भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान कर अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैंभगवान ही काल और ब्रह्मांड के नियंता हैं।
मनुष्य केवल निमित्त मात्र है; वास्तविक कर्ता भगवान हैं।
भक्ति ही भगवान को प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग है।
विराट रूप का दर्शन भक्त को यह समझाता है कि भगवान सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं। कानपुर:09 मार्च 2026
अम्मा जी श्रीमती पद्मा शुक्ला (02 फरवरी 1930 – 02 मार्च 2026)ने 1988 में बड़े भाई सर्वेश शुक्ल जी के असामयिक निधन पर श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 8 का भी अध्ययन किया इस अध्याय को विभूतियोग कहा जाता है। इस अध्याय 11 "विश्वरूप दर्शन योग" में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान कर अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैं। यह अध्याय गीता का सबसे अद्भुत और भावनात्मक अध्याय है, जहाँ अर्जुन भगवान को सम्पूर्ण ब्रह्मांड के रूप में देखता है और उनकी अनन्त शक्ति का अनुभव करता है।
मुख्य बिंदु
श्लोक 1–4:
अर्जुन भगवान से निवेदन करता है कि वे अपने वास्तविक स्वरूप को दिखाएँ।
श्लोक 5–8:
भगवान कहते हैं कि अर्जुन अपनी सामान्य आँखों से उनके विराट रूप को नहीं देख सकता। इसलिए वे अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं।
श्लोक 9–14:
संजय धृतराष्ट्र को वर्णन करते हैं कि अर्जुन ने भगवान का विराट रूप देखा—अनगिनत मुख, नेत्र, अद्भुत आभूषण, दिव्य शस्त्र और तेजस्वी प्रकाश से युक्त।
श्लोक 15–31:
अर्जुन भगवान के विराट रूप में देवताओं, ऋषियों, यज्ञों, लोकों और समस्त ब्रह्मांड को देखता है। वह देखता है कि सभी योद्धा भगवान के मुख में प्रवेश कर रहे हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं। यह दृश्य अर्जुन को भय और विस्मय से भर देता है।
श्लोक 32–34:
भगवान कहते हैं—"मैं काल हूँ, लोकसंहारक। युद्ध में सभी योद्धा पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। तू केवल निमित्त मात्र बन जा।"
श्लोक 35–46:
अर्जुन भयभीत होकर भगवान से विनती करता है कि वे अपने शांत चतुर्भुज रूप में प्रकट हों।
श्लोक 47–55:
भगवान बताते हैं कि उनका विराट रूप किसी ने पहले नहीं देखा। केवल अनन्य भक्ति से ही उन्हें इस रूप में देखा जा सकता है। अंत में वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि जो भक्त प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करता है, वही उन्हें प्राप्त करता है।
मुख्य संदेशभगवान ही काल और ब्रह्मांड के नियंता हैं।
मनुष्य केवल निमित्त मात्र है; वास्तविक कर्ता भगवान हैं।
भक्ति ही भगवान को प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग है।
विराट रूप का दर्शन भक्त को यह समझाता है कि भगवान सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं।
अध्याय 11 का महत्वयह अध्याय गीता का पराकाष्ठा है, जहाँ भगवान अपनी अनन्त शक्ति का प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं।
अर्जुन को यह शिक्षा मिलती है कि युद्ध में उसका कार्य केवल साधन बनना है; परिणाम पहले ही भगवान द्वारा निश्चित है।
यह अध्याय भक्त को भय और श्रद्धा दोनों का अनुभव कराता है—भय भगवान की अपार शक्ति से और श्रद्धा उनकी करुणा से।
अध्याय की संक्षेप मे प्रति श्लोक समीक्षा इस प्रकार है ।
श्लोक- 1
(अर्जुन उवाच)
मदनुग्रहाय, परमम्, गुह्यम्, अध्यात्मस×िज्ञतम्,
यत्, त्वया, उक्तम्, वचः, तेन, मोहः, अयम्, विगतः, मम।।1।।
अनुवाद: (त्वया) आपने (अनुग्रहाय) कृप्या करने के लिए (मत्) शास्त्रों के अनुकूल विचार (यत्) जो (परमम्) श्रेष्ठ (गुह्यम्) गुप्त (अध्यात्मस×िज्ञतम्) अध्यात्मिकविषयक (वचः) वचन अर्थात् उपदेश (उक्तम्) कहा (तेन) उससे (मम) मेरा (अयम्) यह (मोहः) मोह (विगतः) नष्ट हो गया। (1)
हिन्दी: आपने कृप्या करने के लिए शास्त्रों के अनुकूल विचार जो श्रेष्ठ गुप्त अध्यात्मिकविषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया।
श्लोक- 2
भवाप्ययौ, हि, भूतानाम्, श्रुतौ, विस्तरशः, मया,
त्वत्तः, कमलपत्रक्ष, माहात्म्यम्, अपि, च, अव्ययम्।।2।।
अनुवाद: (हि) क्योंकि (कमलपत्रक्ष) हे कमलनेत्र! (मया) मैंने (त्वत्तः) आपसे (भूतानाम्) प्राणियोंकी (भवाप्ययौ) उत्पति और प्रलय (विस्तरशः) विस्तारपूर्वक (श्रुतौ) सुने हैं (च) तथा आपकी (अव्ययम्) अविनाशी (माहात्म्यम्) महिमा (अपि) भी सुनी है। (2)
हिन्दी: क्योंकि हे कमलनेत्र! मैंने आपसे प्राणियोंकी उत्पति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है।
श्लोक- 3
एवम्, एतत्, यथा, आत्थ, त्वम्, आत्मानम्, परमेश्वर,
द्रष्टुम्, इच्छामि, ते, रूपम्, ऐश्वरम्, पुरुषोत्तम।।3।।
अनुवाद: (परमेश्वर) हे परमेश्वर! (त्वम्) आप (आत्मानम्) अपनेको (यथा) जैसा (आत्थ) कहते हैं (एतत्) यह ठीक (एवम्) ऐसा ही है परंतु (पुरुषोत्तम) हे पुरुषोत्तम्! (ते) आपके (ऐश्वरम्, रूपम्) ज्ञान, ऐश्वर्य, याक्ति, बल, वीर्य और तेजसे युक्त ईश्वरीय-रूपको मैं प्रत्यक्ष (द्रष्टुम्) देखना (इच्छामि) चाहता हूँ। (3)
हिन्दी: हे परमेश्वर! आप अपनेको जैसा कहते हैं यह ठीक ऐसा ही है परंतु हे पुरुषोत्तम्! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, याक्ति, बल, वीर्य और तेजसे युक्त ईश्वरीय-रूपको मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।
श्लोक- 4
मन्यसे, यदि, तत्, शक्यम्, मया, द्रष्टुम्, इति, प्रभो,
योगेश्वर, ततः, मे, त्वम्, दर्शय, आत्मानम्, अव्ययम्।।4।।
अनुवाद: (प्रभो) हे प्रभो! (यदि) यदि (मया) मेरेद्वारा (तत्) आपका वह रूप (द्रष्टुम्) देखा जाना (शक्यम्) शक्य है (इति) ऐसा (मन्यसे) आप मानते है (ततः) तो (योगेश्वर) हे योगेश्वर! (त्वम्) आप (आत्मानम् अव्ययम्) असली अविनाशी स्वरूप के (मे) मुझे (दर्शय) दर्शन कराइये। (4)
हिन्दी: हे प्रभो! यदि मेरेद्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है ऐसा आप मानते हंै तो हे योगेश्वर! आप असली अविनाशी स्वरूप के मुझे दर्शन कराइये।
श्लोक- 5
(श्रीकृष्ण उवाच)
पश्य, मे, पार्थ, रूपाणि, शतशः, अथ, सहस्त्रशः,
नानाविधानि, दिव्यानि, नानावर्णाकृतीनि, च।।5।।
