बाल-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाएं गरिमा, भावनात्मक सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक भलाई को सर्वोच्च प्राथमिकता
माता-पिता की मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट मंगाना अधिक उपयुक्त
माता-पिता की मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट मंगाना अधिक उपयुक्त
बच्चे का मानसिक विकास माता-पिता की स्थिति से गहराई से जुड़ा होता है
पॉक्सो मामलों में कस्टडी विवादों के लिए नए सुरक्षा उपायकानपुर: 24 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली: 24 अक्टूबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कस्टडी विवादों और यौन शोषण के मामलों में बाल पीड़ितों का रूटीन मनोवैज्ञानिक परीक्षण नहीं कराया जाना चाहिए, क्योंकि इससे बच्चे को दोबारा आघात पहुंच सकता है
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने निर्देश दिया कि अदालतें बाल-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाएं और बच्चे की गरिमा, भावनात्मक सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक भलाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दें
पीठ ने कहा कि बच्चे के कल्याण का आकलन करने के लिए दोनों माता-पिता की मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट मंगाना अधिक उपयुक्त है, क्योंकि बच्चे का मानसिक विकास माता-पिता की स्थिति से गहराई से जुड़ा होता है
पॉक्सो मामलों में कस्टडी विवादों के लिए नए सुरक्षा उपाय
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक और कस्टडी विवादों से जुड़े पॉक्सो मामलों में कई सुरक्षा उपाय तय किए
मुख्य बिंदु:एफआईआर दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी, जांच अधिकारी को पहले मामले की परिस्थितियों का आकलन करना होगा बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन स्वतंत्र विशेषज्ञ से कराया जाएगा, लेकिन केवल तभी जब इसकी वास्तविक जरूरत हो
केवल पॉक्सो केस दर्ज होने के आधार पर किसी अभिभावक का कस्टडी दावा स्वतः समाप्त नहीं होगा; अदालत को उपलब्ध सबूतों के आधार पर प्रथमदृष्टया राय बनानी होगी
अदालत ने स्पष्ट किया कि ये उपाय पॉक्सो कानून की सख्ती को कमजोर नहीं करते, बल्कि झूठे आरोपों से होने वाले गंभीर नुकसान को रोकने के लिए हैं
गोद लेने वाले माता-पिता के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए गोद लेने वाले माता-पिता को बच्चा तुरंत सौंपने का निर्देश दिया
अदालत ने कहा कि बच्चे को उसकी जैविक मां ने आर्थिक तंगी के कारण गोद दिया था, और इसे “बेचना” नहीं माना जा सकता।सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक देरी और तकनीकी अड़चनों को खारिज करते हुए कहा कि बच्चे के अधिकार सर्वोपरि हैं ।
इन फैसलों का व्यापक प्रभाव
इन सभी निर्णयों से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट अब:कस्टडी विवादों में बच्चे की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को केंद्र में रख रहा है। पॉक्सो मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दे रहा है।
झूठे आरोपों से होने वाले नुकसान को रोकते हुए वास्तविक पीड़ित बच्चों की सुरक्षा को मजबूत कर रहा है।
गोद लेने की प्रक्रिया में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दे रहा है।
नई दिल्ली: 24 अक्टूबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कस्टडी विवादों और यौन शोषण के मामलों में बाल पीड़ितों का रूटीन मनोवैज्ञानिक परीक्षण नहीं कराया जाना चाहिए, क्योंकि इससे बच्चे को दोबारा आघात पहुंच सकता है
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने निर्देश दिया कि अदालतें बाल-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाएं और बच्चे की गरिमा, भावनात्मक सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक भलाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दें
पीठ ने कहा कि बच्चे के कल्याण का आकलन करने के लिए दोनों माता-पिता की मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट मंगाना अधिक उपयुक्त है, क्योंकि बच्चे का मानसिक विकास माता-पिता की स्थिति से गहराई से जुड़ा होता है
पॉक्सो मामलों में कस्टडी विवादों के लिए नए सुरक्षा उपाय
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक और कस्टडी विवादों से जुड़े पॉक्सो मामलों में कई सुरक्षा उपाय तय किए
मुख्य बिंदु:एफआईआर दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी, जांच अधिकारी को पहले मामले की परिस्थितियों का आकलन करना होगा बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन स्वतंत्र विशेषज्ञ से कराया जाएगा, लेकिन केवल तभी जब इसकी वास्तविक जरूरत हो
केवल पॉक्सो केस दर्ज होने के आधार पर किसी अभिभावक का कस्टडी दावा स्वतः समाप्त नहीं होगा; अदालत को उपलब्ध सबूतों के आधार पर प्रथमदृष्टया राय बनानी होगी
अदालत ने स्पष्ट किया कि ये उपाय पॉक्सो कानून की सख्ती को कमजोर नहीं करते, बल्कि झूठे आरोपों से होने वाले गंभीर नुकसान को रोकने के लिए हैं
गोद लेने वाले माता-पिता के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए गोद लेने वाले माता-पिता को बच्चा तुरंत सौंपने का निर्देश दिया
अदालत ने कहा कि बच्चे को उसकी जैविक मां ने आर्थिक तंगी के कारण गोद दिया था, और इसे “बेचना” नहीं माना जा सकता।सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक देरी और तकनीकी अड़चनों को खारिज करते हुए कहा कि बच्चे के अधिकार सर्वोपरि हैं ।
इन फैसलों का व्यापक प्रभाव
इन सभी निर्णयों से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट अब:कस्टडी विवादों में बच्चे की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को केंद्र में रख रहा है। पॉक्सो मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दे रहा है।
झूठे आरोपों से होने वाले नुकसान को रोकते हुए वास्तविक पीड़ित बच्चों की सुरक्षा को मजबूत कर रहा है।
गोद लेने की प्रक्रिया में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दे रहा है।




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