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उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता: 2006 अंतर्गत राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता

1. प्रस्तावना
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (Uttar Pradesh Revenue Code, 2006) राज्य में भूमि संबंधी अधिकारों, भू-राजस्व, भूमि अभिलेखों, कृषि भूमि तथा राजस्व प्रशासन से संबंधित कानूनों को एकीकृत एवं संशोधित करने के उद्देश्य से बनाई गई है। यह संहिता उत्तर प्रदेश में राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता, शक्तियों, कार्यप्रणाली तथा अपील और पुनरीक्षण की व्यवस्था निर्धारित करती है।
राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भूमि एवं राजस्व से संबंधित मामलों का निस्तारण सक्षम राजस्व न्यायालय या राजस्व अधिकारी द्वारा किया जाए।
इस विषय में संहिता का अध्याय XIII (धारा 206 से आगे) विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। धारा 206 सिविल न्यायालय एवं राजस्व न्यायालय की अधिकारिता के बीच स्पष्ट विभाजन करती है।
2. राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता का अर्थराजस्व न्यायालय की अधिकारिता से आशय उस वैधानिक शक्ति से है जिसके अंतर्गत कोई विशेष राजस्व न्यायालय या राजस्व अधिकारी किसी निश्चित प्रकार के वाद, प्रार्थना-पत्र अथवा विवाद की सुनवाई करके निर्णय देने के लिए अधिकृत होता है।
अधिकारिता मुख्यतः निम्नलिखित आधारों पर निर्धारित होती है:
  1. विषयगत अधिकारिता (Subject Matter Jurisdiction): किस प्रकार के भूमि या राजस्व विवाद की सुनवाई कौन-सा न्यायालय करेगा।

  2. क्षेत्रीय अधिकारिता (Territorial Jurisdiction): विवादित भूमि किस राजस्व क्षेत्र में स्थित है।

  3. पदगत अधिकारिता (Pecuniary/Official Jurisdiction): संबंधित अधिकारी या न्यायालय को संहिता के अंतर्गत कौन-सी शक्तियां प्रदान की गई हैं।

  4. अपील संबंधी अधिकारिता (Appellate Jurisdiction): अधीनस्थ न्यायालय के आदेश के विरुद्ध अपील किस उच्चतर न्यायालय में की जा सकती है।
3. राजस्व न्यायालयों का संगठन एवं अधिकारिता
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अंतर्गत राजस्व प्रशासन में विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों एवं न्यायालयों की व्यवस्था की गई है।

राजस्व अधिकारी/न्यायालय

प्रमुख भूमिका

राजस्व परिषद (Board of Revenue)

सर्वोच्च राजस्व नियंत्रक एवं अपीलीय/पुनरीक्षण प्राधिकारी

मंडलायुक्त (Commissioner)

मंडल स्तर पर राजस्व संबंधी कार्य एवं वैधानिक अपील

जिलाधिकारी/कलेक्टर (Collector)

जिला स्तर पर राजस्व प्रशासन एवं न्यायिक कार्य

अपर जिलाधिकारी (Additional Collector)

प्रदत्त शक्तियों के अनुसार राजस्व मामलों का निस्तारण

उपजिलाधिकारी (SDO/SDM)

तहसील/उपखंड स्तर पर निर्धारित राजस्व मामलों का निस्तारण

तहसीलदार

तहसील स्तर पर राजस्व संबंधी वाद एवं कार्यवाही

नायब तहसीलदार

प्रदत्त अधिकारिता के अनुसार राजस्व मामलों का निस्तारण

इन अधिकारियों की नियुक्ति एवं शक्तियों का मुख्य आधार संहिता की धारा 7 से 16 तक है।

4. धारा 206 – सिविल न्यायालय एवं राजस्व न्यायालय की अधिकारिता

यह राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण धारा है।

धारा 206 के तीन प्रमुख उपबंध हैं:

(क) धारा 206(1) – सिविल न्यायालय की अधिकारिता पर रोक

इस उपधारा के अनुसार, जिस विषय पर राज्य सरकार, राजस्व परिषद, राजस्व न्यायालय अथवा राजस्व अधिकारी को इस संहिता के अंतर्गत निर्णय लेने या कार्यवाही निस्तारित करने का अधिकार प्राप्त है, उस विषय पर सिविल न्यायालय वाद, आवेदन अथवा कार्यवाही स्वीकार नहीं करेगा।

अर्थात् जिस विषय का निर्णय राजस्व संहिता के अंतर्गत राजस्व न्यायालय द्वारा किया जाना निर्धारित है, उस विषय में सिविल न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

