वकील और सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष विकास त्रिपाठी की शिकायत पर आधारित
शिकायतकर्ता का दावा: 1980 में नाम दर्ज होने के बाद 1982 में हटा दिया गया फिर 1983 में दोबारा शामिल
याचिकाकर्ता ने पूरी प्रक्रिया और इसके पीछे इस्तेमाल हुए दस्तावेजों की गहन जांच की मांग
नई दिल्ली: 21 सितम्बर 2026
दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ वोटर लिस्ट विवाद में एक अहम फैसला सुनाया है। स्पेशल जज विशाल गोगने ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली शिकायत को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने याचिकाकर्ता की रिवीजन पिटीशन (पुनरीक्षण याचिका) मंजूर कर ली है और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट भेज दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होगी।
मामले से जुड़ी मुख्य बातें और घटनाक्रम:
विवाद क्या है? यह मामला वकील और सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष विकास त्रिपाठी की शिकायत पर आधारित है। आरोप है कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल था, जबकि उन्होंने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता हासिल की थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नागरिकता मिलने से 3 साल पहले फर्जी दस्तावेजों के सहारे उनका नाम वोटर लिस्ट में दर्ज कराया गया था, जो धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला है।
उतार-चढ़ाव का आरोप: शिकायतकर्ता का दावा है कि 1980 में नाम दर्ज होने के बाद 1982 में इसे वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था और फिर 1983 में दोबारा शामिल किया गया। याचिकाकर्ता ने इसी पूरी प्रक्रिया और इसके पीछे इस्तेमाल हुए दस्तावेजों की गहन जांच की मांग की है।
मजिस्ट्रेट का पुराना आदेश क्यों रद्द हुआ? निचली अदालत (मजिस्ट्रेट कोर्ट) ने 11 सितंबर 2025 को सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को खारिज कर दिया था। इस पर सेशंस कोर्ट के स्पेशल जज ने कहा कि मजिस्ट्रेट का वह आदेश 'नॉन-स्पीकिंग' (बिना पर्याप्त कानूनी कारणों वाला) था। अदालत ने टिप्पणी की कि मजिस्ट्रेट को यह देखना चाहिए था कि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है या नहीं, लेकिन वे इसके बजाय सीधे नागरिकता और अधिकार-क्षेत्र के मुद्दे पर चले गए।
सोनिया गांधी के पक्ष का तर्क: सोनिया गांधी के वकीलों ने कोर्ट में इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा था कि यह शिकायत पूरी तरह से काल्पनिक, मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित और राजनीतिक रूप से प्रेरित है, जिसका कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के अलावा कोई ठोस आधार नहीं है।
आगे का कदम:
अदालत के इस ताजा आदेश का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सोनिया गांधी के खिलाफ आरोप साबित हो गए हैं या उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। सेशंस कोर्ट ने केवल पुराने फैसले को तकनीकी कमियों के कारण रद्द किया है। अब मजिस्ट्रेट कोर्ट 29 सितंबर 2026 को दोनों पक्षों की दलीलें नए सिरे से सुनेगा और पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मंगाने व जरूरी कानूनी प्रावधानों के तहत एक विस्तृत और कारण सहित नया आदेश पारित करेगा।
x




0 Comments