अनूप शुक्ला महासचिव, कानपुर इतिहास समिति की सोशल मीडिया पोस्ट से

जन्म: 17 जनवरी 1909, कानपुर (सिन्हा भवन, कराची खाना) में मुकुंद कुमार सिन्हा के घर।
शिक्षा: बंगाली स्कूल से प्रारंभिक, क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से उच्च शिक्षा।
क्रांतिकारी जीवन: छात्रावस्था से; (HSRA) की केंद्रीय समिति सदस्य;
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के साथी।
प्रांतीय क्रांतिकारी दलों में एकता की रूपरेखा तैयार करने वाले प्रमुख नेता माने गए।
गिरफ्तारी: 1929 में बरेली में गिरफ्तार; लाहौर षड्यंत्र केस में आजीवन कारावास की सजा।
लाहौर जेल में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए जतिन दास के साथ अनशन।
5 महीने से अधिक का लंबा अनशन (कीर्तिमान)।
1933 में अंडमान सेल्यूलर जेल (काला पानी) भेजे गए, जहाँ अध्ययन गोष्ठियाँ आयोजित कीं।
रिहाई: 1938 में गांधीजी के प्रयासों से स्वास्थ्य कारणों से मुक्त।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल; पत्रकारिता, लेखन और अध्ययन में सक्रिय; भारतीयकम्युनिस्टपार्टीमेंशामिल;पत्रकारिता,
लेखन और अध्ययन में सक्रिय; संकीर्ण राजनीति से दूर
"In Andamans the Indian Bastille" (1939) – अंडमान जेल अत्याचारों का संघर्ष वर्णन
निधन: 16 जुलाई 1992, पटना (बिहार) में।
फिल्म में चित्रण: "द लीजेंड ऑफ भगत सिंह" में सिद्धार्थ हुसैन ने उनका किरदार
पत्नी श्रीराज्यम सिन्हा पुस्तक लिखी: "Bejoy Kumar Sinha: Revolutionary Quest for Sacrifice"
कानपुर 17 जनवरी 2026
Kranti Kumar Katiyar
क्रांतिकारी सिन्हा बंधुओं में से एक
लब्धप्रतिष्ठ क्रांतिकारी विजय कुमार सिन्हा
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श्री विजय कुमार सिन्हा उर्फ बचेलू या बच्चू का जन्म 17 जनवरी 1909 को श्री मुकुंद कुमार उर्फ मार्कंडेय दास सिन्हा व शरतकुमारी सिन्हा के घर सिन्हा भवन 24 /41 कराची खाना कानपुर मे हुआ था | आप की प्रारंभिक शिक्षा एक बंगाली स्कूल में हुई इसके बाद उच्च शिक्षा क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर से प्राप्त हुई थी |
विद्यार्थी अवस्था से ही क्रांतिकारी एवं राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रहे हैं | बिजय दा हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के केंद्रीय समिति के सदस्य थे | राजू दा व विजय दा दोनों भाइयों को क्रांतिकारी दल में शामिल करने का श्रेय सुरेश चंद्र भट्टाचार्य जी को जाता है | बटुकेश्वर दत्त एवं अजय घोष आपके पूर्व सहपाठी रहे थे | सन 1924 में सरदार भगत सिंह जोकि प्रताप प्रेस में बलवंत नाम से काम कर रहे थे के साथ मिले थे | सन 1925 में जब कालेज के विद्यार्थी थे उस समय अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में स्वयंसेवक बने थे | इसी समय आपके भाई को काकोरी षड्यंत्र केस के सिलसिले में गिरफ्तार कर लिया गया था |
आपने भी पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता को अपनाया | जन कार्यो में आप श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के निकट सहयोगी रहे और कानपुर मजदूर सभा को संगठित करने में उनका हाथ बटाया | उन दिनों जहां तक दिन प्रतिदिन अग्रसर हो रहे क्रांतिकारी आंदोलन का संबंध था आप विद्यार्थी जी के निकटतम सहयोगियों में से थे | पुलिस की निगरानी जब आप पर अधिक बढ़ गई तो उसके चुंगल से बच निकलने के लिए आप सन 1928 में कानपुर से फरार हो गए और लगभग 1 वर्ष तक क्रांतिकारी आंदोलन के सिलसिले में पूरे भारत का परिभ्रमण करते रहे | फरारी की अवस्था में ही बरेली में सन 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू से पहली बार मिले थे |