(ख) धारा 206(2) – द्वितीय एवं तृतीय अनुसूची का प्रभाव

इस उपधारा के अंतर्गत दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं हैं:

  1. द्वितीय अनुसूची में उल्लिखित मामलों पर सिविल न्यायालय की अधिकारिता समाप्त रहती है।

  2. तृतीय अनुसूची के कॉलम 2 में वर्णित वादों एवं कार्यवाहियों की सुनवाई केवल कॉलम 3 में निर्दिष्ट राजस्व न्यायालय अथवा राजस्व अधिकारी ही कर सकता है।

(ग) धारा 206(3) – अधिकारिता संबंधी आपत्ति

यदि किसी पक्षकार को यह आपत्ति है कि किसी राजस्व न्यायालय या अधिकारी को संबंधित वाद की सुनवाई करने की अधिकारिता नहीं है, तो उसे यह आपत्ति प्रारंभिक स्तर पर ही उठानी चाहिए।

इसके लिए निम्न शर्तें आवश्यक हैं:

  • आपत्ति प्रथम अवसर पर उठाई गई हो।

  • यदि वाद में मुद्दे निर्धारित किए जाते हैं, तो मुद्दे निर्धारित होने से पहले या उसी समय आपत्ति उठाई जाए।

  • अधिकारिता संबंधी त्रुटि के कारण न्याय में विफलता (Failure of Justice) हुई हो।

5. द्वितीय अनुसूची – वे मामले जिनमें सिविल न्यायालय की अधिकारिता वर्जित है

द्वितीय अनुसूची धारा 206(2)(क) के अंतर्गत आती है। इसमें ऐसे विषयों का उल्लेख है जिनमें सिविल न्यायालय अधिकारिता का प्रयोग नहीं कर सकता।

प्रमुख विषय निम्नलिखित हैं:

क्रम

विवाद का विषय

1.

भूमि की सीमाओं का निर्धारण एवं सीमा चिह्नों का निर्धारण।

2.

कलेक्टर द्वारा आबादी निर्धारण के निर्णय को चुनौती देना।

3.

राजस्व अभिलेखों में प्रविष्टि कराना, हटवाना, संशोधित कराना या बदलवाना।

4.

भू-राजस्व अथवा लगान का निर्धारण, छूट या स्थगन।

5.

भू-राजस्व की वसूली से संबंधित विवाद।

6.

राज्य सरकार, ग्राम पंचायत अथवा स्थानीय निकाय में संपत्ति निहित होने के विरुद्ध दावा।

7.

संहिता के अंतर्गत लगाए गए जुर्माने, खर्च, क्षतिपूर्ति आदि से संबंधित प्रश्न।

8.

गलत तरीके से बेदखल किए गए भूमिधर या असामी की पुनर्स्थापना।

9.

राजस्व अधिकारी को संहिता के अंतर्गत निर्धारित कर्तव्य पालन के लिए बाध्य करने का दावा।

10.

राजस्व क्षेत्रों के गठन, विभाजन, विलय या पुनर्समायोजन से संबंधित प्रश्न।

11.

धारा 64 अथवा 125 के अंतर्गत भूमि आवंटन या उसके निरस्तीकरण से संबंधित विवाद।

12.

धारा 71 के अंतर्गत कलेक्टर द्वारा जारी निर्देश को चुनौती देना।

13.

धारा 124, 134 या 201 के अंतर्गत कब्जा दिलाने अथवा बेदखली की कार्यवाही को चुनौती देना।

14.

अध्याय XI के अंतर्गत राज्य सरकार के आदेश की वैधता को चुनौती देना।

15.

किसी भूमि पर कब्जे से संबंधित दावा।

16.

सह-खातेदार के भूमि संबंधी अधिकार स्थापित करने का दावा।

विशेष महत्व: द्वितीय अनुसूची का उद्देश्य राजस्व विषयों को सिविल न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से अलग रखना है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक प्रकार का संपत्ति विवाद राजस्व न्यायालय में ही जाएगा। विवाद की प्रकृति, मांगी गई राहत और संबंधित वैधानिक प्रावधान का परीक्षण आवश्यक है।
6. तृतीय अनुसूची – मूल अधिकारिता एवं अपीलीय अधिकारिता
तृतीय अनुसूची राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता निर्धारित करने का एक महत्वपूर्ण आधार है। इसमें प्रत्येक प्रकार के वाद के लिए निम्नलिखित विवरण दिया गया है:
  1. संबंधित धारा।

