रानी के अंतिम पलों की खौफनाक और सच्ची दास्तां वृंदावनलाल वर्मा को उनकी परदादी ने सुनाई थी
आज़ादी की कीमत महान वीरांगनाओं के खून और अनगिनत ज़ख्मों से चुकाई गई
पीठ पर बंधा उनका छोटा सा बालक दामोदर, लहू से लथपथ शरीर को नम आंखों से देख रहा था
कानपुर: 28 अक्टूबर 2026
मैदान-ए-जंग का वो खौफनाक मंज़र जब ग्वालियर के कोट की लड़ाई और अंतिम संघर्ष के दौरान, रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा ले रही थीं। मैदान-ए-जंग में चारों तरफ अंग्रेजी सेना थी और बीच में अकेली अपनी मातृभूमि की लाज बचाती वह शेरनी डटी हुई थी।
युद्ध के दौरान अचानक एक अंग्रेज सैनिक की चलाई गई गोली रानी की बाईं जंघा में जा धंसी। इस समय रानी के दोनों हाथों में तलवारें थीं। गोली लगने के कारण जब घोड़े पर संभलना बेहद मुश्किल हो गया, तब उन्होंने बाएं हाथ की तलवार फेंक दी और फुर्ती से घोड़े की लगाम संभाल ली। लेकिन जिस अंग्रेज ने उन पर वार किया था, रानी के दाहिने हाथ की एक ही तलवार ने पलक झपकते ही उस अंग्रेज का अंत कर दिया।
जब सिर का हिस्सा कट गया, फिर भी नहीं रुकीं वो तलवारें
इसके बाद युद्ध का वह खौफनाक दौर आया, जिसकी कल्पना मात्र से आत्मा कांप उठती है।
पीछे से एक अंग्रेज सैनिक ने रानी के सिर पर तलवार से ऐसा भयानक वार किया कि सिर का दाहिना हिस्सा कटकर अलग हो गया और उनकी दाईं आंख बाहर निकल आई।
ज़रा सोचिए एक महिला, जिसके शरीर का एक हिस्सा कट चुका हो, जिसकी आँख बाहर आ गई हो उसने उस स्थिति में क्या किया होगा? कोई भी साधारण इंसान उस दर्द से वहीं ढेर हो जाता, लेकिन वो रानी लक्ष्मीबाई थीं!
वह जमीन पर नहीं गिरीं! उस अकल्पनीय और असहनीय दर्द के बीच भी उन्होंने अपनी आखिरी बची हुई ताकत को समेटा और सामने खड़े उस अंग्रेज पर ऐसा वार किया कि उसका कंधा काटकर हवा में उड़ा दिया।
जब रानी वीरगति को प्राप्त हुईं, तो उनके पास न कोई विशाल फौज बची थी, न ही कोई आलीशान महल। उस विकट परिस्थिति में उनके पास उनके कुछ वफादार साथी थे और उनकी पीठ पर बंधा उनका छोटा सा बालक दामोदर, जो अपनी माँ के लहू से लथपथ शरीर को नम आंखों से देख रहा था।
यह वो बलिदान है, जिसकी कीमत हम कभी नहीं चुका सकते। यह शौर्य गाथा उस महान वीरांगना की है, जिसने जीते-जी तो अंग्रेजों को धूल चटाई ही, बल्कि मरकर भी उन्हें अपनी पवित्र देह को छूने नहीं दिया।
आज जब हम और आप इस आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि इस आज़ादी की कीमत इन महान वीरांगनाओं के खून और अनगिनत ज़ख्मों से चुकाई गई है।
आइए, इस अमर बलिदान को कोटि-कोटि नमन करें
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