एक हिस्सेदार का कब्ज़ा सभी हिस्सेदारों का कब्ज़ा भले एक व्यक्ति जमीन पर खेती कर रहा हो या मकान
केवल लंबे समय तक संपत्ति से दूर रहने या हिस्सा न लेने से हिस्सेदार का अधिकार खत्म नहीं होता।कानपुर:26 अगस्त 2026
लिमिटेशन का समय (जो आमतौर पर 12 वर्ष है) उसी दिन से शुरू होता है जब:किसी हिस्सेदार को उसके हिस्से से स्पष्ट रूप से वंचित (Oust) किया गया हो।
सह-स्वामियों या हिस्सेदारों (Co-sharers / Co-owners) के मामले में लिमिटेशन (परिसिमा) तभी शुरू होती है, जब किसी एक हिस्सेदार को संपत्ति से पूरी तरह और स्पष्ट रूप से बाहर (Oust) कर दिया गया हो।
मुख्य कानूनी बिंदु
संयुक्त कब्ज़ा (Joint Possession): कानूनन, किसी एक हिस्सेदार का कब्ज़ा सभी हिस्सेदारों का कब्ज़ा माना जाता है। भले ही कोई एक व्यक्ति जमीन पर खेती कर रहा हो या मकान में रह रहा हो, वह दूसरों की तरफ से भी काबिज माना जाता है।
लिमिटेशन की शुरुआत: केवल लंबे समय तक संपत्ति से दूर रहने या उसमें हिस्सा न लेने से किसी हिस्सेदार का अधिकार खत्म नहीं होता। लिमिटेशन का समय (जो आमतौर पर 12 वर्ष है) उसी दिन से शुरू होता है जब:किसी हिस्सेदार को उसके हिस्से से स्पष्ट रूप से वंचित (Oust) किया गया हो।
उसके मालिकाना हक (Title) को साफ तौर पर नकारा (Denial) गया हो।
यह इनकार या बेदखली उस हिस्सेदार की जानकारी में आई हो।
साबित करने का भार (Burden of Proof): जो हिस्सेदार यह दावा कर रहा है कि दूसरे का हक खत्म हो चुका है, उसे ही कोर्ट में ठोस सबूतों के साथ साबित करना होगा कि उसने दूसरे हिस्सेदार को स्पष्ट रूप से बाहर कर दिया था।
पैतृक संपत्ति में लिमिटेशन एक्ट, 1963 का अनुच्छेद 110 (Article 110) लागू होता है। इसके अनुसार, पैतृक या संयुक्त परिवार की संपत्ति से बाहर किए गए किसी व्यक्ति को अपना हिस्सा मांगने के लिए 12 वर्ष का समय मिलता है।
यह 12 वर्ष की अवधि तब से शुरू होती है जब:हिस्सेदार को संपत्ति के उसके हिस्से से पूरी तरह बाहर (Excluded) कर दिया गया हो।
मूर्खतापूर्ण बहाने काम नहीं आते:
केवल यह कह देना कि "वह 20 साल से शहर से बाहर था, इसलिए उसका हक खत्म हो गया" कानूनन गलत है। जब तक यह साबित न हो कि उसने हिस्सा मांगा था और बाकी भाइयों/हिस्सेदारों ने साफ मना कर दिया था, तब तक समय-सीमा शुरू नहीं होती।
म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) का खेल: कई बार कोई एक भाई धोखे से पूरी पैतृक जमीन अपने नाम करवा लेता है। कानून के मुताबिक, केवल रेवेन्यू रिकॉर्ड में नाम दर्ज करा लेने से मालिकाना हक नहीं बदलता और न ही इसे स्पष्ट रूप से बाहर करना माना जाता है, जब तक कि पीड़ित हिस्सेदार को इसकी जानकारी न हो।
पैतृक और संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति के मामलों में परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) का अनुच्छेद 110 (Article 110) बिल्कुल लागू होता है।
अनुच्छेद 110 के मुख्य प्रावधान:
किस पर लागू होता है: यदि किसी व्यक्ति को उसकी संयुक्त परिवार या पैतृक संपत्ति के अधिकार/हिस्से से बेदखल या अलग (Excluded) कर दिया गया है, तो अपने हिस्से का दावा करने और बंटवारे (Partition) का मुकदमा दायर करने के लिए यह अनुच्छेद लागू होता है।
समय-सीमा (Limitation Period): इस तरह का मुकदमा दायर करने की सीमा 12 वर्ष है।
समय-सीमा की शुरुआत कब से होती है: 12 साल की गणना उस दिन से शुरू होती है जिस दिन वादी (दावा करने वाले व्यक्ति) को यह स्पष्ट जानकारी होती है कि उसे संपत्ति के अधिकार से बेदखल कर दिया गया है या उसका हिस्सा देने से इनकार कर दिया गया है।
मुख्य बिंदु:
जब तक परिवार में संयुक्त स्वामित्व रहता है और किसी को बेदखल करने की स्पष्ट घोषणा नहीं की जाती, तब तक 12 वर्ष की समय-सीमा शुरू नहीं होती। केवल कब्जा न होने का मतलब यह नहीं है कि बेदखली हो गई है; विपक्षी पक्ष को बेदखली (Ouster) साबित करनी होती है।
मुख्य कानूनी बिंदु
संयुक्त कब्ज़ा (Joint Possession): कानूनन, किसी एक हिस्सेदार का कब्ज़ा सभी हिस्सेदारों का कब्ज़ा माना जाता है। भले ही कोई एक व्यक्ति जमीन पर खेती कर रहा हो या मकान में रह रहा हो, वह दूसरों की तरफ से भी काबिज माना जाता है।
लिमिटेशन की शुरुआत: केवल लंबे समय तक संपत्ति से दूर रहने या उसमें हिस्सा न लेने से किसी हिस्सेदार का अधिकार खत्म नहीं होता। लिमिटेशन का समय (जो आमतौर पर 12 वर्ष है) उसी दिन से शुरू होता है जब:किसी हिस्सेदार को उसके हिस्से से स्पष्ट रूप से वंचित (Oust) किया गया हो।
उसके मालिकाना हक (Title) को साफ तौर पर नकारा (Denial) गया हो।
यह इनकार या बेदखली उस हिस्सेदार की जानकारी में आई हो।
साबित करने का भार (Burden of Proof): जो हिस्सेदार यह दावा कर रहा है कि दूसरे का हक खत्म हो चुका है, उसे ही कोर्ट में ठोस सबूतों के साथ साबित करना होगा कि उसने दूसरे हिस्सेदार को स्पष्ट रूप से बाहर कर दिया था।
पैतृक संपत्ति में लिमिटेशन एक्ट, 1963 का अनुच्छेद 110 (Article 110) लागू होता है। इसके अनुसार, पैतृक या संयुक्त परिवार की संपत्ति से बाहर किए गए किसी व्यक्ति को अपना हिस्सा मांगने के लिए 12 वर्ष का समय मिलता है।
यह 12 वर्ष की अवधि तब से शुरू होती है जब:हिस्सेदार को संपत्ति के उसके हिस्से से पूरी तरह बाहर (Excluded) कर दिया गया हो।
मूर्खतापूर्ण बहाने काम नहीं आते:
केवल यह कह देना कि "वह 20 साल से शहर से बाहर था, इसलिए उसका हक खत्म हो गया" कानूनन गलत है। जब तक यह साबित न हो कि उसने हिस्सा मांगा था और बाकी भाइयों/हिस्सेदारों ने साफ मना कर दिया था, तब तक समय-सीमा शुरू नहीं होती।
म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) का खेल: कई बार कोई एक भाई धोखे से पूरी पैतृक जमीन अपने नाम करवा लेता है। कानून के मुताबिक, केवल रेवेन्यू रिकॉर्ड में नाम दर्ज करा लेने से मालिकाना हक नहीं बदलता और न ही इसे स्पष्ट रूप से बाहर करना माना जाता है, जब तक कि पीड़ित हिस्सेदार को इसकी जानकारी न हो।
पैतृक और संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति के मामलों में परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) का अनुच्छेद 110 (Article 110) बिल्कुल लागू होता है।
अनुच्छेद 110 के मुख्य प्रावधान:
किस पर लागू होता है: यदि किसी व्यक्ति को उसकी संयुक्त परिवार या पैतृक संपत्ति के अधिकार/हिस्से से बेदखल या अलग (Excluded) कर दिया गया है, तो अपने हिस्से का दावा करने और बंटवारे (Partition) का मुकदमा दायर करने के लिए यह अनुच्छेद लागू होता है।
समय-सीमा (Limitation Period): इस तरह का मुकदमा दायर करने की सीमा 12 वर्ष है।
समय-सीमा की शुरुआत कब से होती है: 12 साल की गणना उस दिन से शुरू होती है जिस दिन वादी (दावा करने वाले व्यक्ति) को यह स्पष्ट जानकारी होती है कि उसे संपत्ति के अधिकार से बेदखल कर दिया गया है या उसका हिस्सा देने से इनकार कर दिया गया है।
मुख्य बिंदु:
जब तक परिवार में संयुक्त स्वामित्व रहता है और किसी को बेदखल करने की स्पष्ट घोषणा नहीं की जाती, तब तक 12 वर्ष की समय-सीमा शुरू नहीं होती। केवल कब्जा न होने का मतलब यह नहीं है कि बेदखली हो गई है; विपक्षी पक्ष को बेदखली (Ouster) साबित करनी होती है।




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