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सुप्रीम कोर्ट :तीन साल से पुराने दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या के मामलों की प्राथमिकता से सुनवाई और डिजिटल डैशबोर्ड के जरिए सख्त मॉनिटरिंग का आदेश

राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और हाई कोर्ट्स को 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को रिपोर्ट करने का आदेश
60 से 90 दिनों के भीतर आरोप ) तय करने का प्रयास किया जाए
आरोपी वकील बार-बार सुनवाई टालने की कोशिश करता तो कोर्ट एमिकस क्यूरी नियुक्त कर आगे बढ़ा सकता
एकतरफा फैसले से बचने और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अदालत स्वयं एमिकस क्यूरी नियुक्त करती है। 


कानपुर:27 अगस्त 2026
नई दिल्ली: 27 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की अदालतों को तीन साल से पुराने दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या के मामलों की प्राथमिकता से सुनवाई करने और डिजिटल डैशबोर्ड के जरिए इनकी सख्त मॉनिटरिंग करने का ऐतिहासिक आदेश जारी किया है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने IPC की धारा 304-B (दहेज मृत्यु) व 498-A (दहेज प्रताड़ना) तथा नए कानून BNS (भारतीय न्याय संहिता) की धारा 80 और 85 के तहत दर्ज मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए राज्यों और हाई कोर्ट्स को कड़े दिशा-निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
 पुराने मामलों और समयसीमा पर फोकस3 साल से पुराने केस: जिला न्यायपालिका को तीन साल से अधिक समय से लंबित दहेज से जुड़े मामलों की पहचान करने और उनकी मासिक या त्रैमासिक समीक्षा करने का निर्देश दिया गया है। 
आरोप तय करने की अवधि: चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की जल्द पेशी सुनिश्चित की जाएगी और सामान्यतः 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप (charges) तय करने का प्रयास किया जाएगा।
गवाह कैलेंडर (Witness Calendar): अदालतों को निर्देश दिया गया है कि वे आरोप तय होते ही महत्वपूर्ण गवाहों के लिए एक 'गवाह कैलेंडर' तैयार करें, ताकि साक्ष्य दर्ज करने का क्रम पहले से तय हो सके।
डिजिटल डैशबोर्ड और मॉनिटरिंगऑटोमैटिक अलर्ट: हाई कोर्ट्स को अपने कोर्ट डैशबोर्ड पर इन मामलों की स्टेज-वाइज पेंडेंसी देखने और पुराने मामलों के लिए ऑटोमैटिक अलर्ट व डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने के लिए कहा गया है।
स्थगन (तारीख पर तारीख) पर रोक: अदालतें बिना किसी ठोस कारण के सुनवाई स्थगित (adjourn) नहीं करेंगी। यदि कोई तारीख दी भी जाती है, तो जज को उसका लिखित कारण दर्ज करना होगा।
एमिकस क्यूरी की नियुक्ति: अगर आरोपी पक्ष का वकील बार-बार सुनवाई टालने की कोशिश करता है, तो कोर्ट किसी अन्य वकील को एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) नियुक्त कर मामले को आगे बढ़ा सकता है।
राज्यों के लिए अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report)
सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू कराने के लिए सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और हाई कोर्ट्स को हर साल तीन बार—15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। इन रिपोर्टों में लंबित और निपटाए गए मामलों के वास्तविक आंकड़े देने होंगे।
एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) एक लैटिन शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ "न्यायालय का मित्र" (Friend of the Court) या न्याय मित्र होता है। यह एक ऐसा निष्पक्ष कानूनी विशेषज्ञ, वरिष्ठ वकील या संस्था होती है जो किसी मुकदमे में कोई पक्षकार (वादी या प्रतिवादी) नहीं होती, बल्कि अदालत की सहायता के लिए नियुक्त की जाती है। 
मुख्य भूमिका और कार्यनिष्पक्ष राय देना: यह किसी भी पक्ष का समर्थन किए बिना कानून की सही और सटीक व्याख्या करते हैं। 
तकनीकी पहलुओं को समझाना: जटिल कानूनी या सामाजिक मामलों में न्यायाधीशों को विशेषज्ञ जानकारी और ऐतिहासिक अदालती फैसलों की बारीकियां समझाते हैं।
न्यायालय की सहायता: जनहित याचिकाओं (PIL) या मानवाधिकारों से जुड़े मामलों में अदालत का ध्यान उन कानूनी बिंदुओं की ओर खींचते हैं जो मुख्य पक्षकारों से छूट गए हों। 
दस्तावेजों का अध्ययन: बड़े और जटिल मामलों में कानूनी दस्तावेजों का विस्तृत अध्ययन कर अदालत के लिए संक्षिप्त रिपोर्ट (Amicus Brief) तैयार करते हैं।
एमिकस क्यूरी की नियुक्ति कब की जाती है?
प्रतिनिधित्व न होने पर: जब किसी गंभीर आपराधिक मामले के आरोपी के पास अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील नहीं होता या वह वकील की फीस देने में असमर्थ होता है। 
मामले से हटने या सहयोग न करने पर: यदि कोई आरोपी या पक्षकार अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करता है या सहयोग नहीं करता, तो एकतरफा फैसले से बचने और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अदालत स्वयं एमिकस क्यूरी नियुक्त करती है। 
विशेषज्ञता की आवश्यकता होने पर: जब न्यायाधीश को लगता है कि किसी जनहित या बेहद तकनीकी मामले में एक स्वतंत्र, विद्वान और निष्पक्ष कानूनी राय की जरूरत है।
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