अनुवाद: (पार्थ) हे पार्थ! (अथ) अब तू (मे) मेरे (शतशः, सहस्त्रशः) सैकड़ों हजारों (नानाविधानि) नाना प्रकारके (च) और (नानावर्णाकृतीनि) नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले (दिव्यानि) अलौकिक (रूपाणि) रूपोंको (पश्य) देख। (5)
हिन्दी: हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों हजारों नाना प्रकारके और नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले अलौकिक रूपोंको देख।
श्लोक- 6
पश्य, आदित्यान्, वसून्, रुद्रान्, अश्विनौ, मरुतः, तथा,
बहूनि, अदृष्टपूर्वाणि, पश्य, आश्चर्याणि, भारत।।6।।
अनुवाद: (भारत) हे भरतवंशी अर्जुन! मुझमें (आदित्यान्) आदित्योंको अर्थात् अदितिके द्वादश पुत्रोंको (वसून्) आठ वसुओंको (रुद्रान्) एकादश रुद्रोंको (अश्विनौ) दोनों अश्विनीकुमारोंको और (मरुतः) उनचास मरुद्रणोंको (पश्य) देख (तथा) तथा और भी (बहूनि) बहुत से (अदृष्टपूर्वाणि) पहले न देखे हुए (आश्चर्याणि) आश्चर्यमय रूपोंको (पश्य) देख। (6)
हिन्दी: हे भरतवंशी अर्जुन! मुझमें आदित्योंको अर्थात् अदितिके द्वादश पुत्रोंको आठ वसुओंको एकादश रुद्रोंको दोनों अश्विनीकुमारोंको और उनचास मरुद्रणोंको देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपोंको देख।
श्लोक- 7
इह, एकस्थम्, जगत्, कृृत्स्न्नम्, पश्य, अद्य, सचराचरम्,
मम, देहे, गुडाकेश, यत्, च, अन्यत्, द्रष्टुम्, इच्छसि।।7।।
अनुवाद: (गुडाकेश) हे अर्जुन! (अद्य) अब (इह) इस (मम) मेरे (देहे) शरीरमें (एकस्थम्) एक जगह स्थित (सचराचरम्) चराचरसहित (कृृत्स्न्नम्) सम्पूर्ण (जगत्) जगत्को (पश्य) देख तथा (अन्यत्) और (च) भी (यत्) जो कुछ (द्रष्टुम्) देखना (इच्छसि) चाहता हो सो देख। (7)
हिन्दी: हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीरमें एक जगह स्थित चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख।
श्लोक- 8
न, तु, माम्, शक्यसे, द्रष्टुम्, अनेन, एव, स्वचक्षुषा,
दिव्यम्, ददामि, ते, चक्षुः, पश्य, मे, योगम्, ऐश्वरम्।।8।।
अनुवाद: (तु) परंतु (माम्) मुझको तू (अनेन) इन (स्वचक्षुषा) अपने प्राकृत नेत्रोंद्वारा (द्रष्टुम्) देखनेमें (एव) निःसंदेह (न,शक्यसे) समर्थ नहीं है इसीसे मैं (ते) तुझे (दिव्यम्) दिव्य अर्थात् अलौकिक (चक्षुः) चक्षु (ददामि) देता हूँ उससे तू (मे) मेरी (ऐश्वरम्) ईश्वरीय (योगम्) योगशक्तिको (पश्य) देख। (8)
हिन्दी: परंतु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रोंद्वारा देखनेमें निःसंदेह समर्थ नहीं है इसीसे मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक चक्षु देता हूँ उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्तिको देख।
श्लोक- 9
(संजय उवाच)
एवम्, उक्त्वा, ततः, राजन्, महायोगेश्वरः, हरिः,
दर्शयामास, पार्थाय, परमम्, रूपम्, ऐश्वरम्।।9।।
अनुवाद: (राजन्) हे राजन्! (महायोगेश्वरः) महायोगेश्वर और (हरिः) भगवान्ने (एवम्) इस प्रकार (उक्त्वा) कहकर (ततः) उसके पश्चात् (पार्थाय) अर्जुनको (परमम्) परम (ऐश्वरम्) ऐश्वर्ययुक्त (रूपम्) स्वरूप (दर्शयामास) दिखलाया। (9)
हिन्दी: हे राजन्! महायोगेश्वर और भगवान्ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात् अर्जुनको परम ऐश्वर्ययुक्त स्वरूप दिखलाया।
श्लोक- 10-11
अनेकवक्त्रनयनम्, अनेकाद्भुतदर्शनम्,
अनेकदिव्याभरणम्, दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।10।।
दिव्यमाल्याम्बरधरम्, दिव्यगन्धानुलेपनम्,
सर्वाश्चर्यमयम्, देवम्, अनन्तम्, विश्वतोमुखम्।।11।।
अनुवाद: (अनेकवक्त्रनयनम्) अनेक मुख और नेत्रोंसे युक्त (अनेकाद्भुतदर्शनम्) अनेक अद्धभुत दर्शनोंवाले (अनेकदिव्याभरणम्) बहुत से दिव्य भूषणोंसे युक्त और (दिव्यानेकोद्यतायुधम्) बहुत से दिव्य शस्त्रोंको हाथोंमें उठाये हुए (दिव्य माल्याम्बरधरम्) दिव्य माला और वस्त्रोंको धारण किये हुए और (दिव्यगन्धानुलेपनम्) दिव्य गन्धका सारे शरीरमें लेप किये हुए (सर्वाश्चर्यमयम्) सब प्रकारके आश्चयर्कोंसे युक्त (अनन्तम्) सीमारहित और (विश्वतोमुखम्) सब ओर मुख किये हुए विराट्स्वरूप (देवम्) भगवान को अर्जुनने देखा। (10-11)
हिन्दी: अनेक मुख और नेत्रोंसे युक्त अनेक अद्धभुत दर्शनोंवाले बहुत से दिव्य भूषणोंसे युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रोंको हाथोंमें उठाये हुए दिव्य माला और वस्त्रोंको धारण किये हुए और दिव्य गन्धका सारे शरीरमें लेप किये हुए सब प्रकारके आश्चयर्कोंसे युक्त सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराट्स्वरूप भगवान को अर्जुनने देखा।
श्लोक- 12
दिवि, सूर्यसहस्त्रस्य, भवेत्, युगपत्, उत्थिता,
यदि, भाः, सदृशी, सा, स्यात्, भासः, तस्य, महात्मनः।।12।।
अनुवाद: (दिवि) आकाशमें (सूर्यसहस्त्रस्य) हजार सूर्योंके (युगपत्) एक साथ (उत्थिता) उदय होनेसे उत्पन्न जो (भाः) प्रकाश (भवेत्) हो (सा) वह भी (तस्य) उस (महात्मनः) परमात्माके (भासः) प्रकाशके (सदृशी) सदृश (यदि) कदाचित् ही (स्यात्) हो। (12)
हिन्दी: आकाशमें हजार सूर्योंके एक साथ उदय होनेसे उत्पन्न जो प्रकाश हो वह भी उस परमात्माके प्रकाशके सदृश कदाचित् ही हो।
श्लोक- 13
तत्र, एकस्थम्, जगत्, कृत्स्न्नम्, प्रविभक्तम्, अनेकधा,
अपश्यत्, देवदेवस्य, शरीरे, पाण्डवः, तदा।।13।।
अनुवाद: (पाण्डवः) पाण्डुपुत्र अर्जुनने (तदा) उस समय (अनेकधा) अनेक प्रकार से (प्रविभक्तम्) विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् (कृत्स्न्नम्) सम्पूर्ण (जगत्) जगत्को (देवदेवस्य) देवोंके देव श्रीकृृष्णभगवान्के (तत्र) उस (शरीरे) शरीरमें (एकस्थम्) एक जगह स्थित (अपश्यत्) देखा। (13)
हिन्दी: पाण्डुपुत्र अर्जुनने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात् पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण जगत्को देवोंके देव श्रीकृष्णभगवान्के उस शरीरमें एक जगह स्थित देखा।
श्लोक- 14
ततः, सः, विस्मयाविष्टः, हृष्टरोमा, धन×जयः,
प्रणम्य, शिरसा, देवम्, कृृता×जलिः, अभाषत।। 14।।
अनुवाद: (ततः) उसके अनन्तर (सः) वह (विस्मयाविष्टः) आश्चर्यसे चकित और (हृष्टरोमा) पुलकित शरीर (धन×जयः) अर्जुन (देवम्) काल देव से (शिरसा) सिरसे (प्रणम्य) प्रणाम करके (कृता×जलिः) हाथ जोड़कर (अभाषत) बोला। (14)
हिन्दी: उसके अनन्तर वह आश्चर्यसे चकित और पुलकित शरीर अर्जुन काल देव से सिरसे प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।
श्लोक- 15
(अर्जुन उवाच)