  2. वाद अथवा कार्यवाही का विवरण।

  3. मूल अधिकारिता वाला न्यायालय।

  4. प्रथम अपील का न्यायालय।

  5. द्वितीय अपील का न्यायालय।

इसके कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण निम्नलिखित हैं:

संबंधित धारा

वाद का प्रकार

मूल न्यायालय

प्रथम अपील

धारा 24

सीमा एवं सीमा चिह्न संबंधी विवाद

उपजिलाधिकारी

मंडलायुक्त

धारा 35

नामांतरण (Mutation)

तहसीलदार

उपजिलाधिकारी

धारा 54, 56, 57

वृक्षों से संबंधित विवाद

कलेक्टर

मंडलायुक्त

धारा 67

ग्राम पंचायत की भूमि से अवैध कब्जा हटाना

सहायक कलेक्टर

कलेक्टर

धारा 116

जोत का विभाजन (Partition)

उपजिलाधिकारी

मंडलायुक्त

धारा 133

निषेधाज्ञा एवं क्षतिपूर्ति

उपजिलाधिकारी

कलेक्टर

धारा 134

भूमिहीन अनधिकृत कब्जेदार की बेदखली

उपजिलाधिकारी

मंडलायुक्त

धारा 144

भूमिधर या असामी द्वारा घोषणा का वाद

उपजिलाधिकारी

मंडलायुक्त


उपर्युक्त तालिका मूल संहिता में प्रकाशित तृतीय अनुसूची के उदाहरणों पर आधारित है। किसी मुकदमे में वास्तविक न्यायालय निर्धारित करते समय वर्तमान संशोधित अनुसूची का परीक्षण करना आवश्यक है।
7. धारा 207 – प्रथम अपील (First Appeal)
धारा 207 के अनुसार, तृतीय अनुसूची के कॉलम 2 में उल्लिखित किसी वाद, आवेदन अथवा कार्यवाही में पारित अंतिम आदेश या डिक्री से असंतुष्ट पक्षकार प्रथम अपील प्रस्तुत कर सकता है।

इसके अतिरिक्त निम्नलिखित आदेशों के विरुद्ध भी अपील का प्रावधान है:

  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 47 के अंतर्गत आने वाले आदेश।

  • सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 104 के अंतर्गत आने वाले आदेश।

  • आदेश 43 नियम 1 के अंतर्गत अपील योग्य आदेश।

अपील की समय सीमा: आदेश अथवा डिक्री की तारीख से 30 दिन।
8. धारा 208 – द्वितीय अपील (Second Appeal)
धारा 208 के अंतर्गत प्रथम अपील में पारित अंतिम आदेश अथवा डिक्री के विरुद्ध द्वितीय अपील की जा सकती है, 

बशर्ते कि संबंधित मामला तृतीय अनुसूची के अंतर्गत द्वितीय अपील योग्य हो।

द्वितीय अपील स्वीकार करने के लिए निम्नलिखित शर्तें आवश्यक हैं:

मामला तृतीय अनुसूची के कॉलम 5 के अंतर्गत द्वितीय अपील योग्य होना चाहिए।


मामले में विधि का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न (Substantial Question of Law) शामिल होना चाहिए।


द्वितीय अपील आदेश अथवा डिक्री की तारीख से 90 दिनों के भीतर प्रस्तुत की जानी चाहिए।9.धारा 209 – कुछ अपीलों पर प्रतिबंध
इस धारा के अनुसार धारा 207 एवं 208 में किसी बात के होते हुए भी कुछ आदेशों के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती।

प्रमुख उदाहरण हैं:

