राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 6 सप्ताह के भीतर ऑडिटेड खाते और वित्तीय रिपोर्ट जमा करने का आदेश
प्रदेशों के मुख्य सचिवों को यह डेटा एकत्र कर शपथ पत्र के साथ जमा करना होगा।
मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को तय की गई है
नई दिल्ली: 22 सितम्बर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी निजी विश्वविद्यालयों के लिए एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि निजी विश्वविद्यालय मुनाफा कमाने वाली संस्थाएं नहीं हो सकतीं और इनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा के जरिए समाज की सेवा करना होना चाहिए, न कि व्यापार करना।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने 17 सितंबर 2026 को यह निर्देश जारी किया। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 6 सप्ताह के भीतर देश के सभी निजी विश्वविद्यालयों के ऑडिटेड खाते और वित्तीय रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य आदेश और दिशा-निर्देश
5 साल का वित्तीय लेखा-जोखा: सभी निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों को पिछले 5 वर्षों के ऑडिटेड वित्तीय रिकॉर्ड सार्वजनिक और कोर्ट के समक्ष पेश करने होंगे।
इन जानकारियों का करना होगा खुलासा:
फीस का ढांचा: वसूली जाने वाली फीस का पूरा विवरण।
फंड और सरप्लस का उपयोग: संस्थान द्वारा अर्जित और खर्च की गई धनराशि, साथ ही बचे हुए अतिरिक्त धन (Surplus Fund) को कहां निवेश (Invest) किया गया है।
गैर-शैक्षणिक भुगतान: ऐसे व्यक्तियों या संस्थाओं को किया गया भुगतान, जो सीधे तौर पर शिक्षा के काम से नहीं जुड़े हैं।
स्टाफ का वेतन: प्रोफेसरों, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती, उनके काम के घंटे और उन्हें दिया जाने वाला वेतन।
सरकारी लाभ: जमीन आवंटन या टैक्स में छूट जैसे सरकार से मिले फायदों का विवरण。
सीमित वित्तीय सुरक्षा कोष की छूट: अदालत ने स्पष्ट किया कि सुचारू कामकाज और स्टाफ को उचित वेतन देने के लिए विश्वविद्यालय एक उचित 'वित्तीय सुरक्षा कोष' रख सकते हैं, लेकिन इस पैसे को शिक्षा के अलावा किसी अन्य काम या निजी मुनाफे में नहीं लगाया जा सकता।
मामला कहां से शुरू हुआ?
यह पूरा मामला नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी से जुड़े एक छात्र की शिकायत और आयशा जैन की याचिका से शुरू हुआ था। हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसे व्यापक जनहित का मुद्दा माना और इसके दायरे को बढ़ाते हुए देश भर के सभी निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना, नियमन और जवाबदेही की जांच करने का फैसला किया।
केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को यह डेटा एकत्र कर शपथ पत्र के साथ जमा करना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को तय की गई है
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