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Saturday, February 28, 2026

अमर बलिदानी चंद्रशेखर आजाद का पैतृक गांव - भौती कानपुर नगर

आजाद का पैतृक आवास आजाद के ताऊ गुमानीलाल तिवारी के प्रपौत्र के संरक्षण में
भौती में वर्षों वर्ष अमर शहीद आजाद जयंती एवं शहादत दिवस मनाया जाता रहा
भौती प्रतापपुर प्राथमिक विद्यालय के पूर्वी भाग में आजाद चबूतरा
मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी भौती मे आए और आजाद के चित्र पर माल्यार्पण कर संबोधन किया था
 शव प्राप्त कर अंतिम संस्कार करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री शिवविनायक मिश्र
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री शिवविनायक मिश्र की पुस्तक मे पैतृक निवास भौती कानपुर नगर
अनूप शुक्ला महासचिव,कानपुर इतिहास समिति की कानपुर सोशल मीडिया पोस्ट से
कानपुर: फरवरी 27, 2026
Anoop Shukla 17 घंटे
अमर बलिदानी चंद्रशेखर आजाद का पैतृक गांव - भौती
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आज शहीद-ए-आजम चंद्रशेखर आजाद का शहादत दिवस है । अतः उनकी शहादत को नमन करने के लिए मैंने सुबह-सुबह उनके पैतृक गांव भौती कानपुर जाने का निर्णय लिया । कानपुर शहर के पश्चिमी छोर पर शहर से से सटा हुआ भौती है । भौती में आजाद का पैतृक आवास आजाद के ताऊ गुमानीलाल तिवारी के प्रपौत्र के संरक्षण में है । इसके साथ ही भौती प्रतापपुर प्राथमिक विद्यालय के पूर्वी भाग में आजाद चबूतरा है जो अब बदहाल और अतिक्रमण का शिकार है ।
कानपुर के लब्ध प्रतिष्ठित समाजसेवी एवं साहित्यकार कवि विकास बाजपेई के प्रयास से भौती में वर्षों वर्ष अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की जयंती एवं शहादत दिवस मनाया जाता रहा । उन्होंने "आजाद और भौती" शीर्षक से लघु पुस्तक भी लिखी थी जिसका अवलोकन कभी मैंने भी किया था जो अब अनुपलब्ध है । भौती के मूल निवासी वरिष्ठ साहित्यकार व कवि श्री अशोक बाजपेई ने बताया की अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी जो मूल रूप से भौती के ही रहने वाले थे वह दो भाई थे । गुमानी लाल उनके बड़े भाई थे । पंडित सीताराम जी का पहला विवाह भौती के पास ही पिपरा सुरार में हुआ था । दूसरा विवाह बदरका उन्नाव में जगरानी देवी से हुआ । कालांतर में गुमानीलाल जी कमाने के लिए कोलकाता चले गए और सीताराम जी अपनी पत्नी के आग्रह पर ससुराल बदरका गए जहां पर वह सफल नहीं रहे और कमाने के लिए मध्यप्रदेश चले गए । सुकवि विकास बाजपेई से जुड़ कर के आजाद की स्मृति रक्षा प्रयास में जुटे रहे श्री सियाराम शुक्ल एवं श्री सतीशचंद्र तिवारी ने बताया कि अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के पिता श्री सीताराम तिवारी कश्यप गोत्र के दमा के तिवारी थे । उनके बड़े भाई गुमानी लाल तिवारी का परिवार आज भी आबाद है । गुमानी लाल जी के बेटे रामशंकर हुए और उनके बेटे उमाशंकर थे । उमाशंकर जी के 3 पुत्र भानु प्रकाश प्रकाश चंद्र व माधव प्रकाश हुए जिनमें से भानु प्रकाश व प्रकाश चंद सपरिवार भौती में आज भी रहते हैं और माधव प्रकाश जी का निधन हो चुका है । आजाद का पैतृक आवास उन्हीं के पास है जिसमें कुछ लोग किराए पर रहते हैं । उन्होंने बताया कि विकास बाजपेई के प्रयास से आजाद के पैतृक आवास को तीर्थ बनाने की योजना शुरू हुई जो मुख्य मार्ग पर आजाद चबूतरे से शुरू हुई । आजाद स्मृति आयोजनों में सियाराम