पश्यामि, देवान्, तव, देव, देहे, सर्वान्, तथा, भूतविशेषसंघान्, ब्रह्माणम्,
ईशम्, कमलासनस्थम्, ऋषीन्, च, सर्वान्, उरगान्, च, दिव्यान्।।15।।
अनुवाद: (देव) हे देव! (तव) आपके (देहे) शरीरमें (सर्वान्) सम्पूर्ण (देवान्) देवोंको (तथा) तथा (भूतविशेषसंघान्) अनेक भूतोंके समुदायोंको (कमलासनस्थम्) कमलके आसनपर विराजित (ब्रह्माणम्) ब्रह्माको (ईशम्) महादेवको (च) और (सर्वान्) सम्पूर्ण (ऋषीन्) ऋषियोंको (च) तथा (दिव्यान्) दिव्य (उरगान्) सर्पोंको (पश्यामि) देखता हूँ। (15)
हिन्दी: हे देव! आपके शरीरमें सम्पूर्ण देवोंको तथा अनेक भूतोंके समुदायोंको कमलके आसनपर विराजित ब्रह्माको महादेवको और सम्पूर्ण ऋषियोंको तथा दिव्य सर्पोंको देखता हूँ।
श्लोक- 16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्, पश्यामि, त्वाम्, सर्वतः, अनन्तरूपम्, न, अन्तम्,
न, मध्यम्, न, पुनः, तव, आदिम्, पश्यामि, विश्वेश्वर, विश्वरूप।।16।।
अनुवाद: (विश्वेश्वर) हे सम्पूर्ण विश्वके स्वामिन्! (त्वाम्) आपको (अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्) अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रोंसे युक्त तथा (सर्वतः) सब ओरसे (अनन्तरूपम्) अनन्त रूपोंवाला (पश्यामि) देखता हूँ। (विश्वरूप) हे विश्वरूप! मैं (तव) आपके (न) न (अन्तम्) अन्तको (पश्यामि) देखता हूँ (न) न (मध्यम्) मध्यको (पुनः) और (न) न (आदिम्) आदिको ही। (16)
हिन्दी: हे सम्पूर्ण विश्वके स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रोंसे युक्त तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्तको देखता हूँ न मध्यको और न आदिको ही।
श्लोक- 17
किरीटिनम्, गदिनम्, चक्रिणम्, च, तेजोराशिम्, सर्वतः, दीप्तिमन्तम्,
पश्यामि, त्वाम्, दुर्निरीक्ष्यम्, समन्तात्, दीप्तानलार्कद्युतिम्, अप्रमेयम्।।17।।
अनुवाद: (त्वाम्) आपको मैं (किरीटिनम्) मुकुटयुक्त (गदिनम्) गदायुक्त (च) और (चक्रिणम्) चक्रयुक्त तथा (सर्वतः) सब ओरसे (दीप्तिमन्तम्) प्रकाशमान (तेजोराशिम्) तेज पुंज के (दीप्तानलार्कद्युतिम्) प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृृश ज्योतियुक्त (दुर्निरीक्ष्यम्) कठिनतासे देखे जाने योग्य और (समन्तात्) सब ओरसे (अप्रमेयम्) अप्रमेयस्वरूप (पश्यामि) देखता हूँ। (17)
हिन्दी: आपको मैं मुकुटयुक्त गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओरसे प्रकाशमान तेज पुंज के प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त कठिनतासे देखे जाने योग्य और सब ओरसे अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ।
श्लोक- 18
त्वम्, अक्षरम्, परमम्, वेदितव्यम्, त्वम्, अस्य, विश्वस्य, परम्, निधानम्, त्वम्,
अव्ययः, शाश्वतधर्मगोप्ता, सनातनः, त्वम्, पुरुषः, मतः, मे।।18।।
अनुवाद: (त्वम्) आप ही (वेदितव्यम्) जानने योग्य (परमम्) परम (अक्षरम्) अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं (त्वम्) आप ही (अस्य) इस (विश्वस्य) जगत्के (परम्) परम (निधानम्) आश्रय हैं (त्वम्) आप ही (शाश्वतधर्मगोप्ता) अनादि धर्मके रक्षक हैं और (त्वम्) आप ही (अव्ययः) अविनाशी (सनातनः) सनातन (पुरुषः) पुरुष हैं ऐसा (मे) मेरा (मतः) मत है। (18)
हिन्दी: आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं आप ही इस जगत्के परम आश्रय हैं आप ही अनादि धर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं ऐसा मेरा मत है।
श्लोक- 19
अनादिमध्यान्तम्, अनन्तवीर्यम्, अनन्तबाहुम्, शशिसूर्यनेत्रम्,
पश्यामि, त्वाम्, दीप्तहुताशवक्त्रम्, स्वतेजसा, विश्वम्, इदम्, तपन्तम्।।19।।
अनुवाद: (त्वाम्) आपको (अनादिमध्यान्तम्) आदि, अन्त और मध्यसे रहित, (अनन्तवीर्यम्) अनन्त सामथ्र्यसे युक्त (अनन्तबाहुम्) अनन्त भुजावाले (शशिसूर्यनेत्रम्) चन्द्र सूर्यरूप नेत्रोंवाल (दीप्तहुताशवक्त्रम्) प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और (स्वतेजसा) अपने तेजसे (इदम्) इस (विश्वम्) जगत्को (तपन्तम्) संतप्त करते हुए (पश्यामि) देखता हूँ। (19)
हिन्दी: आपको आदि, अन्त और मध्यसे रहित, अनन्त सामथ्र्यसे युक्त अनन्त भुजावाले चन्द्र सूर्यरूप नेत्रोंवाल प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेजसे इस जगत्को संतप्त करते हुए देखता हूँ।
श्लोक- 20
द्यावापृृथिव्योः, इदम्, अन्तरम्, हि, व्याप्तम्, त्वया, एकेन, दिशः, च, सर्वाः,
दृष्टवा, अद्भुतम्, रूपम्, उग्रम्, तव, इदम्, लोकत्रयम्, प्रव्यथितम्, महात्मन्।। 20।।
अनुवाद: (महात्मन्) हे महात्मन्! (इदम्) यह (द्यावापृथिव्योः, अन्तरम्) स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका सम्पूर्ण आकाश (च) तथा (सर्वाः) सब (दिशः) दिशाएँ (एकेन) एक (त्वया) आपसे (हि) ही (व्याप्तम्) परिपूर्ण हैं तथा (तव) आपके (इदम्) इस (अद्भुतम्) अलौकिक और (उग्रम्) भयंकर (रूपम्) रूपको (दृृष्टवा) देखकर (लोकत्रयम्) तीनों लोक (प्रव्यथितम्) अति व्यथाको प्राप्त हो रहे हैं। (20)
हिन्दी: हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूपको देखकर तीनों लोक अति व्यथाको प्राप्त हो रहे हैं।
श्लोक- 21
अमी, हि, त्वाम्, सुरसंघा, विशन्ति, केचित्, भीताः।
प्रा×जलयः, ग ृृणन्ति, स्वस्ति, इति, उक्त्वा, महर्षिसिद्धसंघाः,
स्तुवन्ति, त्वाम्, स्तुतिभिः, पुष्कलाभिः।।21।।
अनुवाद: (अमी) वे ही (सुरसंघा हि) देवताओंके समूह (त्वाम्) आपमें (विशन्ति) प्रवेश करते हैं और (केचित्) कुछ (भीताः) भयभीत होकर (प्रा×जलयः) हाथ जोड़े (ग ृणन्ति) उच्चारण करते हैं तथा (महर्षिसिद्धसंघाः) महर्षि और सिद्धोंके समुदाय (स्वस्ति) ‘कल्याण हो‘ (इति) ऐसा (उक्त्वा) कहकर (पुष्कलाभिः) उत्तम-उत्तम (स्तुतिभिः) स्तोत्रोंद्वारा (त्वाम्) आपकी (स्तुवन्ति) स्तुति करते हैं। फिर भी आप उन्हें खा रहे हो। (21)
हिन्दी: वे ही देवताओंके समूह आपमें प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धोंके समुदाय ‘कल्याण हो‘ ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति करते हैं। फिर भी आप उन्हें खा रहे हो।
श्लोक- 22
रुद्रादित्याः, वसवः, ये, च, साध्याः, विश्वे, अश्विनौ, मरुतः, च, ऊष्मपाः,
च, गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः, वीक्षन्ते, त्वाम्, विस्मिताः, च, एव, सर्वे।।22।।