इस समय तक प्रसिद्ध लाहौर षड्यंत्र केस का आरंभ हो चुका था जवाहरलाल जी से मुलाकात के बाद ही आप बरेली में गिरफ्तार हुए और आप पर मुकदमा चला | इस मुकदमे में सरदार भगत सिंह श्री सुखदेव श्री राजगुरु आदि को फांसी की सजा हुई और आपको आजन्म कारावास मिला | आंध्र प्रदेश के राज मुंदरी जेल में आपको रखा गया था | लाहौर षड्यंत्र केस मे जो फैसला पढ़ा गया उसमें आपको ही षड्यंत्र की रूपरेखा तैयार करने वाला तथा प्रांतीय स्तर पर कार्यरत विभिन्न क्रांतिकारी पार्टियों में एकसूत्रता लाने वाला षड्यंत्रकारी नेता घोषित किया गया | मुकदमे की अवधि में राजनीतिक बंदियों के प्रति किए जाने वाले व्यवहार में सुधार के लिए प्रयत्न करते हुए श्री जतिन दास शहीद हो गए बाद में अनेक अवसरों पर श्री सिन्हा ने स्वयं अपने अन्य साथियों के साथ इन बंदियों के हितों की रक्षा के लिए लंबी अवधि तक चलने वाला अनशन किया |यह अनशन 5 महीने से भी ऊपर चला और इस प्रकार भारतीय जेलों में एक कीर्तिमान बना | इस अनशन के फलस्वरुप विधानसभाओं और अखबारों में काफी समय तक हो-हल्ला मचता रहा |
बाद में श्री सिन्हा को जून 1933 में शिव वर्मा जयदेव कपूर आदि के साथ अन्डमन सेल्यूलर जेल भेज दिया गया जहां पर जनवरी 1933 में डॉक्टर गया प्रसाद कटियार , महावीर सिंह ,बटुकेश्वर दत्त एवं कमलनाथ तिवारी पहले से ही भेजे जा चुके थे | जहां उन्होंने 400 से भी अधिक बंदियों के लिए अध्ययन गोष्ठी आयोजित की | यहां से श्री सिन्हा को सन 1938 में फिर वापस भारत भेजा गया | किंतु गांधी जी के व्यक्तिगत प्रयास के फलस्वरूप पंजाब सरकार ने आप को जेल मुक्त कर दिया | आपकी मुक्ति स्वास्थ्य गिर जाने के कारण हुई | इसके तुरंत बाद आप राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य हो गए और सन 1939 में पूरी उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने एकमत से आपको अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के लिए चुना | सन 1940 में आप कानपुर जिले से प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे क्योंकि आप गांव में ही जमकर कार्य करना पसंद करते थे | जिला कांग्रेस कमेटी के भी सक्रिय सदस्य थे | इसी समय सन 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और 1 वर्ष तथा जुर्माने की सजा पाई | यह सजा पूरी हुई तो फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में 4 वर्ष के लिए और नजर बंद कर दिए गए | फिर सितंबर 1945 में जेल से मुक्त हुए | इस प्रकार आपने अपने जीवन के 15 वर्ष जेल में काटे |
सन 1947 के बाद आजादी मिलने के बाद विजय कुमार सिन्हा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए | आपने दिन प्रतिदिन के झगड़े वाली संकीर्ण राजनीति से अपने को पृथक रखा तथा अध्ययन एवं लेखन कार्य में ही लगे रहे | एक राजनीतिक पत्र का भी 3 वर्ष तक संचालन किया | विजय कुमार सिन्हा जी का निधन 16 जुलाई 1992 को पटना बिहार में हुआ था |
क्रांतिकारी विजय कुमार सिन्हा लाहौर षडयंत्र केस मे अंडमान के सेल्यूलर जेल में बंद किए गए थे। उन्होंने अंडमान पर वर्ष 1938 में प्रसिद्ध पुस्तक In Andman the Indian Bastille लिख कर दुनिया को वहां के जुल्म और क्रांतिकारियों के संघर्ष की कहानी भी लिखी । आपकी धर्मपत्नी श्रीराज्यम सिन्हा ने भी विजयदा पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ Bejoy kumar sinha : Revolutionary quest for Sacrifice लिखा ।
फिल्म - "द लीजेंड ऑफ भगत सिंह" में श्री सिद्धार्थ हुसैन ने विजय कुमार सिन्हा का किरदार बहुत ही सुंदर ढंग से निभाया है |

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