शुक्ल सतीश चंद्र तिवारी अशोक बाजपेई प्रतापनारायण बाजपेई राजेंद्र प्रसाद तिवारी आदि लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे । आजाद चबूतरे से सन 1970 से लेकर 1990 तक वर्षों वर्ष आजाद स्मृति में आयोजन होते रहे लेकिन वर्तमान में आजाद चबूतरे पर गांव के ही चौहानो ने कब्जा कर मंदिर बना दिया है । श्री सतीश चंद्र तिवारी बताया कि प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी जब किसान नगर का उद्घाटन करने आए वापसी में विकास बाजपेई जी के आग्रह पर आजाद के पैतृक गांव भौती मे भी आए और आजाद के चित्र पर माल्यार्पण कर संबोधन में दिया था सतीश तिवारी ने बताया कि मुख्यमंत्री जी को इतनी माला अर्पित की गई की जब मेरा स्वागत करने का क्रम आया मेरे पास वाला नहीं तो मैंने तिवारी जी का स्वागत आजाद के पत्रक आवास की मिट्टी रज को लेकर तिलक करके किया नारायण दत्त तिवारी जी बहुत प्रसन्न हुए और गदगद होकर भावुक हो उठे इसी प्रकार इमरजेंसी के बाद जब इंदिरा गांधी सड़क मार्ग से पुखरायां में युवक कांग्रेस के अधिवेशन से वापस आ रहे थे तो मुख्य मार्ग पर मेरे अग्रसर आजाद के चित्र पर माल्यार्पण कर तीर्थ रेणु को धारण किया था । कविवर अशोक बाजपेई के मुताबिक भौती में आजाद स्मारक के लिए विकास बाजपेई का प्रयास स्तुत्य था । आज गांव के पुराने लोगों के अतिरिक्त नए लोग यह नहीं जानते कि यह गांव आजाद का पैतृक स्थान है । लगभग ढाई घंटे आजाद के पैतृक ग्राम के आवास और आजाद चबूतरे अवलोकन के बाद शहर कानपुर वापस आ गया ।
आजाद के दूर के रिश्तेदार जिन्होंने आजाद की शहादत के बाद शव प्राप्त कर अंतिम संस्कार करने वाले जिन्हे आजाद रिश्ते में फूफा कहते थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री शिवविनायक मिश्र ने भी चंद्रशेखर आजाद की जीवनी में आजाद के कानपुर में पैतृक निवास की बात लिखी है ।
काकोरी षड्यंत्र के श्री राम दुलारे त्रिवेदी की किताब "काकोरी के दिलजले" के पेज 210 पर चंद्रशेखर आजाद का परिचय दिया गया है जिसके मुताबिक - " कानपुर से झांसी जाने वाली सड़क पर कानपुर शहर से कुछ मील दूर स्थित भौती नामक ग्राम में तिवारी वंश में जन्म लिया था श्री चंद्रशेखर आजाद के पिता कुछ दिनों के बाद अपनी ससुराल के ग्राम सरौसी सिकंदरपुर जिला उन्नाव मे आ बसे और बालक चंद्रशेखर आजाद अपने चाचा के पास आए बनारस विद्योपार्जन के लिए ।"
बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा एवं लक्ष्मीकांत त्रिपाठी द्वारा संपादित जनवरी सन 1948 मे प्रकाशित पुस्तक " कानपुर के विद्रोही" मैं भी चंद्रशेखर आजाद का परिचय पृष्ठ संख्या 123 से 126 के मध्य मिलता है जिसके मुताबिक " कानपुर के अंतर्गत भौती प्रतापपुर नामक ग्राम में पंडित चंद्रशेखर का जन्म सन 1907- 8 में हुआ था । आपके पिता का नाम पंडित बैजनाथ था छोटी सी उम्र में आप अपने पिता के साथ बनारस चले गए थे वही उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई । उनकी लगभग 14 वर्ष की उम्र में 1921-22 की गांधी की आंधी आई और चंद्रशेखर आजाद जी एक स्वयंसेवक की हैसियत से पकड़े गए । खरेघाट नामक आईसीएस के सामने आपका मुकदमा पेश हुआ । वहां आपने अपना नाम आजाद अपने पिता का नाम स्वतंत्र और रहने का स्थान जेलखाना बतलाया । मैजिस्ट्रेट जल गया और उसने आजाद को 15 बेत लगाने की सजा दी। वेद लगाए जाने के लिए टिकठी में बांधे जाने पर आजाद ने कहा " बांधते क्यों हो बेत लगाओ । मैं खड़ा रहूंगा । बेत लगे और प्रत्येक बेत पर आजाद वंदे मातरम और गांधी जी की जय कहते थे । अंत में 14 वर्ष का कोमल किंतु वीर बालक मूर्छित होकर गिर पड़ा तभी से आपका नाम आजाद पड़ गया ।