अनुवाद: (ये) जो (रुद्रादित्याः) ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य (च) और (वसवः) आठ वसु, (साध्याः) साधकगण, (विश्वे) विश्वेदेव, (अश्विनौ) अश्विनीकुमार (च) तथा (मरुतः) मरुदग्ण (च) और (ऊष्मपाः) पितरोंका समुदाय (च) तथा (गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा) गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धोंके समुदाय हैं वे (सर्वे) सब (एव) ही (विस्मिताः) विस्मित होकर (त्वाम्) आपको (वीक्षन्ते) देखते है। (22)
हिन्दी: जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य और आठ वसु, साधकगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुदग्ण और पितरोंका समुदाय तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धोंके समुदाय हैं वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते है।
श्लोक- 23
रूपम्, महत्, ते, बहुवक्त्रनेत्राम्, महाबाहो, बहुबाहूरुपादम्,
बहूदरम्, बहुदंष्ट्राकरालम्, दृृष्टवा, लोकाः, प्रव्यथिताः, तथा, अहम्।।23।।
अनुवाद: (महाबाहो) हे महाबाहो (ते) आपके (बहुवक्त्रनेत्राम्) बहुत मुख और नेत्रोंवाले (बहुबाहूरुपादम्) बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले (बहूदरम्) बहुत उदरोंवाले और (बहुदंष्ट्राकरालम्) बहुत-सी दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल (महत्) महान् (रूपम्) रूपको (दृष्टवा) देखकर (लोकाः) सब लोग (प्रव्यथिताः) व्याकुल हो रहे हैं (तथा) तथा (अहम) मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। (23)
हिन्दी: हे महाबाहो आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले बहुत उदरोंवाले और बहुत-सी दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल महान् रूपको देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
श्लोक- 24
नभःस्पृशम्, दीप्तम्, अनेकवर्णम्, व्यात्ताननम्, दीप्तविशालनेत्राम्,
दृष्टवा, हि, त्वाम्, प्रव्यथितान्तरात्मा, धृृतिम्, न, विन्दामि, शमम्, च, विष्णो।।24।।
अनुवाद: (हि) क्योंकि (विष्णो) हे विष्णो! (नभःस्पृशम्) आकाशको स्पर्श करनेवाले, (दीप्तम्) देदीप्यमान, (अनेकवर्णम्) अनेक वर्णोंसे युक्त तथा (व्यात्ताननम्) फैलाये हुए मुख और (दीप्तविशालनेत्राम्) प्रकाशमान विशाल नेत्रोंसे युक्त (त्वाम्) आपको (दृष्टवा) देखकर (प्रव्यथितान्तरात्मा) भयभीत अन्तःकरणवाला मैं (धृृतिम्) धीरज (च) और (शमम्) शान्ति (न) नहीं (विन्दामि) पाता हूँ। (24)
हिन्दी: क्योंकि हे विष्णो! आकाशको स्पर्श करनेवाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णोंसे युक्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रोंसे युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ।
श्लोक- 25
दंष्ट्राकरालानि, च, ते, मुखानि, दृष्टवा, एव, कालानलसन्निभानि,
दिशः, न, जाने, न, लभे, च, शर्म, प्रसीद, देवेश, जगन्निवास।।25।।
अनुवाद: (दंष्ट्राकरालानि) दाढ़ोंके कारण विकराल (च) और (कालानलसन्निभानि) प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित (ते) आपके (मुखानि) मुखोंको (दृष्टवा) देखकर मैं (दिशः) दिशाओंको (न) नहीं (जाने) जानता हूँ (च) और (शर्म) सुख (एव) भी (न) नहीं (लभे) पाता हूँ इसलिए (देवेश) हे देवेश! (जगन्निवास) हे जगन्निवास! आप (प्रसीद) प्रसन्न हों। (25)
हिन्दी: दाढ़ोंके कारण विकराल और प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित आपके मुखोंको देखकर मैं दिशाओंको नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
श्लोक- 26-27
अमी, च, त्वाम्, धृतराष्ट्रस्य, पुत्रः, सर्वे, सह, एव, अवनिपालसंघैः,
भीष्मः, द्रोणः, सूतपुत्रः, तथा, असौ, सह, अस्मदीयैः, अपि, योधमुख्यैः।।26।।
वक्त्राणि, ते, त्वरमाणाः, विशन्ति, दंष्ट्राकरालानि, भयानकानि, केचित्,
विलग्नाः, दशनान्तरेषु, संदृश्यन्ते, चूर्णितैः, उत्तमांगैः।।27।।
अनुवाद: (अमी) वे (सर्वे, एव) सभी (धृृतराष्ट्रस्य) धृतराष्ट्रके (पुत्रः) पुत्र (अवनिपालसंघैः, सह) राजाओंके समुदायसहित (त्वाम्) आपमें प्रवेश कर रहे हैं (च) और (भीष्मः) भीष्मपितामह, (द्रोणः) द्रोणाचार्य (तथा) तथा (असौ) वह (सूतपुत्रः) कर्ण और (अस्मदीयैः) हमारे पक्षके (अपि) भी (योधमुख्यैः) प्रधान योद्धाओंके (सह) सहित सबकेसब (ते) आपके (दंष्ट्राकरालानि) दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानकानि) भयानक (वक्त्राणि) मुखोंमें (त्वरमाणाः) बड़े वेगसे दौड़ते हुए (विशन्ति) प्रवेश कर रहे हैं और (केचित्) कई एक (चूर्णितैः) चूर्ण हुए (उत्तमांगैः) सिरोंसहित आपके (दशनान्तरेषु) दाँतोंके बीचमें (विलग्नाः) लगे हुए (संदृश्यन्ते) दीख रहे हैं। (26-27)
हिन्दी: वे सभी धृतराष्ट्रके पुत्र राजाओंके समुदायसहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्षके भी प्रधान योद्धाओंके सहित सबकेसब आपके दाढ़ोंके कारण विकराल भयानक मुखोंमें बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें लगे हुए दीख रहे हैं।
श्लोक- 28
यथा, नदीनाम्, बहवः, अम्बुवेगाः, समुद्रम्, एव, अभिमुखाः, द्रवन्ति, तथा,
तव, अमी, नरलोकवीराः, विशन्ति, वक्त्राणि, अभिविज्वलन्ति।।28।।
अनुवाद: (यथा) जैसे (नदीनाम्) नदियोंके (बहवः) बहुतसे (अम्बुवेगाः) जलके प्रवाह स्वाभाविक ही (समुद्रम्) समुद्रके (एव) ही (अभिमुखाः) सम्मुख (द्रवन्ति) दौड़ते हैं अर्थात् समुद्रमें प्रवेश करते हैं, (तथा) वैसे ही (अमी) वे (नरलोकवीराः) नरलोक अर्थात् इस पृृथ्वी लोक के वीर भी (तव) आपके (अभिविज्वलन्ति) प्रज्वलित (वक्त्राणि) मुखोंमें (विशन्ति) प्रवेश कर रहे हैं। (28)
हिन्दी: जैसे नदियोंके बहुतसे जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात् समुद्रमें प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक अर्थात् इस पृृथ्वी लोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।
श्लोक- 29
यथा, प्रदीप्तम्, ज्वलनम्, पतंगाः, विशन्ति, नाशाय, समृद्धवेगाः,
तथा, एव, नाशाय, विशन्ति, लोकाः, तव, अपि, वक्त्राणि, समृद्धवेगाः।।29।।
अनुवाद: (यथा) जैसे (पतंगाः) पतंग मोहवश (नाशाय) नष्ट होनेके लिये (प्रदीप्तम्) प्रज्वलित (ज्वलनम्) अग्निमें (समृद्धवेगाः) अति वेगसे दौड़ते हुए (विशन्ति) प्रवेश करते हैं, (तथा) वैसे (एव) ही ये (लोकाः) सब लोग (अपि) भी (नाशाय) अपने नाशके लिये (तव) आपके (वक्त्राणि) मुखोंमें (समृृद्धवेगाः) अति वेगसे दौड़ते हुए (विशन्ति) प्रवेश कर रहे हैं। (29)
