चांद देखने की पुष्टि बिहार और असम से
विशेष नमाज़ों का आयोजन
सहरी का समय सुबह 5:36 बजे और इफ्तार का समय शाम 6:15 बजे
उपवास के दिन फ़ज्र की नमाज़ से पहले खाने के सेवन को सुहूर या सेहरी
शाम को सूर्यास्त के बाद रोज़ा खोल कर खाते हैं जिसे इफ़्तारी
नई दिल्ली : फ़रवरी 19, 2026
भारत में रमज़ान 2026 की शुरुआत 19 फरवरी को पहले रोज़े के साथ हुई, जिसकी आधिकारिक घोषणा दिल्ली की जामा मस्जिद से की गई। इस साल चांद देखने की पुष्टि बिहार और असम से हुई, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया कि पहला रोज़ा 19 फरवरी को रखा जाएगा.
मस्जिद के इमामों ने चांद के दीदार की पुष्टि की और सभी को रमज़ान के महीने की बधाई दी। रमज़ान महीने में मुसलमान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं और इस दौरान विशेष नमाज़ों का आयोजन किया जाता है.
इस साल रमज़ान 29 या 30 दिनों तक चलेगा, जिसके बाद शव्वाल का महीना शुरू होगा, जब ईद-उल-फितर मनाई जाएगी। रमज़ान का चांद देखने की तिथि हर साल अलग-अलग होती है, जो चांद की स्थिति पर निर्भर करती है, और इस साल के लिए यह 19 फरवरी को स्थापित की गई.
इस विशेष दिन की शुरुआत में सहरी का समय सुबह 5:36 बजे और इफ्तार का समय शाम 6:15 बजे निर्धारित किया गया है.
भारत में रमज़ान का पवित्र महीना 19 फरवरी से शुरू हुआ है और यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवधि है, जिसमें मुसलमान उपवास, नमाज, और दान जैसे धार्मिक कार्य करते हैं।
ईद
ईद उल-फ़ित्र है, जो रमज़ान माह के अन्त और शव्वाल माह के पहले दिन मनाई जाती है. रमज़ान के आखरी दिन चाँद (हिलाल) देख कर अगले दिन ईद घोषित किया जाता है. यानी नया चाँद देख कर किया जाता है. अगर अगर चन्द्रमा का दर्शन नहीं हो पाया तो उपवास के तीस दिनों के पूरा होने के बाद घोषित किया जाता है।
रमजान का महीना कभी 29 दिन का तो कभी 30 दिन का होता है। इस महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग उपवास रखते हैं। उपवास को अरबी में "सौम" कहा जाता है, इसलिए इस मास को अरबी में माह-ए-सियाम भी कहते हैं। फ़ारसी में उपवास को रोज़ा कहते हैं। भारत के मुसलिम समुदाय पर फ़ारसी प्रभाव ज़्यादा होने के कारण उपवास को फ़ारसी शब्द ही उपयोग किया जाता है।
उपवास के दिन फ़ज्र की नमाज़ से पहले खाने के सेवन को सुहूर या सेहरी कहते हैं। दिन भर न कुछ खाते हैं न पीते हैं। शाम को सूर्यास्तमय के बाद रोज़ा खोल कर खाते हैं जिसे इफ़्तारी कहते हैं।
मुस्लिम समुदाय में रमजान को लेकर निम्न बातें अक्सर देखी जाती हैं।
रमज़ान को नेकियों या पुन्यकार्यों का मौसम-ए-बहार (बसंत) कहा गया है। रमजान को नेकियों का मौसम भी कहा जाता है। इस महीने में मुस्लमान अल्लाह की इबादत (उपासना) ज्यादा करता है। अपने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ, कुरआन परायण, दान धर्म करता है।यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। पैगम्बर मोहम्मद सल्ल. से आपके किसीसहाबी (साथी) ने पूछा- अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो क्या करें। तो हज़रत मुहम्मद ने जवाब दिया कि एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए।
यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और नादार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदकए फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है।
जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमें कंजूसी नहीं करना चाहिए। अल्लाह की राह में खर्च करना अफज़ल है। ग़रीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यों न हो, उनकी मदद करने की शिक्षा दी गई है। दूसरों के काम आना भी एक इबादत समझी जाती है।
ज़कात, सदक़ा, फ़ित्रा, खैर ख़ैरात, ग़रीबों की मदद, दोस्त अहबाब में जो ज़रुरतमंद हैं उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है।
अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने गुनाहों को कम और नेकियों को ज़्यादा करदेता है।
मुहम्मद (सल्ल) ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे रमजान आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है।क्या हैं सहरी और इफ़्तार
सूर्योदय फ़ज्र की नमाज़ की अज़ान से पहले कुछ खान पान कर लेते हैं, खजूर या अन्य मनपसंद चीज खाई जाती है जिसे सहरी कहा जाता है. वहीं, इफ़तार सूर्य अस्त होने के बाद इफ्तार किया जाता है.
x




No comments:
Post a Comment