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इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ: संपत्ति विवाद के चलते बिजली कनेक्शन रोकना गलत

खंडपीठ ने रायबरेली के राकेश कुमार मिश्रा की याचिका पर सुनवाई
बिजली का अधिकार संविधान अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा
बिजली का अधिकार अनुच्छेद 14 के तहत गरिमापूर्ण, आश्रय, स्वास्थ्य और शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा


कानपुर: 22 अक्टूबर 2026
लखनऊ: 22 अक्टूबर 2026
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ संपत्ति के मालिकाना हक के विवाद (दीवानी मुकदमा) के लंबित होने के आधार पर बिजली कनेक्शन देने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि बिजली तक पहुंच का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा है।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने रायबरेली के राकेश कुमार मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए बिजली विभाग के 28 जुलाई 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें स्वामित्व दस्तावेजों की कमी का हवाला देकर कनेक्शन देने से मना कर दिया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने बिजली विभाग द्वारा कनेक्शन देने से इनकार करने के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही विभाग को निर्देश दिया कि वह मामले पर 10 दिनों के भीतर पुनर्विचार करे। संपत्ति को लेकर विवाद लंबित होने मात्र से किसी व्यक्ति को बुनियादी सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता। बिजली कनेक्शन के मामले में संबंधित विभाग को कानूनी और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
इस ऐतिहासिक फैसले के मुख्य बिंदु नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट किए गए हैं:

महत्वपूर्ण पहलून्यायालय का निर्णय / दिशा-निर्देश
संवैधानिक दर्जाबिजली का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 14 के तहत एक गरिमापूर्ण जीवन, आश्रय, स्वास्थ्य और शिक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा माना गया है।
वैकल्पिक दस्तावेजविद्युत आपूर्ति संहिता, 2005 के क्लॉज 4.4 के अनुसार, यदि आवेदक क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bond / फॉर्म) और आवश्यक शर्तें मानने को तैयार है, तो उसे नया कनेक्शन दिया जा सकता है।
विभाग की सीमाएंबिजली अधिकारियों का काम केवल कानूनी कब्जे और तकनीकी/सुरक्षा मानदंडों की जांच करना है, न कि निजी मालिकाना हक या दीवानी विवादों का फैसला करना।
अधिकारों की शर्तेंयह अधिकार मुफ्त या असीमित बिजली का बिना शर्त अधिकार नहीं देता है। उपभोक्ता को लागू शुल्क, तकनीकी नियम और सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा।
अदालत का निर्देशहाई कोर्ट ने संबंधित अधिशासी अभियंता (Executive Engineer) को 10 दिनों के भीतर आवेदन पर नया विचार करने और मंजूरी मिलने पर तुरंत कनेक्शन देने का आदेश दिया है।

यह फैसला उन सभी वैध निवासियों को बड़ी राहत देता है जो पारिवारिक या दीवानी विवादों के कारण बुनियादी सुविधाओं से वंचित कर दिए जाते हैं।अनुच्छेद 14 भारत के हर व्यक्ति को विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण का अधिकार देता है, जिसमें राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ कानून के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 14 क्या कहता है?राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा।
राज्य किसी भी व्यक्ति को कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
दो मुख्य तत्व
1. विधि के समक्ष समता (Equality Before Law)सभी व्यक्ति कानून की नजर में समान हैं।
किसी को विशेषाधिकार नहीं दिया जा सकता।

यह एक नकारात्मक अवधारणा है — विशेष लाभों का अभाव।
2. विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws)समान परिस्थितियों में सभी के साथ समान व्यवहार।
यह एक सकारात्मक अवधारणा है — राज्य को सक्रिय रूप से समानता सुनिश्चित करनी होती है।
स्रोत और पृष्ठभूमि“Equality before law” की अवधारणा ब्रिटिश संविधान से ली गई है।
“Equal protection of laws” की अवधारणा अमेरिकी संविधान से ली गई है।
न्यायालय की व्याख्याअनुच्छेद 14 मनमाने राज्य कार्यों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने EP Royappa (1974) और Maneka Gandhi (1978) में कहा कि मनमानी और समानता एक-दूसरे के विरोधी हैं।
अनुच्छेद 14 का महत्वयह भारतीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है।
नागरिकों और विदेशियों दोनों पर लागू होता है।
समानता सुनिश्चित करने के लिए तर्कसंगत वर्गीकरण की अनुमति देता है, बशर्ते वह मनमाना न हो।
अनुच्छेद 14 भारतीय संविधान में समानता के अधिकार की आधारशिला है और विधि के शासन की मूल अवधारणा को स्थापित करता है।

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