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Monday, November 3, 2025

शशि थरूर का राहुल पर 'सीधा हमला': विपक्ष को कांग्रेस और राजद पर हमला करने का अवसर

 भारत की राजनीति में वंशवाद को "लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा"
दलों में वंशवादी राजनीति की आलोचना 
भाजपा का नाम नहीं 
राजनीतिक नेतृत्व को जन्मसिद्ध अधिकार मानने की प्रवृत्ति शासन  गुणवत्ता को  करती प्रभावित
थरूर की स्पष्टता के  परिणाम  दिलचस्प होगे
कानपुर 3 नवंबर 2025
नई दिल्ली: 3 नवंबर 2025 शशि थरूर के वंशवाद पर लेख ने बिहार चुनाव से पहले भाजपा को कांग्रेस और राजद पर हमला करने का नया अवसर दिया है। उन्होंने कई दलों में वंशवादी राजनीति की आलोचना की, लेकिन भाजपा का नाम नहीं लिया।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपने लेख "Indian Politics and Family Business" में भारत की राजनीति में वंशवाद को "लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा" बताया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व को जन्मसिद्ध अधिकार मानने की प्रवृत्ति शासन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
🔍 थरूर के लेख की मुख्य बातें:
नेहरू-गांधी परिवार को उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा तक सूचीबद्ध किया।
उन्होंने लिखा कि वंशवादियों को लगातार चुनावी हार के बावजूद शीर्ष नेतृत्व में बने रहने की सुविधा मिलती है।
थरूर ने यह भी कहा कि भारतीय राजनीतिक दल बड़े पैमाने पर व्यक्तित्व-चालित हैं, और नेतृत्व चयन की प्रक्रिया अक्सर अपारदर्शी होती है।
उन्होंने यह आरोप लगाया कि निर्णय एक छोटे गुट या एक ही नेता द्वारा लिए जाते हैं, जिससे योग्यता की बजाय भाई-भतीजावाद हावी हो जाता है।
🧭 किन दलों का उल्लेख किया गया:
थरूर ने कांग्रेस के अलावा कई क्षेत्रीय दलों में वंशवाद की मिसालें दीं:
बीजू जनता दल (ओडिशा)
शिवसेना (महाराष्ट्र)
समाजवादी पार्टी (उत्तर प्रदेश)
लोक जनशक्ति पार्टी (बिहार)
अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार (जम्मू-कश्मीर)
अकाली दल (पंजाब)
के. चंद्रशेखर राव का परिवार (तेलंगाना)
करुणानिधि-स्टालिन परिवार (तमिलनाडु)
🔥 भाजपा की प्रतिक्रिया:
भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इस लेख को "नेपो किड्स" पर सीधा हमला बताया, जिसमें राहुल गांधी और तेजस्वी यादव को निशाना बनाया गया।
उन्होंने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा कि थरूर की इतनी स्पष्टता के क्या परिणाम होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
थरूर ने भाजपा में वंशवाद के मामलों का उल्लेख नहीं किया, जिससे भाजपा को यह मुद्दा कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के खिलाफ इस्तेमाल करने का मौका मिला है — खासकर बिहार चुनाव के ठीक पहले

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