दोनों नेताओं को 10 अक्टूबर को भी हिरासत में लिया गया था।
शांति बांड पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया था।
बाद में बांड की शर्तों का उल्लंघन करने के आरोप में उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया।
रिहाई का आदेश जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े विवाद को फिर चर्चा में ले आया
नई दिल्ली: 21 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली। दिल्ली की एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने Cockroach Janta Party (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास और अशुतोष रांका को न्यायिक हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया है। दोनों नेताओं को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और शांति बांड के कथित उल्लंघन से जुड़े मामले में हिरासत में रखा गया था। इस घटनाक्रम ने राजधानी में विरोध प्रदर्शनों के अधिकार और प्रशासनिक प्रतिबंधों को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है।
क्या है पूरा मामला?
13 अक्टूबर को सौरव दास और अशुतोष रांका ने जंतर-मंतर के बंद गेट पर चढ़कर राष्ट्रीय ध्वज लहराते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। उनका विरोध जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के फैसले के खिलाफ था।दोनों नेताओं को 10 अक्टूबर को भी हिरासत में लिया गया था। उस समय शांति बांड पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया था। हालांकि, बाद में बांड की शर्तों का उल्लंघन करने के आरोप में उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया।
सात दिन की न्यायिक हिरासत के बाद रिहाई का आदेश
मामले में 14 अक्टूबर को दोनों नेताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। बाद में हिरासत की अवधि दो दिन और बढ़ा दी गई। इस तरह दोनों नेताओं को लगभग सात दिन तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा।
इस दौरान Cockroach Janta Party ने आरोप लगाया कि दोनों की रिहाई में जानबूझकर देरी की जा रही है। पार्टी ने इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में भी चुनौती दी।
हाई कोर्ट में भी उठा शांति बांड का मुद्दा
मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने शांति बांड के कथित उल्लंघन के पहलू पर ध्यान दिलाया। अदालत ने यह भी आगाह किया कि कुछ विरोध प्रदर्शन परिस्थितियों के अनुसार हिंसक रूप ले सकते हैं। ऐसे में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और विरोध करने के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
अब विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत के रिहाई संबंधी आदेश के बाद मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है।
विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर फिर बहस
जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों के विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। ऐसे में प्रदर्शन स्थल से जुड़े नियमों और उन नियमों के विरोध में होने वाले आंदोलनों पर यह मामला व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है।
एक ओर सार्वजनिक स्थलों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और अपनी मांगों को सामने रखने का अधिकार भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
सौरव दास और अशुतोष रांका की रिहाई का आदेश जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े विवाद को फिर चर्चा में ले आया है। आने वाले समय में इस मामले का घटनाक्रम और विरोध प्रदर्शन से संबंधित नियमों पर होने वाली बहस महत्वपूर्ण रहेगी।




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