हिन्दी: जैसे पतंग मोहवश नष्ट होनेके लिये प्रज्वलित अग्निमें अति वेगसे दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाशके लिये आपके मुखोंमें अति वेगसे दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।
श्लोक- 30
लेलिह्यसे, ग्रसमानः, समन्तात्, लोकान्, समग्रान्, वदनैः, ज्वलद्भिः,
तेजोभिः, आपूर्य, जगत्, समग्रम्, भासः, तव, उग्राः, प्रतपन्ति, विष्णो।।30।।
अनुवाद: (समग्रान्) सम्पूर्ण (लोकान्) लोकोंको (ज्वलद्भिः) प्रज्वलित (वदनैः) मुखोंद्वारा (ग्रसमानः) ग्रास करते हुए (समन्तात्) सब ओरसे (लेलिह्यसे) बार-बार चाट रहे हैं, (विष्णो) हे विष्णो! (तव) आपका (उग्राः) भयानक (भासः) प्रकाश (समग्रम्) सम्पूर्ण (जगत्) जगत्को (तेजोभिः) तेजके द्वारा (आपूर्य) परिपूर्ण करके (प्रतपन्ति) तपा रहा है। (30)
हिन्दी: सम्पूर्ण लोकोंको प्रज्वलित मुखोंद्वारा ग्रास करते हुए सब ओरसे बार-बार चाट रहे हैं, हे विष्णो! आपका भयानक प्रकाश सम्पूर्ण जगत्को तेजके द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।
श्लोक- 31
आख्याहि, मे, कः, भवान्, उग्ररूपः, नमः, अस्तु, ते, देववर, प्रसीद, विज्ञातुम्,
इच्छामि, भवन्तम्, आद्यम्, न, हि, प्रजानामि, तव, प्रवृत्तिम्।।31।।
अनुवाद: (मे) मुझे (आख्याहि) बतलाइये कि (भवान्) आप (उग्ररूपः) उग्ररूपवाले (कः) कौंन हैं? (देववर) हे देवोंमें श्रेष्ठ! (ते) आपको (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो आप (प्रसीद) प्रसन्न होइये। (आद्यम्) आदियम अर्थात् पुरातन काल (भवन्तम्) आपको मैं (विज्ञातुम्) विशेषरूपसे जानना (इच्छामि) चाहता हूँ (हि) क्योंकि मैं (तव) आपकी (प्रवृत्तिम्) प्रवृत्तिको (न) नहीं (प्रजानामि) जानता। (31)
हिन्दी: मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूपवाले कौंन हैं? हे देवोंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो आप प्रसन्न होइये। आदियम अर्थात् पुरातन काल आपको मैं विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जानता।
श्लोक- 32 (श्रीकृष्ण उवाच)
कालः, अस्मि, लोकक्षयकृत्, प्रवृद्धः, लोकान्, समाहर्तुम्, इह, प्रवृत्तः,
ऋते, अपि, त्वाम्, न, भविष्यन्ति, सर्वे, ये, अवस्थिताः, प्रत्यनीकेषु, योधाः।।32।।
अनुवाद: (लोकक्षयकृत्) लोकांेका नाश करनेवाला (प्रवृद्धः) बढ़ा हुआ (कालः) काल (अस्मि) हूँ। (इह) इस समय (लोकान्) इन लोकोंको (समाहर्तुम्) नष्ट करने के लिये (प्रवृत्तः) प्रकट हुआ हूँ इसलिये (ये) जो (प्रत्यनीकेषु) प्रतिपक्षियोंकी सेनामें (अवस्थिताः) स्थित (योधाः) योद्धा लोग हैं, (ते) वे (सर्वे) सब (त्वाम्) तेरे (ऋते) बिना (अपि) भी (न) नहीं (भविष्यन्ति) रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करनेसे भी इन सबका नाश हो जायेगा। (32)
हिन्दी: लोकांेका नाश करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ। इस समय इन लोकोंको नष्ट करने के लिये प्रकट हुआ हूँ इसलिये जो प्रतिपक्षियोंकी सेनामें स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात् तेरे युद्ध न करनेसे भी इन सबका नाश हो जायेगा।
श्लोक- 33
तस्मात्, त्वम्, उत्तिष्ठ, यशः, लभस्व, जित्वा, शत्रून्,
भुङ्क्ष्व, राज्यम्, समृद्धम्, मया, एव, एते, निहताः,
पूर्वम्, एव, निमित्तमात्राम्, भव, सव्यसाचिन्।33।।
अनुवाद: (तस्मात्) अतएव (त्वम्) तू (उत्तिष्ठ) उठ! (यशः) यश (लभस्व) प्राप्त कर और (शत्रून्) शत्रुओंको (जित्वा) जीतकर (समृद्धम्) धन-धान्यसे सम्पन्न (राज्यम्) राज्यको (भुड्क्ष्व) भोग (एते) ये सब शूरवीर (पूर्वम्, एव) पहलेहीसे (मया) मेरे ही द्वारा (निहताः) मारे हुए हैं। (सव्यसाचिन्) हे सव्यसाचिन्! (निमित्तमात्राम्, एव) तू तो केवल निमित्तमात्र (भव) बन जा। (33)
हिन्दी: अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओंको जीतकर धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भोग ये सब शूरवीर पहलेहीसे मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन्! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।
श्लोक- 34
द्रोणम्, च, भीष्मम्, च, जयद्रथम्, च, कर्णम्, तथा, अन्यान्, अपि, योधवीरान्,
मया, हतान्, त्वम्, जहि, मा, व्यथिष्ठाः, युध्यस्व, जेतासि, रणे, सपत्नान्।।34।।
अनुवाद: (द्रोणम्) द्रोणाचार्य (च) और, (भीष्मम्) भीष्मपितामह (च) तथा (जयद्रथम्) जयद्रथ (च) और (कर्णम्) कर्ण (तथा) तथा (अन्यान्, अपि) और भी बहुत से (मया) मेरे द्वारा (हतान्) मारे हुए (योधविरान्) शूरवीर योद्धाओंको (त्वम्) तू (जहि) मार। (मा, व्यथिष्ठाः) भय मत कर। (रणे) युद्धमें (सपत्नान्) वैरियोंको (जेतासि) जीतेगा। इसलिए (युध्यस्व) युद्ध कर। (34)
हिन्दी: द्रोणाचार्य और, भीष्मपितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओंको तू मार। भय मत कर। युद्धमें वैरियोंको जीतेगा। इसलिए युद्ध कर।
श्लोक- 35
(संजय उवाच)
एतत्, श्रुत्वा, वचनम्, केशवस्य, कृृता×जलिः, वेपमानः, किरीटी, नमस्क ृत्वा,
भूयः, एव, आह, कृष्णम्, सग०दम्, भीतभीतः, प्रणम्य।।35।।
अनुवाद: (केशवस्य) केशवभगवान्के (एतत्) इस (वचनम्) वचनको (श्रुत्वा) सुनकर (किरीटी) मुकुटधारी अर्जुन (कृ ता×जलिः) हाथ जोड़कर (वेपमानः) काँपता हुआ (नमस्क ृत्वा) नमस्कार करके, (भूयः) फिर (एव) भी (भीतभीतः) अत्यन्त भयभीत होकर (प्रणम्य) प्रणाम करके (कृृष्णम्) भगवान् श्रीकृष्णके प्रति (सग०दम्) गदगद वाणीसे (आह) बोला -(35)
हिन्दी: केशवभगवान्के इस वचनको सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपता हुआ नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान् श्रीकृृष्णके प्रति गदगद वाणीसे बोला -
श्लोक- 36
(अर्जुन उवाच)
स्थाने, हृषीकेश, तव, प्रकीत्र्या, जगत्, प्रहृष्यति, अनुरज्यते, च,
रक्षांसि, भीतानि, दिशः, द्रवन्ति, सर्वे, नमस्यन्ति, च, सिद्धसंघाः।।36।।
अनुवाद: (हृषीकेश) हे अन्तर्यामिन्! (स्थाने) यह योग्य ही है कि (तव) आपके (प्रकीत्र्या) नाम-गुण और प्रभावके कीर्तनसे (जगत्) जगत् (प्रहृष्यति) अति हर्षित हो रहा है (च) और (अनुरज्यते) अनुरागको भी प्राप्त हो रहा है तथा (भीतानि) भयभीत (रक्षांसि) राक्षसलोग (दिशः) दिशाओंमें (द्रवन्ति) भाग रहे हैं (च) और (सर्वे) सब (सिद्धसंघा) सिद्धगणोंके समुदाय (नमस्यन्ति) नमस्कार कर रहे हैं। (36)
