ब्रेकिंग न्यूज

12/recent/ticker-posts

अनूप कुमार शुक्ल महासचिव कानपुर इतिहास समिति कानपुर की सोशल मीडिया पोस्ट से:कनपुरिया मजदूरो की पीड़ा व्यक्त करने वाले महाकवि 'निराला'

अनूप कुमार शुक्ल की सोशल मीडिया पोस्ट से:
जब बैसवारा मे गाँव गढ़ाकोला आते जुही मे सरस्वती के संपादक आचार्य  द्विवेदी जी से जरुर मिलते
महाप्राण निराला ने कनपुरिया मजदूरों की आवाज अपनी कविता में उकेरी
"महंगू महंगा रहा" शीर्षक कविता कानपुर के एक मजदूर की व्यथा कथा है ।
कानपुर से महाप्राण निराला व उनके जामाता के प्रवास का संदर्भ



कानपुर: 15 अक्टूबर 2026
Anoop Shukla 10 घंटे ·
कनपुरिया मजदूरो की पीड़ा व्यक्त करने वाले  महाकवि 'निराला' घंटे पहले
महाप्राण निराला और कानपुर
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
महाप्राण निराला (प. सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ') का कानपुर से जुड़ाव द्विवेदी युग से रहा | जब भी बैसवारा मे अपने गाँव गढ़ाकोला आते तो कानपुर मे जुही मोहल्ले मे सरस्वती पत्रिका के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी से जरुर मिलते, यद्यपि निराला जी कविताओं से द्विवेदी जी संतुष्ट नही थे | इसके अलावा कानपुर मे कई कवि मंचो पर कविता पाठ किया जैसे जुही की कली आदि कवियो के हसने पर अपनी उक्तियो से उनका मुँह बंद किया था | निराला जी सुकवि प. जगदम्बाप्रसाद हितैषी से मिलने आते और उनका आचार्य गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, आचार्य लक्ष्मीधर बाजपेयी और प. बालकृष्ण शर्मा नवीन से भी कानपुर मे भेटे होती थी | गीतकार सुनील बाजपेयी के पिता सुकवि उमाशंकर बाजपेयी व डा. माधवीलता शुक्ला लखनऊ प्रवास मे निराला जी से जुड़े रहे | विकास बाजपेयी ने निराला जी का इन्टरव्यु प्रयाग मे लिया था जो बाद मे कानपुर से प्रकाशित हुआ | निराला जी पर कानपुर से कई गवेषणात्मक ग्रंथ निकले है |
महाप्राण निराला के शिष्य व जामाता शिवशेखर द्विवेदी जी ने जब कोलकाता छोड़कर कानपुर आए तो वह प. विष्णुदत्त शुक्ल के पत्र सहयोगी मे संपादन सहकारी बने | सहयोगी पत्र बिरिहाना रोड से निकलता था जहाँ से पहले जागरण भी निकलता था | इस प्रकार कानपुर से महाप्राण निराला व उनके जामाता के प्रवास का संदर्भ मिलता है |
महाप्राण निराला ने कनपुरिया मजदूरों की आवाज अपनी कविता में उकेरी । "महंगू महंगा रहा" शीर्षक कविता कानपुर के एक मजदूर की व्यथा कथा है ।
लखनऊ से प्रकाशित "माधुरी" फरवरी ,१९२८ ई० मे महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की कविता । निराला जी ने यह कविता डी ए वी कालेज कानपुर मे आयोजित कवि सम्मेलन मे सभापति आसन से पढ़ी थी ।
कनपुरिया मजदूरो की पीड़ा व्यक्त करने वाले
महाकवि 'निराला'
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

