन फैसलों का संबंध
यूजीसी नियमों में समस्या: जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST और OBC तक सीमित थी।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता: इससे सामान्य वर्गों के खिलाफ भेदभाव को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।
संवैधानिक परंपरा का अनुसरण:
कोर्ट ने एन.एम. थॉमस की भावना को ध्यान में रखते हुए कहा कि समानता का मतलब है सभी को न्यायसंगत अवसर देना।
साथ ही इंदिरा साहनी की तरह यह भी स्पष्ट किया कि सकारात्मक भेदभाव की सीमा है—यह किसी अन्य वर्ग को सुरक्षा से बाहर नहीं कर सकता।
3. न्यायिक दृष्टिकोण का सार
सुप्रीम कोर्ट यह सुनिश्चित कर रही है कि भेदभाव-निवारण की परिभाषा जाति-निरपेक्ष हो।
यह कदम संविधान की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें:
विशेष प्रावधान बनाए जा सकते हैं, लेकिन
समानता का अधिकार सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित रहना चाहिए।
4. निष्कर्ष
याचिकाओं का मुख्य संवैधानिक आधार है कि भेदभाव की परिभाषा जाति-निरपेक्ष होनी चाहिए।
अनुच्छेद 14 और 15 दोनों ही यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी नागरिकों को समान संरक्षण मिले।
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि यूजीसी का नियम "संवैधानिक विशेषाधिकार" है या "संवैधानिक उल्लंघन"।
यूजीसी नियमों पर रोक लगाना इस बात का संकेत है कि अदालत “समावेशी समानता” की परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
यह परंपरा एन.एम. थॉमस के फैसले से शुरू हुई और इंदिरा साहनी में परिपक्व हुई।
वर्तमान मामले में अदालत उसी संवैधानिक धारा का अनुसरण कर रही है—जहाँ समानता का अधिकार और सकारात्मक भेदभाव दोनों का संतुलन आवश्यक है।


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