हिन्दी: हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम-गुण और प्रभावके कीर्तनसे जगत् अति हर्षित हो रहा है और अनुरागको भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षसलोग दिशाओंमें भाग रहे हैं और सब सिद्धगणोंके समुदाय नमस्कार कर रहे हैं।
श्लोक- 37
कस्मात्, च, ते, न, नमेरन्, महात्मन्, गरीयसे, ब्रह्मणः,
अपि, आदिकत्र्रो, अनन्त, देवेश, जगन्निवास,
त्वम्, अक्षरम्, सत्, असत्, तत्परम्, यत्।।37।।
अनुवाद: (महात्मन्) हे महात्मन्! (ब्रह्मणः) समर्थ प्रभु (अपि) भी (आदिकत्र्रो) आदिकत्र्ता भी है (च) और (गरीयसे) सबसे बड़े भी हैं (ते) आपके लिये ये (कस्मात्) कैसे (न, नमेरन्) नमस्कार न करें क्योंकि (अनन्त) हे अनन्त! (देवेश) हे देवेश! (जगन्निवास) हे जगन्निवास! (यत्) जो (सत्) सत् (असत्) असत् और (तत्परम्) उनसे परे (अक्षरम्)अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हैं, वह (त्वम्) आप ही हैं। (37)
हिन्दी: हे महात्मन्! समर्थ प्रभु भी आदिकत्र्ता भी है और सबसे बड़े भी हैं आपके लिये ये कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत् असत् और उनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हैं, वह आप ही हैं।
श्लोक- 38
त्वम्, आदिदेवः, पुरुषः, पुराणः, त्वम्, अस्य, विश्वस्य,
परम्, निधानम्, वेत्ता, असि, वेद्यम्, च, परम्, च,
धाम, त्वया, ततम्, विश्वम्, अनन्तरूप।।38।।
अनुवाद: (त्वम्) आप (आदिदेवः) आदिदेव और (पुराणः) सनातन (पुरुषः) पुरुष हैं, (त्वम्) आप (अस्य) इस (विश्वस्य) जगत्के (परम्) परम (निधानम्) आश्रय (च) और (वेत्ता) जाननेवाले (च) तथा (वेद्यम्) जाननेयोग्य और (परम्) परम (धाम) धाम (असि) हैं। (अनन्तरूप) हे अनन्तरूप! (त्वया) आपसे यह सब (विश्वम्) जगत् (ततम्) व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है। (38)
हिन्दी: आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत्के परम आश्रय और जाननेवाले तथा जाननेयोग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत् व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है।
श्लोक- 39
वायुः, यमः, अग्निः, वरुणः, शशांक, प्रजापतिः, त्वम्, प्रपितामहः, च,
नमः, नमः, ते, अस्तु, सहस्त्रकृत्वः, पुनः, च, भूयः, अपि, नमः, नमः, ते।। 39।।
अनुवाद: (त्वम्) आप (वायुः) वायु (यमः) यमराज (अग्निः) अग्नि (वरुणः) वरुण (शशांकः) चन्द्रमा (प्रजापतिः) प्रजाके स्वामी ब्रह्मा (च) और (प्रपितामहः) ब्रह्माके भी पिता हैं। (ते) आपके लिये (सहस्त्रकृत्वः) हजारों बार (नमः) नमस्कार! (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो!! (ते) आपके लिये (भूयः) फिर (अपि) भी (पुनः, च) बार-बार (नमः) नमस्कार! (नमः) नमस्कार!!(39)
हिन्दी: आप वायु यमराज अग्नि वरुण चन्द्रमा प्रजाके स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्माके भी पिता हैं। आपके लिये हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिये फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!
श्लोक- 40
नमः, पुरस्तात्, अथ, पृष्ठतः, ते, नमः, अस्तु, ते, सर्वतः, एव, सर्व,
अनन्तवीर्य, अमितविक्रमः, त्वम्, सर्वम्, समाप्नोषि, ततः, असि, सर्वः।।40।।
अनुवाद: (अनन्तवीर्य) हे अनन्त सामथ्र्यवाले! (ते) आपके लिये (पुरस्तात्) आगेसे (अथ) और (पृष्ठतः) पीछेसे भी (नमः) नमस्कार (सर्व) हे सर्वात्मन्! (ते) आपके लिये (सर्वतः) सब ओरस (एव) ही (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो क्योंकि (अमितविक्रमः) अनन्त पराक्रमशाली (त्वम्) आप (सर्वम्) सब संसारको (समाप्नोषि) व्याप्त किये हुए हैं (ततः) इससे आप ही (सर्वः) सर्वरूप (असि) हैं। (40)
हिन्दी: हे अनन्त सामथ्र्यवाले! आपके लिये आगेसे और पीछेसे भी नमस्कार हे सर्वात्मन्! आपके लिये सब ओरस ही नमस्कार हो क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप सब संसारको व्याप्त किये हुए हैं इससे आप ही सर्वरूप हैं।
श्लोक- 41- 42
सखा, इति, मत्वा, प्रसभम्, यत्, उक्तम्, हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे,
इति, अजानता, महिमानम्, तव, इदम्, मया, प्रमादात्, प्रणयेन, वा, अपि।।41।।
यत्, च, अवहासार्थम्, असत्कृतः, असि, विहारशय्यासनभोजनेषु, एकः, अथवा, अपि, अच्युत, तत्समक्षम्, तत्, क्षामये, त्वाम्, अहम्, अप्रमेयम् ।।42।।
अनुवाद: (तव) आपके (इदम्) इस (महिमानम्) प्रभावको (अजानता) न जानते हुए आप मेरे (सखा) सखा हैं (इति) ऐसा (मत्वा) मानकर (प्रणयेन) पे्रमसे (वा) अथवा (प्रमादात्) प्रमादसे (अपि) भी (मया) मैंने (हे कृष्ण) हे कृष्ण (हे यादव) हे यादव! (हे सखे) हे सखे! (इति) इस प्रकार (यत्) जो कुछ बिना सोचे समझे (प्रसभम्) हठात् (उक्तम्) कहा है (च) और (अच्युत) हे अच्युत! आप (यत्) जो मेरे द्वारा (अवहासार्थम्) विनोदके लिये (विहारशय्यासनभोजनेषु) विहार, शय्या आसन और भोजनादिमें (एकः) अकेले (अथवा) अथवा (तत्समक्षम्) उन सखाओंके सामने (अपि) भी (असत्कृतः) अपमानित किये गये (असि) हैं (तत्) वह सब अपराध (अप्रमेयम्) अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाववाले (त्वाम्) आपसे (अहम्) मैं (क्षामये) क्षमा करवाता हूँ। (41-42)
हिन्दी: आपके इस प्रभावको न जानते हुए आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर पे्रमसे अथवा प्रमादसे भी मैंने हे कृृष्ण हे यादव! हे सखे! इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे समझे हठात् कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोदके लिये विहार, शय्या आसन और भोजनादिमें अकेले अथवा उन सखाओंके सामने भी अपमानित किये गये हैं वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।
श्लोक- 43
पिता, असि, लोकस्य, चराचरस्य, त्वम्, अस्य, पूज्यः, च, गुरुः, गरीयान्,
न, त्वत्समः, अस्ति, अभ्यधिकः, कुतः, अन्यः, लोकत्रये, अपि, अप्रतिमप्रभाव।।43।।
अनुवाद: (त्वम्) आप (अस्य) इस (चराचरस्य) चराचर (लोकस्य) जगत्के (पिता) पिता (च) और (गरीयान्) सबसे बड़े (गुरुः) गुरु एवं (पूज्यः) अति पूजनीय (असि) हैं (अप्रतिमप्रभाव) हे अनुपम प्रभाववाले! (लोकत्रये) तीनों लाकोंमें (त्वत्समः) आपके समान (अपि) भी (अन्यः) दूसरा कोई (न) नहीं (अस्ति) है फिर (अभ्यधिकः) अधिक तो (कुतः) कैसे हो सकता है। (43)
हिन्दी: आप इस चराचर जगत्के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लाकोंमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।
