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हिंदू-मुलिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द्र का बेजोड़ प्रतीक: अयोध्या का प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर और अवध के नवाब शुजाउद्दौला का गहरा ऐतिहासिक संबंध

मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को 76 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। 
मुख्य गर्भगृह में हनुमान जी अपनी माता अंजनी की गोद में बाल रूप में विराजमान
अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं को दर्शन करने से पहले  हनुमानगढ़ी में माथा टेकना अनिवार्य होता है।

कानपुर:26 सितम्बर 2026
अयोध्या:26 सितम्बर 2026
अयोध्या के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर और अवध के नवाब शुजाउद्दौला का गहरा ऐतिहासिक संबंध है। मान्यता के अनुसार, 18वीं शताब्दी में इस भव्य और किलेनुमा मंदिर परिसर का निर्माण और पुनरुद्धार नवाब शुजाउद्दौला के सहयोग से हुआ था, जो आज हिंदू-मुलिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द्र का एक बेजोड़ प्रतीक है। 
मंदिर निर्माण से जुड़ी दिलचस्प कहानीराजकुमार की असाध्य बीमारी: 17वीं-18वीं शताब्दी के दौरान हनुमानगढ़ी केवल एक ऊंचा टीला था, जहाँ एक छोटी सी मूर्ति स्थापित थी और सिद्ध संत बाबा अभयरामदास जी वहाँ पूजा-अर्चना करते थे। इसी दौरान नवाब शुजाउद्दौला के पुत्र (शहजादे) एक बेहद गंभीर और असाध्य बीमारी की चपेट में आ गए। 
हकीमों की नाकामी और बाबा का चमत्कार: जब शाही वैद्यों और हकीमों के सारे उपचार विफल हो गए, तब नवाब के हिंदू मंत्रियों की सलाह पर लाचार नवाब ने बाबा अभयरामदास जी से मदद मांगी। संत अभयरामदास जी ने हनुमान जी के चरणों का पवित्र चरणामृत और भभूत राजकुमार पर छिड़का, जिससे वे चमत्कारिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हो गए। [
खुश होकर नवाब ने बाबा से कुछ भी मांगने को कहा। एक त्यागी साधु होने के नाते बाबा ने अपने लिए कुछ न मांगकर हनुमान जी के भव्य मंदिर के लिए जगह मांगी। इसके बाद नवाब ने 52 बीघा भूमि दान की और यहाँ एक विशाल, चार कोनों वाले किलेनुमा मंदिर (गढ़ी) का निर्माण करवाया।  मंदिर की अनूठी वास्तुकला और विशेषताएंकिलेनुमा बनावट: ऊंचे स्थान पर स्थित होने और इसकी मोटी दीवारों व बुर्जों के कारण इसे "गढ़ी" (किला) कहा जाता है। 
76 सीढ़ियां: मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। 
बाल रूप के दर्शन: यहाँ मुख्य गर्भगृह में हनुमान जी अपनी माता अंजनी की गोद में बाल रूप में विराजमान हैं। 
दर्शन का नियम: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं को भगवान राम के दर्शन करने से पहले हनुमान जी की आज्ञा लेनी पड़ती है और हनुमानगढ़ी में माथा टेकना अनिवार्य होता है।
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