उम्र के साथ अक्सर बढ़ जाता है, जिसे बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH) कहते हैं।
कैंसर नहीं होता।
मूत्राशय की मांसपेशियों का कमजोर होना।
इसका आकार बढ़ता है तो यूरेथ्रा पर दबाव डालता है, मूत्र का प्रवाह प्रभावित होता
कानपुर: 28 अक्टूबर 2026
प्रोस्टेट का आकार शरीर के सामान्य कार्यों (खासकर मूत्र और कुछ हद तक यौन कार्यों) पर असर डाल सकता है। सामान्य प्रोस्टेट अखरोट के आकार का होता है (लगभग 15-30 ग्राम या 20-30 सीसी वॉल्यूम)। उम्र के साथ यह अक्सर बढ़ जाता है, जिसे बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH) कहते हैं। यह कैंसर नहीं होता।
मुख्य प्रभाव: मूत्र संबंधी कार्यप्रोस्टेट मूत्राशय के नीचे और यूरेथ्रा (मूत्रमार्ग) के चारों ओर स्थित होता है। जब इसका आकार बढ़ता है तो यह यूरेथ्रा पर दबाव डालता है, जिससे मूत्र का प्रवाह प्रभावित होता है:बार-बार पेशाब आने की इच्छा (दिन या रात में)।
पेशाब शुरू करने में कठिनाई।
कमजोर या रुक-रुक कर आने वाली पेशाब की धार।
पेशाब पूरी तरह न निकलने का अहसास।
रात में बार-बार उठना (नॉक्ट्यूरिया)।
पेशाब के बाद टपकना या अचानक जोरदार इच्छा।
सभी बड़े प्रोस्टेट में लक्षण नहीं होते। कुछ लोगों में हल्का बढ़ना भी परेशानी पैदा कर सकता है, जबकि बड़े आकार में भी कम लक्षण हो सकते हैं। आकार और लक्षणों का सीधा संबंध हमेशा नहीं होता।संभावित जटिलताएँ (यदि लंबे समय तक अनदेखा किया जाए)मूत्र पथ संक्रमण (UTI)।
मूत्राशय में पथरी।
अचानक पेशाब न निकलना (यूरिनरी रिटेंशन) — यह आपात स्थिति हो सकती है।
मूत्राशय की मांसपेशियों का कमजोर होना।
गंभीर मामलों में गुर्दे पर दबाव या नुकसान (मूत्र के बैकफ्लो से)।
बहुत बड़े आकार (जैसे 80-100 सीसी या अधिक) में ये जोखिम बढ़ सकते हैं, लेकिन मुख्य रूप से लक्षण और जटिलताएँ महत्वपूर्ण हैं, न कि सिर्फ आकार।
अन्य शरीर कार्यों पर प्रभावयौन कार्य: कुछ मामलों में इरेक्टाइल फंक्शन या इजैक्यूलेशन प्रभावित हो सकता है (विशेषकर लक्षणों के साथ), लेकिन यह हमेशा नहीं होता। प्रोस्टेट का मुख्य काम वीर्य का तरल हिस्सा बनाना है, जो शुक्राणु को पोषण देता है।
अन्य अंग: आमतौर पर पाचन, हृदय या अन्य सामान्य कार्यों पर सीधा असर नहीं पड़ता। कभी-कभी रेक्टम के पास होने के कारण हल्का दबाव महसूस हो सकता है, लेकिन कब्ज जैसे समस्याएँ आमतौर पर इससे जुड़ी नहीं होतीं।महत्वपूर्ण बातेंप्रोस्टेट का बढ़ना उम्र का सामान्य हिस्सा हो सकता है (50 साल के बाद लगभग आधे पुरुषों में, 80 साल तक ज्यादातर में)। लक्षण होने पर डॉक्टर (यूरोलॉजिस्ट) से जाँच करवाएँ — डिजिटल रेक्टल एग्जाम, अल्ट्रासाउंड, PSA टेस्ट आदि से पता चलता है।
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