श्लोक- 44
तस्मात्, प्रणम्य, प्रणिधाय, कायम्, प्रसादये, त्वाम्, अहम्, ईशम्, ईड्यम्,
पिता, इव, पुत्रस्य, सखा, इव, सख्युः, प्रियः, प्रियायाः, अर्हसि, देव, सोढुम्।।44।।
अनुवाद: (तस्मात्) अतऐव प्रभो! (अहम्) मैं (कायम्) शरीरको (प्रणिधाय) भलीभाँति चरणोंमें निवेदित कर (प्रणम्य) प्रणाम करके (ईड्यम्) स्तुति करने योग्य (त्वाम्) आप (ईशम्) प्रभु को (प्रसादये) प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ (देव) हे देव! (पिता) पिता (इव) जैसे (पुत्रस्य) पुत्रके (सखा) सखा (इव) जैसे (सख्युः) सखाके और (प्रियः) प्रेमी पति जैसे (प्रियायाः) प्रियतमा पत्नीके अपराध सहन करते हैं वैसे ही आप भी मेरे अपराधको (सोढुम्) सहन करने (अर्हसि) योग्य हैं। (44)
हिन्दी: अतऐव प्रभो! मैं शरीरको भलीभाँति चरणोंमें निवेदित कर प्रणाम करके स्तुति करने योग्य आप प्रभु को प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ हे देव! पिता जैसे पुत्रके सखा जैसे सखाके और प्रेमी पति जैसे प्रियतमा पत्नीके अपराध सहन करते हैं वैसे ही आप भी मेरे अपराधको सहन करने योग्य हैं।
श्लोक- 45
अदृष्टपूर्वम्, हृषितः, अस्मि, दृष्टवा, भयेन, च, प्रव्यथितम्, मनः,
मे, तत्, एव, मे, दर्शय, देवरूपम्, प्रसीद, देवेश, जगन्निवास।।45।।
अनुवाद: (अदृष्टपूर्वम्) पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूपको (दृष्टवा) देखकर (हृषितः) हर्षित (अस्मि) हो रहा हूँ (च) और (मे) मेरा (मनः) मन (भयेन) भयसे (प्रव्यथितम्) अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप (तत्) उस अपने (देवरूपम्) चतुर्भुज विष्णुरूपको (एव) ही (मे) मुझे (दर्शय) दिखलाइये। (देवेश) हे देवेश! (जगन्निवास) हे जगन्निवास! (प्रसीद) प्रसन्न होइये। (45)
हिन्दी: पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूपको देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भयसे अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णुरूपको ही मुझे दिखलाइये। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइये।
श्लोक- 46
किरीटिनम्, गदिनम्, चक्रहस्तम्, इच्छामि, त्वाम्, द्रष्टुम्, अहम्,
तथा, एव, तेन, एव, रूपेण, चतुर्भुजेन, सहस्रबाहो, भव, विश्वमूर्ते।।46।।
अनुवाद: (अहम्) मैं (तथा) वैसे (एव) ही (त्वाम्) आपको (किरीटिनम्) मुकुट धारण किये हुए तथा (गदिनम् चक्रहस्तम्) गदा और चक्र हाथमें लिये हुए (द्रष्टुम्) देखना (इच्छामि) चाहता हूँ, (विश्वमूर्ते) हे विश्वस्वरूप! (सहस्रबाहो) हे सहस्स्रबाहो! आप (तेन एव) उसी (चतुर्भुजेन रूपेण) चतुर्भुजरूपसे प्रकट (भव) होइये। (46)
हिन्दी: मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथमें लिये हुए देखना चाहता हूँ, हे विश्वस्वरूप! हे सहस्स्रबाहो! आप उसी चतुर्भुजरूपसे प्रकट होइये।
श्लोक- 47
(श्रीकृष्ण उवाच)
मया, प्रसन्नेन, तव, अर्जुन, इदम्, रूपम्, परम्, दर्शितम्, आत्मयोगात्,
तेजोमयम्, विश्वम्, अनन्तम्, आद्यम्, यत्, मे, त्वदन्येन, न, दृष्टपूर्वम्।।47।।
अनुवाद: (अर्जुन) हे अर्जुन! (प्रसन्नेन) अनुग्रहपूर्वक (मया) मैंने (आत्मयोगात्) अपनी योगशक्तिके प्रभावसे (इदम्) यह (मे) मेरा (परम्) परम (तेजोमयम्) तेजोमय (आद्यम्) सबका आदि और (अनन्तम्) सीमारहित (विश्वम्) विराट् (रूपम्) रूप (तव) तुझको (दर्शितम्) दिखलाया है (यत्) जिसे (त्वदन्येन) तेरे अतिरिक्त दूसरे किसीने (न दृृष्टपूर्वम्) पहले नहीं देखा था। (47)
हिन्दी: हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्तिके प्रभावसे यह मेरा परम तेजोमय सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझको दिखलाया है जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसीने पहले नहीं देखा था।
श्लोक- 48
न, वेदयज्ञाध्ययनैः, न, दानैः, न, च, क्रियाभिः, न, तपोभिः,
उग्रैः, एवंरूपः, शक्यः, अहम्, नृलोके, द्रष्टुम्, त्वदन्येन, कुरुप्रवीर।।48।।
अनुवाद: (कुरुप्रवीर) हे अर्जुन! (नृलोके) मनुष्यलोकमें (एवंरूपः) इस प्रकार विश्वरूपवाला (अहम्) मैं (न) न (वेदयज्ञाध्ययनैः) वेद अध्ययनसे, न यज्ञों से (न) न (दानैः) दानसे (न) न (क्रियाभिः) क्रियाओंसे (च) और (न) न (उग्रैः) उग्र (तपोभिः) तपोंसे ही (त्वदन्येन)तेरे अतिरिक्त दूसरेके द्वारा (द्रष्टुम्)देखा जा (शक्यः) सकता हूँ। (48)
हिन्दी: हे अर्जुन! मनुष्यलोकमें इस प्रकार विश्वरूपवाला मैं न वेद अध्ययनसे, न यज्ञों से न दानसे न क्रियाओंसे और न उग्र तपोंसे ही तेरे अतिरिक्त दूसरेके द्वारा देखा जा सकता हूँ।
श्लोक- 49
मा, ते, व्यथा, मा, च, विमूढभावः, दृष्टवा, रूपम्, घोरम्, ईदृक्, मम, इदम्,
व्यपेतभीः, प्रीतमनाः, पुनः, त्वम्, तत्, एव, मे, रूपम्, इदम्, प्रपश्य।।49।।
अनुवाद: (मम) मेरे (ईदृक्) इस प्रकारके (इदम्) इस (घोरम्) विकराल (रूपम्) रूपको (दृष्टवा) देखकर (ते) तुझको (व्यथा) व्याकुलता (मा) नहीं होनी चाहिये (च) और (विमूढभावः) मूढ़भाव भी (मा) नहीं होना चाहिये। (त्वम्) तू (व्यपेतभीः) भयरहित और (प्रीतमनाः) प्रीतियुक्त मनवाला होकर (तत्, एव) उसी (मे) मेरे (इदम्) इस (रूपम्) रूपको (पुनः) फिर (प्रपश्य) देख। (49)
हिन्दी: मेरे इस प्रकारके इस विकराल रूपको देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस रूपको फिर देख।
श्लोक- 50 (संजय उवाच)
इति, अर्जुनम्, वासुदेवः, तथा, उक्त्वा, स्वकम्, रूपम्, दर्शयामास, भूयः,
आश्वासयामास, च, भीतम्, एनम्, भूत्वा, पुनः, सौम्यवपुः, महात्मा।।50।।
अनुवाद: (वासुदेवः) वासुदेव भगवान्ने (अर्जुनम्) अर्जुनके प्रति (इति) इस प्रकार (उक्त्वा) कहकर (भूयः) फिर (तथा) वैसे ही (स्वकम्) अपने (रूपम्) चतुर्भुज रूपको (दर्शयामास) दिखलाया (च) और (पुनः) फिर (महात्मा) महात्मा कृृष्ण (सौम्यवपुः) सौम्यमूर्ति (भूत्वा) होकर (एनम्) इस (भीतम्) भयभीत अर्जुनको (आश्वासयामास) धीरज दिया। (50)
हिन्दी: वासुदेव भगवान्ने अर्जुनके प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूपको दिखलाया और फिर महात्मा कृृष्ण सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुनको धीरज दिया।
श्लोक- 51
(अर्जुन उवाच)
दृष्टवा, इदम्, मानुषम्, रूपम्, तव, सौम्यम्, जनार्दन,
इदानीम्, अस्मि, संवृत्तः, सचेताः, प्रकृतिम्, गतः।।51।।