इन बेतों को ही खाकर पं. चंद्रशेखर जन्म जन्मांतर के लिए अंग्रेजी सरकार के विद्रोही और हिंसात्मक क्रांति के उपासक बन गए । इसी काल के असहयोग आंदोलन के सिलसिले में श्री राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और श्री शचीन्द्र नाथ बख्शी से आपकी मुलाकात हुई और तीनों ही अंतरंग मित्र बन गए । हर काम में तीनों का साथ रहता था ।
श्री आजाद के क्रांतिकारी जीवन में जितने भी सक्रिय कार्य हुए उनमें उनका प्रमुख हाथ रहा है जैसे 1926 के काकोरी षड्यंत्र में अथवा 1928 के सांडर्स हत्याकांड में । किंतु वह पकड़े कभी नहीं गए काकोरी केस में उनकी गिरफ्तारी के लिए ₹2000 का इनाम था परंतु यूपी की सीआईडी उनकी परछाई भी ना पा सके और साथ ही यह भी रहा कि अपनी फरारी की हालत में वह जान बचाकर चुप बैठे भी नहीं। एक के बाद दूसरा एक्शन करते रहे । सांडर्स को मारने में यद्यपि भगत सिंह और राजगुरु प्रमुख थे किंतु आजाद उनके पार्श्व रक्षक के रूप में उनके साथ साथ थे । जिस समय ये वीर लोग सांडर्स को मारकर डीएवी कॉलेज लाहौर के बोर्डिंग हाउस में रह रहे थे ,उस समय चंन्नन सिंह ने उनका पीछा किया और उनको पकड़ना चाहा उसी समय आजाद ने उसे ढेर कर दिया और साफ निकल गए । पंजाब की पुलिस भी इस पंडित जी को पकड़ने में असफल रही । वायसराय की ट्रेन उलट देने के प्रयास में भी यशपाल के साथ आजाद का नाम आया है । लाहौर षड्यंत्र में आजाद ने श्री भगतसिंह और श्री दत्त को छुड़ाने का प्रयास किया किंतु असफल रहे । दिल्ली षडयंत्र के सिलसिले में भी आजाद की गिरफ्तारी के लिए ₹5000 का इनाम घोषित था और उनका चित्र कई स्थानों पर चिपकाया गया था परंतु सरकारी पुलिस उनकी हवा भी ना पा सके । वह कहा करते थे कि जिंदा तो मुझे कोई पकड़ नहीं सकता और उन्होंने अपना यह प्रण निभाया । उनको जीवित अवस्था में कोई भी पुलिस वाला उनके शरीर कोई स्पर्श नहीं कर सका । किंतु 1931 की 27 फरवरी को 10:00 बजे इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में एक विश्वासघाती सहयोगी की नीचता के कारण आजाद पुलिस की गोलियों का शिकार हुए । उनकी मृत्यु के बाद भी उपस्थित पुलिस के अफसरों को काफी देर तक इस वीर से भय लगता रहा था और मृत शरीर पर कई फायर करने के पश्चात हुए उस सच्चे आजाद के पास फटक सके थे ।
विप्लवी दल का यह कमांडर इन चीफ बड़े जीवट का आदमी और अचूक निशाना मारने वाला था जिनके दुश्मन भी उसके गुणों की तारीफ करें वही सच्ची प्रशंसा का पात्र है । आजाद की निशानेबाजी की तारीफ अल्फ्रेड पार्क की घटना में गोली चलाने वाले मिस्टर नाटबाबर ने की थी जिसका हाथ पहले ही बार में स्वर्गीय आजाद ने बेकार कर दिया था । स्वर्गीय आजाद अपनी फरारी की हालत में बीसियो बार कानपुर आए और कई कई दिन तक यहां ठहरे अपने मित्रों और अपने साथियों से गुप्त मंत्रणाए की । जब कभी वह रास्ते में चलते थे तब उनका एक हाथ अपनी जेब में पड़े हुए तमंचे को पकड़े रहता क्योंकि वह अपनी उस बात को सार्थक करना चाहते थे कि मुझे कोई भी जीवित नहीं पकड़ सकता उनका शरीर भी खूब गठा हुआ और बलिष्ठ था । निहत्था आदमी तो उन्हें पकड़ ही नहीं सकता था । आजाद वास्तविक आजाद था ।

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