आरोपों का जवाब दे रहे हैं, तो आपको कोई मुख्य कोर्ट फीस नहीं देनी है।
बचाव के बजाय प्रतिवादी खुद का दावा या केस तो मूल्य के अनुसार पूरी कोर्ट फीस देनी होगी
कानपुर:25 अगस्त 2026
किसी भी केस में विपक्षी पार्टी (Opposite Party), प्रतिवादी (Defendant), या रेस्पॉन्डेंट (Respondent) को केवल अपना जवाब (Written Statement / Counter Affidavit) दाखिल करने के लिए कोई मुख्य कोर्ट फीस (Court Fee) नहीं देनी होती है। भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के नियमों के अनुसार, केस फाइल करने और उसकी कोर्ट फीस चुकाने की प्राथमिक जिम्मेदारी हमेशा याचिकाकर्ता (Plaintiff / Petitioner / Appellant) की होती है。 सुप्रीम कोर्ट और अन्य सिविल अदालतों में कुछ विशेष परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ रेस्पॉन्डेंट या डिफेंडेंट को भी कोर्ट फीस देनी पड़ सकती है।
1. सामान्य नियम (जब फीस नहीं देनी होती)जवाब दाखिल करने पर: यदि आप केवल सामने वाली पार्टी के आरोपों का जवाब (Written Statement या Counter Affidavit) दे रहे हैं, तो आपको कोई मुख्य कोर्ट फीस नहीं देनी है।
वकालतनामा और फुटकर अर्जी: केवल वकालतनामा (Vakalatnama) लगाने या छोटी-मोटी अर्जियां (Applications) देने के लिए कुछ बहुत ही मामूली राशि के कोर्ट स्टाम्प (जैसे 10, 20 या 50 रुपये) लगाने होते हैं, जिसे मुख्य कोर्ट फीस नहीं माना जाता।
2. अपवाद (जब रेस्पॉन्डेंट/डिफेंडेंट को कोर्ट फीस देनी होगी)
सुप्रीम कोर्ट और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत निम्नलिखित मामलों में विपक्षी पार्टी पर कोर्ट फीस लागू होती है:
काउंटर क्लेम (Counter-Claim) करने पर: यदि प्रतिवादी (Defendant) केवल अपना बचाव करने के बजाय वादी (Plaintiff) के खिलाफ खुद का कोई नया दावा या केस (Counter-Claim) ठोक देता है, तो उसे उस दावे के मूल्य के अनुसार पूरी कोर्ट फीस देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने आईजेएम कॉर्पोरेशन बनाम लक्ष्मी साई कंस्ट्रक्शंस (2026) मामले में स्पष्ट किया है कि काउंटर क्लेम के लिए सही समय पर कोर्ट फीस चुकाना अनिवार्य है। [
सेट-ऑफ (Set-Off) की मांग करने पर: यदि डिफेंडेंट कोर्ट से मांग करता है कि वादी के पैसों में से उसकी खुद की बकाया राशि का हिसाब (Set-off) किया जाए, तो इस मांग पर भी उसे कोर्ट फीस चुकानी होती है। [1]
क्रॉस-ऑब्जेक्शन (Cross-Objection) दाखिल करने पर: अपीलीय अदालतों या सुप्रीम कोर्ट में यदि रेस्पॉन्डेंट निचली अदालत के किसी फैसले के एक हिस्से के खिलाफ खुद आपत्ति (Cross-Objection) दर्ज कराता है, तो उसे भी अपीलकर्ता की तरह ही नियमानुसार कोर्ट फीस देनी पड़ती है。
सुप्रीम कोर्ट या किसी भी अदालत में केवल एक रेस्पॉन्डेंट के रूप में अपना बचाव कर रहे हैं और अपना जवाब दाखिल कर रहे हैं, तो आपको कोई कोर्ट फीस नहीं देनी है। कोर्ट फीस का विवाद मुख्य रूप से कोर्ट और केस करने वाले के बीच का विषय होता है।
सेट-ऑफ (Set-Off) की मांग करने पर: यदि डिफेंडेंट कोर्ट से मांग करता है कि वादी के पैसों में से उसकी खुद की बकाया राशि का हिसाब (Set-off) किया जाए, तो इस मांग पर भी उसे कोर्ट फीस चुकानी होती है। [1]
क्रॉस-ऑब्जेक्शन (Cross-Objection) दाखिल करने पर: अपीलीय अदालतों या सुप्रीम कोर्ट में यदि रेस्पॉन्डेंट निचली अदालत के किसी फैसले के एक हिस्से के खिलाफ खुद आपत्ति (Cross-Objection) दर्ज कराता है, तो उसे भी अपीलकर्ता की तरह ही नियमानुसार कोर्ट फीस देनी पड़ती है。
सुप्रीम कोर्ट या किसी भी अदालत में केवल एक रेस्पॉन्डेंट के रूप में अपना बचाव कर रहे हैं और अपना जवाब दाखिल कर रहे हैं, तो आपको कोई कोर्ट फीस नहीं देनी है। कोर्ट फीस का विवाद मुख्य रूप से कोर्ट और केस करने वाले के बीच का विषय होता है।




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