अनुवाद: (जनार्दन) हे जनार्दन! (तव) आपके (इदम्) इस (सौम्यम्) अतिशान्त (मानषुम्, रूपम्) मनुष्य रूपको (दृष्टवा) देखकर (इदानीम्) अब मैं (सचेताः) स्थिर-चित्त (संवृत्तः) हो गया (अस्मि) हूँ और (प्रकृतिम्) अपनी स्वाभाविक स्थितिको (गतः) प्राप्त हो गया हूँ। (51)
हिन्दी: हे जनार्दन! आपके इस अतिशान्त मनुष्य रूपको देखकर अब मैं स्थिर-चित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ।
श्लोक- 52
(श्रीकृष्ण उवाच)
सुदुर्दर्शम्, इदम्, रूपम्, दृष्टवान्, असि, यत्, मम।
देवाः, अपि, अस्य, रूपस्य, नित्यम्, दर्शनकाङ्क्षिणः।।52।।
अनुवाद: (मम) मेरा (यत्) जो (रूपम्) चतुर्भुज रूप (दृृष्टवान्) देखा (असि) है, (इदम्) यह (सुदुर्दर्शम्) सुदुर्दर्श है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। (देवाः) देवता (अपि) भी (नित्यम्) सदा (अस्य) इस (रूपस्य) रूपके (दर्शनकांङ्क्षिणः) दर्शनकी आकाड्क्षा करते रहते हैं। (52)
हिन्दी: मेरा जो चतुर्भुज रूप देखा है, यह सुदुर्दर्श है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूपके दर्शनकी आकाड्क्षा करते रहते हैं।
श्लोक- 53
न, अहम्, वेदैः, न, तपसा, न, दानेन, न, च, इज्यया।
शक्यः, एवंविधः, द्रष्टुम्, दृष्टवान्, असि, माम्, यथा।।53।।
अनुवाद: (यथा) जिस प्रकार तुमने (माम्) मुझको (दृष्टवान्) चतुर्भुज रूप में देखा (असि) है (एवंविधः) इस प्रकार (अहम्) मैं (न) न (वेदैः) वेदोंसे (न) न (तपसा) तपसे (न) न (दानेन) दानसे (च) और (न) न (इज्यया) यज्ञसे ही (द्रष्टुम्) देखा (शक्यः) जा सकता हूँ। (53)
हिन्दी: जिस प्रकार तुमने मुझको चतुर्भुज रूप में देखा है इस प्रकार मैं न वेदोंसे न तपसे न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ।
श्लोक- 54
भक्त्या, तु, अनन्यया, शक्यः, अहम्, एवंविधः, अर्जुन।
ज्ञातुम्, द्रष्टुम्, च, तत्त्वेन्, प्रवेष्टुम्, च, परन्तप।।54।।
अनुवाद: (तु) परंतु (परन्तप) हे परन्तप (अर्जुन) अर्जुन! (अनन्यया, भक्त्या) अनन्यभक्ति के द्वारा (एवंविधः) इस प्रकार चतुर्भुज रूप में (अहम्) मैं (द्रष्टुम्) प्रत्यक्ष देखनेके लिये (च) और (तत्त्वेन) तत्वसे (ज्ञातुम्) जाननेके लिये (च) तथा (प्रवेष्टुम्) मेरे काल-जाल में भली-भाँति प्रवेश करनेके लिए (शक्यः) शक्य हूँ अर्थात् शुलभ हूँ। (54)
हिन्दी: परंतु हे परन्तप अर्जुन! अनन्यभक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूप में मैं प्रत्यक्ष देखनेके लिये और तत्वसे जाननेके लिये तथा मेरे काल-जाल में भली-भाँति प्रवेश करनेके लिए शक्य हूँ अर्थात् शुलभ हूँ।
श्लोक- 55
मत्कर्मकृत्, मत्परमः, मद्भक्तः, संगवर्जितः,
निर्वैरः, सर्वभूतेषु, यः, सः, माम्, एति, पाण्डव।।55।।
अनुवाद: (पाण्डव) हे अर्जुन! (यः) जो (मत्कर्मकृत्) मेरे प्रति शास्त्रानुकूल सम्पूर्ण कत्र्तव्य-कर्मोंको करनेवाला है, (मत्परमः) मेरे मतानुसार श्रेष्ठ (मद्भक्तः) मतावलम्बी मेरा भक्त (संगवर्जितः) आसक्तिरहित है और (सर्वेभूतेषु) सम्पूर्ण प्राणियोंमें (निर्वैरः) वैरभावसे रहित है (सः) वह (माम्) मुझको ही (एति) प्राप्त होता है। अर्थात् मेरे ब्रह्म लोक में बने महास्वर्ग में आ जाता है। जहाँ कभी.2 विष्णु रूप में यह काल दर्शन देता है। ब्रह्म काल को वास्तविक रूप में प्राप्त नहीं किया जा सकता। (55)
हिन्दी: हे अर्जुन! जो मेरे प्रति शास्त्रानुकूल सम्पूर्ण कत्र्तव्य-कर्मोंको करनेवाला है, मेरे मतानुसार श्रेष्ठ मतावलम्बी मेरा भक्त आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण प्राणियोंमें वैरभावसे रहित है वह मुझको ही प्राप्त होता है। अर्थात् मेरे ब्रह्म लोक में बने महास्वर्ग में आ जाता है। जहाँ कभी-2 विष्णु रूप में यह काल दर्शन देता है। ब्रह्म काल को वास्तविक रूप में प्राप्त नहीं किया जा सकता।
मतानुसार अर्थात् वेदों में वर्णित साधना के अनुसार {ब्रह्म साधना का मत(विचार) वेदों में वर्णन है या अब गीता जी में} जो साधक साधना करता है वह उत्तम साधक कहलाता है। क्योंकि अन्य साधना जो शास्त्रानुकूल नहीं है उसको करने वाले पापी तथा राक्षस स्वभाव के कहें हैं। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 18, 20 से 23 तक में विस्तृत विवरण कहा है तथा शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् मनमानी पूजा करना व्यर्थ है, (प्रमाण गीता जी के अध्याय 16 के श्लोक 23, 24) वह भी काल को ही प्राप्त होता है अर्थात् काल(ज्योति निरंजन) के जाल में ही रहता है। पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने की विधि से गीता बोलने वाला भगवान भी अपरिचित है। इसलिए कहा है कि तत्वदर्शी संतों को खोज(गीता अध्याय 4 श्लोक 34 तथा अध्याय18 श्लोक 62)।
अम्मा जी की यह समीक्षा के अनुसार इस अध्याय में कुल 55 श्लोक हैं। श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 11 "विश्वरूप दर्शन योग" में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि देकर अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैं। अर्जुन भगवान से निवेदन करता है कि वे अपना वास्तविक स्वरूप दिखाएँ, और भगवान उसे दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं। अर्जुन भगवान के विराट रूप में अनगिनत मुख, नेत्र, और अद्भुत आभूषण देखता है, जो उसे भय और विस्मय में डाल देता है। भगवान बताते हैं कि वे काल हैं और सभी योद्धाओं का संहारक। अर्जुन भयभीत होकर भगवान से शांत चतुर्भुज रूप में प्रकट होने की विनती करता है। भगवान समझाते हैं कि उनका विराट रूप केवल अनन्य भक्ति से ही देखा जा सकता है।
अम्मा जी की यह समीक्षा में “विश्वरूप दर्शन योग ” का यह अध्याय बताता है कि भगवान ही सृष्टि के नियंता हैं और मनुष्य केवल निमित्त है। यह अध्याय भक्तों को भगवान की अपार शक्ति और करुणा का अनुभव कराता है।
(संकलनकर्ता देवेश स्वरुप)
Monday, March 9, 2026
श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 11 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला
About डा. लोकेश शुक्ला मुख्य कार्यकारी निदेशक, इन्टरनेशनल मीडिया एडवरटाइजमेन्ट मारकेटिग प्राइवेट लिमिटेड, 40 बसंत विहार कानपुर इन्डिया पिन:208021 मो. 7505330999
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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 11
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