अध्याय XI के अंतर्गत पारित आदेश।


विलंब माफी का आवेदन स्वीकार या अस्वीकार करने वाला आदेश।


पुनरीक्षण आवेदन अस्वीकार करने वाला आदेश।


स्थगन (Stay) देने या अस्वीकार करने वाला आदेश।


मामला अधीनस्थ न्यायालय को वापस भेजने (Remand) का आदेश।


अंतरिम प्रकृति का आदेश।


पक्षकारों की सहमति से पारित आदेश।


एकपक्षीय (Ex-parte) अथवा चूक के कारण पारित आदेश।

हालांकि, एकपक्षीय आदेश या चूक के कारण पारित आदेश को निरस्त कराने के लिए आदेश की तारीख से 30
दिनों के भीतर आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।
10. धारा 210 – अभिलेख मंगाने की शक्ति (Revisional Jurisdiction)
धारा 210 राजस्व परिषद तथा मंडलायुक्त को अधीनस्थ राजस्व न्यायालयों के अभिलेख मंगाने की शक्ति प्रदान करती है।
इसका प्रयोग उन मामलों में किया जा सकता है जिनमें कोई अपील उपलब्ध नहीं है।
यदि अभिलेखों के परीक्षण में निम्नलिखित त्रुटियां पाई जाती हैं, तो संबंधित प्राधिकारी उचित आदेश पारित कर सकता है:
न्यायालय ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो कानून द्वारा उसे प्रदान नहीं की गई थी।
न्यायालय ने अपनी वैधानिक अधिकारिता का प्रयोग करने से इनकार किया है।
न्यायालय ने अधिकारिता का प्रयोग करते समय अवैधानिकता अथवा गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितता की है।समय सीमा: धारा 210 के अंतर्गत पुनरीक्षण आवेदन सामान्यतः आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर प्रस्तुत किया जानाचाहिए।11. धारा 211 – राजस्व परिषद की पुनर्विलोकन शक्ति (Review)
धारा 211 के अंतर्गत राजस्व परिषद को अपने द्वारा पारित आदेश का पुनर्विलोकन करने की शक्ति प्राप्त है।

पुनर्विलोकन निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है:
  • नए एवं महत्वपूर्ण तथ्य या साक्ष्य की जानकारी प्राप्त होना।

  • अभिलेख पर स्पष्ट दिखाई देने वाली गलती या त्रुटि।

  • कोई अन्य पर्याप्त कारण।

इस धारा के अंतर्गत पुनर्विलोकन आवेदन आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर प्रस्तुत किया जा सकता है।
पुनर्विलोकन में पारित आदेश का पुनः पुनर्विलोकन नहीं किया जा सकता।
12. धारा 212 – वाद स्थानांतरण की शक्ति (Power to Transfer Cases)
धारा 212 के अंतर्गत राजस्व न्यायालयों में लंबित वादों को स्थानांतरित करने की व्यवस्था की गई है।
इसके अनुसार:
(क) राजस्व परिषद की शक्ति: न्याय के हित में राजस्व परिषद किसी मामले को एक राजस्व अधिकारी से दूसरे समान या उच्चतर पद के अधिकारी के पास स्थानांतरित कर सकती है। यह स्थानांतरण उसी जिले अथवा अन्य जिले में किया जा सकता है।
(ख) मंडलायुक्त, कलेक्टर एवं उपजिलाधिकारी की शक्ति: ये अधिकारी अपने अधीनस्थ एवं सक्षम राजस्व अधिकारी को कोई वाद अथवा वादों की श्रेणी सौंप सकते हैं। वे किसी अधीनस्थ अधिकारी से वाद वापस लेकर स्वयं भी उसका निस्तारण कर सकते हैं अथवा किसी अन्य सक्षम अधिकारी को भेज सकते हैं।
13. धारा 213 – राज्य सरकार आवश्यक पक्षकार
इस धारा के अनुसार, जब संहिता के अंतर्गत ग्राम पंचायत अथवा स्थानीय प्राधिकारी द्वारा या उसके विरुद्ध कोई वाद संस्थित किया जाता है, तो राज्य सरकार को आवश्यक पक्षकार बनाया जाएगा, संहिता एवं उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के अधीन।
14. धारा 214 – सिविल प्रक्रिया संहिता एवं परिसीमा अधिनियम का प्रयोग
धारा 214 के अनुसार, जब तक राजस्व संहिता या उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों में कोई विपरीत प्रावधान न हो, तब तक निम्नलिखित कानून लागू होंगे:
  1. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of Civil Procedure, 1908)।

  2. परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963)।

इसका अर्थ है कि राजस्व न्यायालयों में वादों एवं प्रार्थना-पत्रों की सुनवाई में सिविल प्रक्रिया के सिद्धांत लागू होंगे, जहां तक वे राजस्व संहिता के प्रावधानों के प्रतिकूल नहीं हैं।

उपरोक्त धाराओं का आधार संहिता का अध्याय XIII है।

15. राजस्व न्यायालय एवं सिविल न्यायालय की अधिकारिता में अंतर

आधार

राजस्व न्यायालय

सिविल न्यायालय

कानून

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006

सिविल प्रक्रिया संहिता एवं अन्य लागू कानून

मुख्य विषय

भूमि राजस्व, नामांतरण, जोत विभाजन एवं संहिता के अंतर्गत भूमि संबंधी अधिकार

सामान्य दीवानी एवं संपत्ति विवाद

अधिकारिता

संहिता एवं अनुसूचियों के अनुसार

सिविल प्रक्रिया एवं अन्य लागू कानूनों के अनुसार

अपील

धारा 207 एवं 208

संबंधित दीवानी कानूनों के अनुसार

पुनरीक्षण

धारा 210

संबंधित कानूनों के अनुसार

पुनर्विलोकन

धारा 211 के अंतर्गत राजस्व परिषद

लागू दीवानी कानूनों के अनुसार


16. राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता से संबंधित महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत
राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता निर्धारित करते समय कुछ महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखना आवश्यक है:

1. अधिकारिता का निर्धारण वैधानिक प्रावधान से होगा।

कोई भी राजस्व न्यायालय अपनी इच्छा से अधिकारिता ग्रहण नहीं कर सकता। उसे संहिता के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों के भीतर ही कार्य करना होगा।

2. केवल वाद का शीर्षक निर्णायक नहीं है।

किसी वाद की प्रकृति निर्धारित करने के लिए वादी द्वारा मांगी गई वास्तविक राहत, विवाद का विषय तथा पक्षकारों के अधिकारों का परीक्षण किया जाना चाहिए।

3. अधिकारिता का अभाव गंभीर कानूनी त्रुटि है।

यदि कोई न्यायालय ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करता है जो उसे कानून द्वारा प्राप्त नहीं है, तो धारा 210 के अंतर्गत पुनरीक्षण का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है, जहां अन्य वैधानिक शर्तें पूरी होती हों।

4. राजस्व अभिलेख में नाम दर्ज होना अंतिम स्वामित्व का प्रमाण नहीं है।

नामांतरण की कार्यवाही मुख्यतः राजस्व अभिलेखों के रखरखाव से संबंधित है। केवल नामांतरण आदेश से किसी व्यक्ति को अंतिम रूप से संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त नहीं हो जाता।17. निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अंतर्गत राजस्व न्यायालयों की अधिकारिता का निर्धारण मुख्यतः धारा 206, 207, 208, 209, 210, 211 एवं 212 तथा द्वितीय एवं तृतीय अनुसूची के आधार पर किया जाता है।
धारा 206 सिविल न्यायालय और राजस्व न्यायालय के बीच अधिकारिता का विभाजन करती है। द्वितीय अनुसूची सिविल न्यायालय की अधिकारिता से बाहर रखे गए विषयों को स्पष्ट करती है, जबकि तृतीय अनुसूची विभिन्न राजस्व वादों के लिए मूल न्यायालय एवं अपीलीय न्यायालय निर्धारित करती है।
इस प्रकार, उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 का उद्देश्य राजस्व विवादों के शीघ्र, व्यवस्थित एवं विधिसम्मत निस्तारण के लिए स्पष्ट न्यायिक व्यवस्था स्थापित करना है।

18. परीक्षा एवं न्यायिक सेवा के लिए महत्वपूर्ण धाराएं

धारा

विषय

7

राजस्व परिषद का गठन

8

राजस्व परिषद की अधिकारिता

11

मंडलायुक्त एवं अपर मंडलायुक्त

12

कलेक्टर एवं अपर कलेक्टर

13

उपजिलाधिकारी

14

तहसीलदार एवं न्यायिक तहसीलदार

15

नायब तहसीलदार

206

सिविल एवं राजस्व न्यायालय की अधिकारिता

207

प्रथम अपील

208

द्वितीय अपील

209

कुछ अपीलों पर प्रतिबंध

210

अभिलेख मंगाने की शक्ति

211

पुनर्विलोकन

212

वाद स्थानांतरण

214

CPC एवं Limitation Act का प्रयोग

217

अधिनियम की वैधता पर निर्णय देने की अधिकारिता का अभाव

प्रामाणिक अध्ययन सामग्री:

  1. India Code – उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (हिंदी एवं अंग्रेजी PDF)।

  2. उत्तर प्रदेश राजस्व न्यायालय कंप्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली (RCCMS)।

  3. धारा 206 – अधिकारिता का मूल पाठ।

कानूनी सावधानी: उपर्युक्त विवेचन अध्ययन के उद्देश्य से है। मूल संहिता की उपलब्ध PDF में 2021 तक का पाठ है, जबकि अक्टूबर 2026 के संशोधित पाठ में बाद के संशोधन भी शामिल हैं। इसलिए वास्तविक मुकदमे में न्यायालय का चयन, अपील की पात्रता और अनुसूची का विवरण निर्धारित करने से पहले नवीनतम संशोधित राजपत्र एवं लागू नियमों का मिलान अवश्य करें।

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