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सर्वोच्च न्यायालय: 1 सितंबर 2026 को नीट पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामले में ऐतिहासिक आदेश : अनुच्छेद 142 के तहत देश भर में दर्ज FIRs रद्द

राहत के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 5 सितंबर 2026 के मार्च को वापस ले लिया
कोर्ट ने आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों हेतु 3 माह में मुआवजा नीति बनाने का निर्देश
यह राष्ट्रव्यापी आदेश सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में प्रभावी



कानपुर:5 सितम्बर 2026
नई दिल्ली: 5 सितम्बर 2026
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1 सितंबर 2026 को नीट  पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामले में यह ऐतिहासिक आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की तीन जजों की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए देश भर में दर्ज इन FIRs को रद्द कर दिया।
अदालत के प्रमुख निर्देशों के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के करियर की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है तथा यह राष्ट्रव्यापी आदेश सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में प्रभावी है। इसके तहत अन्य राज्यों के मामलों पर रोक और 20-25 जुलाई के प्रदर्शनों पर नई FIR दर्ज करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है, सिवाय जंतर-मंतर पर फेशियल रिकग्निशन से पहचाने गए 2,873 आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के जिनके खिलाफ दिल्ली पुलिस जांच कर सकेगी।
इस राहत के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 5 सितंबर 2026 के मार्च को वापस ले लिया, और कोर्ट ने आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों हेतु 3 माह में मुआवजा नीति बनाने का निर्देश दिया।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 142 न्यायपालिका को प्रदत्त उस विलक्षण और व्यापक शक्ति का प्रतीक है, जिसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय न केवल विधिक विवादों का निपटारा करता है, बल्कि न्याय के वास्तविक और पूर्ण स्वरूप को सुनिश्चित करने की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। यह प्रावधान न्याय को केवल विधि की संकीर्ण व्याख्या तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि उसे परिस्थितियों के अनुरूप सार्थक, प्रभावी और न्यायोचित बनाने की संवैधानिक क्षमता प्रदान करता है।
पृष्ठभूमि
संविधान-निर्माताओं के समक्ष यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण था कि न्यायपालिका को केवल विधियों की व्याख्या तक सीमित रखा जाए या उसे ऐसे अधिकार भी दिए जाएँ, जिनसे वह न्याय के व्यापक उद्देश्य की पूर्ति कर सके। अनेक बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जहाँ प्रचलित विधियाँ अपर्याप्त सिद्ध हों या न्याय की पूर्ण प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करें। इसी विचार से प्रेरित होकर अनुच्छेद 142 का निर्माण किया गया, ताकि सर्वोच्च न्यायालय को ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप कर “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की शक्ति प्राप्त हो।
यह प्रावधान भारतीय न्यायपालिका की सक्रिय और सृजनात्मक भूमिका को रेखांकित करता है, जो केवल विधिक सीमाओं के भीतर बँधी न रहकर न्याय के व्यापक आदर्शों को साकार करने का प्रयास करती है।
अनुच्छेद 142 को संविधान के अन्य न्यायिक प्रावधानों, विशेषतः अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों के संरक्षण हेतु सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियाँ) और अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका) के साथ जोड़कर देखा जाता है। इन प्रावधानों के समन्वय से यह स्पष्ट होता है कि सर्वोच्च न्यायालय को न केवल न्यायिक समीक्षा का अधिकार प्राप्त है, बल्कि वह न्याय को पूर्ण और प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कदम भी उठा सकता है।
समय-समय पर इस अनुच्छेद का प्रयोग अनेक ऐतिहासिक मामलों में किया गया है, जहाँ न्यायालय ने विधिक सीमाओं से परे जाकर न्याय के व्यापक हित में निर्णय दिए।
मूल पाठ
“ (1) सर्वोच्च न्यायालय अपने समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए ऐसे निर्णय पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है, जैसा वह आवश्यक समझे, और ऐसा कोई भी निर्णय या आदेश भारत के समस्त राज्य-क्षेत्र में प्रवर्तनीय होगा।
(2) संसद द्वारा बनाए गए किसी विधि के अधीन रहते हुए, सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार होगा कि वह अपने आदेशों की उपस्थिति सुनिश्चित करने, किसी व्यक्ति को अपने समक्ष उपस्थित कराने, या किसी दस्तावेज़ के उत्पादन के लिए ऐसे आदेश दे सके, जैसा वह आवश्यक समझे।”
उपयोग
हाल के वर्षों में इस असाधारण शक्ति का प्रयोग कई महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील मामलों में किया गया है, जो न्यायपालिका की सक्रिय और मानवीय भूमिका को उजागर करते हैं।
अनुच्छेद 142 के अंतर्गत “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति का एक अत्यंत चर्चित और संवेदनशील उदाहरण ए. जी. पेरारिवलन के प्रकरण में देखने को मिला। पेरारिवलन, जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्तियों में से एक थे, लंबे समय तक कारावास में रहने के पश्चात न्यायालय के समक्ष राहत की याचना लेकर पहुँचे। परिणामस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय ने पेरारिवलन की रिहाई का आदेश देते हुए यह स्पष्ट किया कि जब प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अनावश्यक रूप से विलंबित हों और व्यक्ति ने लंबा समय कारावास में व्यतीत कर लिया हो, तब न्यायालय का कर्तव्य है कि वह हस्तक्षेप कर “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करे। एक महत्त्वपूर्ण और मानवीय उदाहरण शिल्पा शैलेश एवं वरुण श्रीनिवासन के प्रकरण में देखने को मिला। वर्ष 2014 में इन दोनों ने सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाते हुए यह प्रार्थना की थी कि उनके वैवाहिक संबंध को, जो वस्तुतः पूर्णतः टूट चुका था, न्यायालय अपनी विशेष संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए समाप्त कर दे।
इसी प्रकार तथाकथित “बुलडोजर कार्रवाई” के विरुद्ध दिशा-निर्देश जारी करते हुए न्यायालय ने विधि के शासन और नागरिक अधिकारों की रक्षा को सुदृढ़ किया। शिक्षा के क्षेत्र में भी इस अनुच्छेद का प्रभाव देखा गया, जब समय पर शुल्क जमा न कर पाने के कारण वंचित एक दलित छात्र के प्रवेश को बहाल कर न्यायालय ने समान अवसर के सिद्धांत को साकार किया। वहीं, चंडीगढ़ के महापौर चुनाव परिणामों को पलटने का निर्णय लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक साहसिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आया।
न्यायालय ने मणिपुर के एक कैबिनेट मंत्री को पद से हटाने का निर्देश दिया। यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और उत्तरदायित्व की स्थापना का सशक्त संदेश था।
उदाहरण में मध्य प्रदेश के एक छात्र अथर्व चतुर्वेदी का प्रकरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब सर्वोच्च न्यायालय की पीठ अपनी कार्यवाही समाप्त करने ही वाली थी, उसी समय छात्र ने स्वयं उपस्थित होकर अपनी व्यथा प्रस्तुत की। उसकी परिस्थिति और तर्कों को देखते हुए न्यायाधीशों ने तत्काल रुककर उसकी बात सुनी और संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित सुनवाई के उपरांत उसके पक्ष में निर्णय दिया। न्यायालय ने उसे चिकित्सकीय शिक्षा में प्रवेश प्रदान करने का निर्देश देकर यह स्पष्ट कर दिया कि न्याय केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और त्वरित निष्पादन का भी पर्याय है।

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