" महंगू महंगा रहा " कविता शीर्षक से महाप्राण निराला ने कनपुरिया मजदूरो की पीड़ा को व्यक्त किया और साम्यवाद के अतिवाद पर भी कठोर प्रहार किया था |
गांवो मे किसानो के उद्धार के लिए एक ऐसे नेता पहुँचते हैं जिन्हे जमींदार और मुनाफाखोर अपना हेतु समझते है | राष्ट्रीयता के इन नये उम्मीदवार जमींदार की बाते सुनकर सुकवा की समझ मे नही आता कि क्या हो रहा है | कानपुर मे लकड़ी कोयला लादने वाला महंगू उसे समझाता है कि कानपुर मे मजदूर किरिया के जो गोली लगी थी वह मिल मालिक के कारण और आज उन्ही की चाँदी से राजनीति चमक रही है | लेकिन हमारे लिए लड़ने वाले लोग भी है जिनके नाम नही सुनाई देते है क्योकि अखबार व्यापारियो की सम्पत्ति है | महंगू को विश्वास है कि जब बड़े आदमी अपनी धन संपत्ति छोड़ेगे तभी देश मुक्त होगा |
मंहगू के शब्दो मे ....
बड़े बड़े आदमी धन मान छोड़ेगे,
तभी देश मुक्त है |
✍️ अनूप कुमार शुक्ल
महासचिव कानपुर इतिहास समिति, कानपुर
कविता का मूल पाठ
महगू महंगा रहा
✍️सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
आजकल पंडितजी देश में बिराजते हैं।
माताजी को स्वीजरलैंड के अस्पताल,
तपेदिक के इलाज के लिए छोड़ा है।
बड़े भारी नेता हैं।
कुइरीपुर गाँव में व्याख्यान देने को
आए हैं मोटर पर
लंडन के ग्रैज्युएट,
एम.ए. और बैरिस्टर,
बड़े बाप के बेटे,
बीसियों भी पर्तों के अंदर, खुले हुए।
एक-एक पर्त बड़े-बड़े विलायती लोग।
देश की भी बड़ी-बड़ी थातियाँ लिए हुए।
राजों के बाजू पकड़, बाप की वकालत से;
कुर्सी रखने वाले अनुल्लंघ्य विद्या से
देशी जनों के बीच;
लेंड़ी ज़मींदारों को आँखों तले रक्खे हुए;
मिलों के मुनाफ़े खाने वालों के अभिन्न मित्र;
देश के किसानों, मज़दूरों के भी अपने सगे
विलायती राष्ट्रों से समझौते के लिए।
गले का चढ़ाव बोर्झुआज़ी का नहीं गया।
धाक, रूस के बल से ढीली भी, जमी हुई;
आँख पर वही पानी;
स्वर पर वही सँवार।
गाँव के अधिक जन कुली या किसान हैं;
कुछ पुराने परजे जैसे धोबी, तोली, बढ़ई,
नाई, लोहार, बारी, तरकिहार, चुड़िहार,
बेहना, कुम्हार, डोम, कुइरी, पासी, चमारा,
गंगापुत्र, पुरोहित, महाब्राह्मण, चौकीदार;
कामकाज, दीवाली-जैसे परबों के दिन
मनों ले जानेवाले पिछली परिपाटी से;
हुए, मरे, ब्याह में दीवाला लाते हुए
ज़मींदार के वाहन।
बाक़ी परदेश में कौड़ियों के नौकर हैं
महाजनों के दबैल,
स्वत्व बेचकर विदेशी माल बेचनेवाले;
शहरों के सभासद।
ऐसे ही प्रकार के प्राकार से घिरे
लोगों में भाषण है।
जब भी अफ़ीम, भाँग, गाँजा, चरस, चंडू, चाय,,
देशी और विलायती तरह-तरह की शराब
चलती है मुल्क में,
फिर भी आज़ादी की हाँक का नशा बड़ा;
लोगों पर चढ़ता है।
विपत्तियाँ कई हैं घूस और डंडे की;
उनसे बचने के लिए
रास्ता निकाला है, सभाओं में आते हैं
गाँवों के लोग कुल।
एक-एक आ गए।
पंडितजी कांग्रेस के चुनाव पर बोले ;
आज़ादी लेते हैं, एक साल और है;
आततायियों से देश पिस-पिसकर मिट गया;
हमको बढ़ जाना है;
चैन नहीं लेना है जब तक विजयी न हों।
जनता मंत्रमुग्ध हुई।
ज़मीदार भी बोले जेल हो-आने वाले,
कांग्रेस-उम्मीदवार। सभा विसर्जित हुई।
महगू सुनता रहा।
कम्पू को लादता है लकड़ी, कोयला, चपड़ा।
लुकुआ ने महगू से पूछा, “क्यों हो महगू, कुछ
अपनी तो राय दो?
आजकल, कहते हैं, ये भी अपने नहीं?”
“महगू ने कहा, हाँ, कम्पू में किरिया के गोली जो लगी थी,
उसका कारण पंडितजी का शागिर्द है;
रामदास को कांग्रेसमैन बनाने वाला,
जो मिल का मालिक है।
यहाँ भी वह ज़मींदार, बाज़ू से लगा ही है।
कहते हैं, इनके रुपए से ये चलते हैं,
कभी-कभी लाखों पर हाथ साफ़ करते हैं।”
लुकुआ घबरा गया। “भला फिर हम कहाँ जाएँ?”
महगू से प्रश्न किया।
महगू ने कहा, “एक बड़ी ख़बर सुनी है,
हमारे अपने हैं यहाँ बहुत छिपे हुए लोग,
मगर चूँकि अभी ढीला-पोली है देश में,
अख़बार व्यापारियों ही की संपत्ति हैं,
राजनीति कड़ी से भी कड़ी चल रही है,
वे सब जन मौन हैं इन्हें देखते हुए;
जब ये कुछ उठेंगे,
और बड़े त्याग के निमित्त कमर बाँधेंगे,
आएँगे वे जन भी देश के धरातल पर,
अभी अख़बार उनके नाम नहीं छापते।
ऐसा ही पहरा है।”
“तो फिर कैसा होगा?” लुकुआ ने प्रश्न किया।
“जैसा तू लुकुआ है, वैसा ही होना है,
बड़े-बड़े आदमी धन मान छोड़ेंगे,
तभी देश मुक्त है,
कवि जी ने पढ़ा था, जब तुम बदले नहीं;
अपने मन में कहा मैंने, मैं महगू हूँ,
पैरों की धरती आकाश को भी चली जाए,
मैं कभी न बदलूँगा, इतना महगा हूँगा।”
स्रोत :पुस्तक : निराला संचयिता (पृष्ठ 150) संपादक : रमेशचंद्र शाह रचनाकार : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला प्रकाशन : वाणी प्रकाशन

Post a Comment

0 Comments