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السبت، 31 يناير 2026

सजा देना केवल न्यायपालिका का अधिकार पुलिस का नहीं:इलाहाबाद हाईकोर्ट

पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाये कानून के शासन एवं सांविधानिक मर्यादाओं के खिलाफ
राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को सख्त दिशा-निर्देश जारी
अपर मुख्य सचिव (गृह) व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये तलब
अनदेखी पर अवमानना की कार्यवाही
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका तय
पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई, संदेह होता है
कानपुर 31 जनवरी 2026
इलाहाबाद 30 जनवरी 2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि सजा देना केवल न्यायपालिका का अधिकार है, पुलिस का नहीं। पैरों में गोली मारने जैसी "सज़ा देने वाली" कार्रवाई को कोर्ट ने कानून के शासन और संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ माना। यह मामला न्यायपालिका और पुलिस की भूमिकाओं के बीच संतुलन को लेकर बहुत महत्वपूर्ण है।
मुख्य बिंदु
न्यायपालिका का अधिकार: कोर्ट ने दोहराया कि किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल अदालतों के पास है।
पुलिस की भूमिका पर सवाल: छोटे अपराधों (जैसे चोरी, लूट) में भी पुलिस द्वारा पैरों में गोली मारने की घटनाओं पर कोर्ट ने संदेह जताया, खासकर जब किसी पुलिसकर्मी को चोट नहीं लगी।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश:
मुठभेड़ में मौत या गंभीर चोट पर तुरंत एफआईआर दर्ज हो।
जांच स्वतंत्र एजेंसी (CBCID या अन्य थाने) से कराई जाए।
घायल व्यक्ति का बयान मजिस्ट्रेट/मेडिकल अधिकारी के सामने दर्ज हो।
मुठभेड़ के तुरंत बाद पुलिसकर्मियों को कोई पुरस्कार या पदोन्नति न दी जाए।
उल्लंघन पर मुठभेड़ करने वाली टीम और जिले के पुलिस प्रमुख अदालत की अवमानना के जिम्मेदार होंगे।
सरकारी आश्वासन: अपर मुख्य सचिव (गृह) और डीजीपी ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन कराने के लिए सर्कुलर जारी किए गए हैं और उल्लंघन पर कार्रवाई होगी।
महत्व
 आदेश पुलिस की "एनकाउंटर संस्कृति" पर एक सख्त संदेश है कि भारत का लोकतंत्र संविधान के अनुसार ही चलेगा। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाएँ तय हैं, और पुलिस को "सज़ा देने" का अधिकार नहीं है।

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