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सुप्रीम कोर्ट: केवल कैंसर दवाओं पर ही 30% मुनाफे की सीमा लगाने के फैसले पर सवाल: इस तरह की सीमा सभी दवाओं और मेडिकल डिवाइस पर क्यों नहीं

कोर्ट ने उदाहरण दिया था कि ₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 के एमआरपी पर  ने "दिनदहाड़े डकैती" 
इस फैसले से कैंसर की कई दवाओं की एमआरपी में 70% तक की भारी कमी आ सकती 
 नियम घरेलू, इंपोर्टेड, ब्रांडेड, जेनेरिक, पेटेंटेड और नॉन-पेटेंटेड सभी प्रकार की कैंसर रोधी दवाओं पर लागू 
 कैंसर मरीजों को सालाना लगभग ₹2,500 करोड़ की बचत होने की उम्मीद है। 

 कानपुर: 12 अक्टूबर 2026
नयी दिल्ली: 12 अक्टूबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के केवल कैंसर दवाओं पर ही 30% ट्रेड मार्जिन कैप (मुनाफे की सीमा) लगाने के फैसले पर सवाल उठाया है और पूछा है कि इस तरह की सीमा सभी दवाओं और मेडिकल डिवाइस पर क्यों नहीं लागू की जा सकती। [12 अक्टूबर 2026] को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि दवाओं के वास्तविक दाम और छपे हुए एमआरपी (MRP) में अत्यधिक अंतर केवल कैंसर तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने पहले उदाहरण दिया था कि ₹2,700 की कैंसर दवा ₹27,000 के एमआरपी पर बेची जा रही थी, जिसे कोर्ट ने "दिनदहाड़े डकैती" बताया था। केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच इस मामले को लेकर मुख्य बहस निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित रही:
1. केंद्र सरकार का पक्ष और मरीजों को लाभ₹2,500 करोड़ की सालाना बचत: केंद्र सरकार ने अदालत में हलफनामा दायर कर बताया कि सभी गैर-अनुसूचित एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30% तक सीमित करने का महत्वपूर्ण फैसला लिया गया है। इससे कैंसर मरीजों को सालाना लगभग ₹2,500 करोड़ की बचत होने की उम्मीद है। 
दामों में 70% तक की गिरावट: इस फैसले से कैंसर की कई दवाओं की एमआरपी में 70% तक की भारी कमी आ सकती है। यह नियम घरेलू, इंपोर्टेड, ब्रांडेड, जेनेरिक, पेटेंटेड और नॉन-पेटेंटेड सभी प्रकार की कैंसर रोधी दवाओं पर लागू होगा। 
बाजार संतुलन का तर्क: केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिटिसर जनरल और वकीलों ने तर्क दिया कि सरकार पूरी फार्मा व्यवस्था को अत्यधिक नियंत्रित नहीं करना चाहती, क्योंकि इससे दवाओं की बाजार में उपलब्धता और सप्लाई चेन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
2. सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति और मांगसभी दवाओं पर कैपिंग की मांग: जस्टिस मेहता और पीठ ने सवाल किया कि सरकार का यह कदम केवल कैंसर तक ही सीमित क्यों है? कोर्ट ने पूछा कि आम उपयोग की अन्य आवश्यक दवाओं और मेडिकल डिवाइस में जो भारी अंतर (मार्कअप) है, उसे कम करने के लिए सरकार व्यापक कदम क्यों नहीं उठा रही है। 
16% मार्जिन का सुझाव: पूर्व की सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने यह चिंता भी जताई थी कि अस्पतालों और केमिस्टों द्वारा भारी मुनाफा वसूला जाता है। कोर्ट ने सुझाव दिया था कि दवाओं पर एक समान 16% का मार्जिन तय करने की व्यवस्था सोची जानी चाहिए।
3. सरकार को अन्य दवाओं पर सीमा तय करने में जटिलता
केंद्र सरकार के मुताबिक, सभी मेडिकल कंज्यूमेबल्स और दवाओं पर एक जैसा प्रतिशत मार्जिन तय करना बेहद जटिल है। इसकी वजहें निम्नलिखित हैं:
दामों में भारी विविधता: अस्पताल की उपभोग्य सामग्रियों (consumables) की कीमतें ₹1 से लेकर ₹350 या उससे अधिक तक भिन्न होती हैं। एक समान प्रतिशत रखने से सस्ती दवाओं और सामग्रियों को बेचने की लागत नहीं निकल पाएगी।
अस्पतालों के अलग शुल्क: अलग-अलग अस्पतालों में नर्सिंग और एडमिनिस्ट्रेटिव चार्ज अलग होते हैं, जो दवाओं के अंतिम मूल्य निर्धारण तंत्र को प्रभावित करते हैं। 
इस मामले में केंद्र सरकार उन कैंसर दवाओं की सूची तैयार कर रही है जो इस 30% प्राइस कैप के दायरे में आएंगी। सुप्रीम कोर्ट इस नीति के व्यापक विस्तार और अन्य दवाओं पर इसके प्रभाव को लेकर अब अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को करेगा।
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