इंटरनेट को संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षण प्राप्त
बच्चों की सुरक्षा और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि दोनों अधिकार
बच्चों को इंटरनेट से दूर करने के बजाय हानिकारक सामग्री और उसके जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई
उचित और आनुपातिक सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई गई है।
नई दिल्ली: 20 अक्टूबर 2026
कानपुर: 20 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल करना संविधान के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार बच्चों को भी प्राप्त है और केवल उनकी सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता।
15 अक्टूबर 2026 को Just Rights for Children Alliance बनाम S. Harish मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने इंटरनेट के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षण प्राप्त बताया।
बच्चों की सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए उनके इंटरनेट इस्तेमाल पर पूर्ण या उम्र-आधारित प्रतिबंध लगाना उचित समाधान नहीं है। अदालत के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि बच्चों को दोनों अधिकार प्राप्त हैं।
अदालत ने यह भी माना कि यदि बच्चों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है तो वे इंटरनेट का इस्तेमाल छिपकर कर सकते हैं और संभव है कि वे कम सुरक्षित तथा अनियंत्रित प्लेटफॉर्म की ओर चले जाएं। इससे ऑनलाइन शोषण की घटनाओं की रिपोर्टिंग भी प्रभावित हो सकती है।
पूर्ण प्रतिबंध के बजाय आनुपातिक सुरक्षा उपाय
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए ध्यान बच्चों को इंटरनेट से दूर करने के बजाय हानिकारक सामग्री और उसके जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करने पर होना चाहिए। इसके लिए उचित और आनुपातिक सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई गई है।
फैसले में ऑनलाइन बाल यौन शोषण एवं दुरुपयोग सामग्री (CSEAM) की पहचान और उसे हटाने के लिए तकनीकी तथा प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।
राष्ट्रीय हैश और URL डेटाबेस बनाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को CSEAM की पहचान और तेजी से हटाने में मदद के लिए राष्ट्रीय Hash और URL List Database तैयार करने सहित कई कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही, रिपोर्टिंग व्यवस्था और निगरानी को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।
फैसले का महत्व
यह फैसला ऐसे समय आया है जब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर देश-दुनिया में बहस तेज है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सुरक्षित, जिम्मेदार और नियंत्रित डिजिटल वातावरण तैयार करने पर जोर दिया जाना चाहिए।
इस फैसले में अदालत ने इंटरनेट को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जानकारी, अभिव्यक्ति और विचारों तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम माना है।
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