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सुप्रीम कोर्ट: सहमति से बने संबंध के टूटने पर हर मामला दुष्कर्म नहीं

संबंध के विफल हो जाने या विवाह न हो पाने की स्थिति मात्र से दुष्कर्म का अपराध सिद्ध नहीं
 बदलते परिवेश में सहमति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संबंधों की जटिलताओं से जुड़े मामलों की संख्या बढ़ रही है
 प्रत्येक मामले में सहमति, परिस्थितियों और पक्षों के वास्तविक इरादों का सावधानीपूर्वक परीक्षण आवश्यक 

कानपुर: 30 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली: 30 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली, 30 अक्टूबर 2026। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सहमति से स्थापित संबंध के समाप्त होने के बाद हर मामले को स्वतः दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी संबंध के विफल हो जाने या विवाह न हो पाने की स्थिति मात्र से दुष्कर्म का अपराध सिद्ध नहीं होता।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि दो वयस्क व्यक्तियों के बीच संबंध उनकी स्वतंत्र और स्वैच्छिक सहमति से स्थापित हुआ था, तो बाद में संबंध टूट जाने या विवाह का वादा पूरा न होने मात्र से दुष्कर्म का आरोप स्वतः सिद्ध नहीं माना जा सकता। अदालत ने प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का अलग-अलग मूल्यांकन आवश्यक बताया।
सहमति और धोखे में अंतर जरूरी
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यह देखना आवश्यक है कि संबंध बनाते समय विवाह का वादा वास्तविक था या केवल शारीरिक संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया झूठा आश्वासन था। यदि प्रारंभ से ही किसी व्यक्ति का इरादा विवाह करने का नहीं था और उसने केवल धोखे से सहमति प्राप्त की, तो मामला अलग हो सकता है।
कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण फैसला
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में संतुलन बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है। इससे अदालतों को ऐसे मामलों में वास्तविक सहमति और कथित धोखे के बीच अंतर स्पष्ट करने में सहायता मिलेगी।
सामाजिक प्रभाव
बदलते सामाजिक परिवेश में सहमति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संबंधों की जटिलताओं से जुड़े मामलों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भविष्य के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध के समाप्त होने मात्र से दुष्कर्म का अपराध स्थापित नहीं होता। प्रत्येक मामले में सहमति, परिस्थितियों और पक्षों के वास्तविक इरादों का सावधानीपूर्वक परीक्षण आवश्यक है।

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