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मकरध्वज सिंह यादव वरिष्ठ अधिवक्ता कानपुर की सोशल मीडिया पोस्ट से:आईपीसी धारा 366 पीड़िता के बयान को आंशिक रूप खारिज और उसी बयान को धारा 376 IPC के तहत आंशिक रूप से स्वीकार करना संभव नहीं है।

कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) में इस अपराध को धारा 87 के तहत
अपराध के लिए केवल अपहरण काफी; मकसद में कामयाब हुआ या नहीं, जरूरी नहीं
अजमानती अपराध: गिरफ्तारी के बाद पुलिस थाने से जमानत नहीं कोर्ट में अर्जी देनी पड़ती है।

कानपुर:27 सितम्बर 2026
Mukurdhwaj Singh Yadav 4 मिनट पहले
आईपीसी की धारा 366 के उद्देश्य के लिए पीड़िता के बयान को आंशिक रूप से खारिज करना और उसी बयान को धारा 376 IPC के तहत आरोप साबित करने के लिए आंशिक रूप से स्वीकार करना संभव नहीं है। यदि पीड़िता का बयान पूरी तरह से विश्वसनीय और त्रुटिहीन है, तो उसे पूरी तरह से स्वीकार किया जाना चाहिए। पीड़िता के बयान का कुछ हिस्सा स्वीकार्य है और कुछ हिस्सा खारिज नहीं किया जा सकता।
 नोट: यह केवल कानूनी जागरूकता के लिए है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी करने या अवैध शारीरिक संबंध (Sexual Relations) बनाने के लिए मजबूर करने के इरादे से किए जाने वाले अपहरण (Kidnapping) या व्यपहरण (Abduction) के अपराध से संबंधित है।
नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) में इस अपराध को धारा 87 के तहत रखा गया है।
इस धारा के मुख्य प्रावधान, सजा और कानूनी प्रकृति की विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:
1. धारा 366 कब लागू होती है? (अपराध के मुख्य तत्व)
यह धारा तब लगाई जाती है जब कोई व्यक्ति किसी भी उम्र की महिला के साथ निम्नलिखित कृत्य करता है: जबरन विवाह के लिए अपहरण: महिला का अपहरण या व्यपहरण इस इरादे से करना कि उसे उसकी मर्जी के बिना किसी व्यक्ति से शादी करने के लिए मजबूर किया जा सके।
अवैध संबंधों के लिए मजबूर करना: महिला को जबरन या बहला-फुसलाकर अवैध शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर करने के इरादे से अगवा करना।दबाव या धमकी देना: आपराधिक धमकी, प्रभाव या अपने पद/अधिकार का दुरुपयोग करके किसी महिला को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए मजबूर करना ताकि उसके साथ गलत काम किया जा सके।
नोट: इस अपराध के पूरे होने के लिए केवल गलत इरादे से अपहरण करना ही काफी है; आरोपी अपने मकसद (जैसे शादी या शारीरिक संबंध) में कामयाब हुआ या नहीं, यह जरूरी नहीं है।
2. धारा 366 में सजा का प्रावधान (Punishment)
इस धारा के तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को गंभीर दंड का सामना करना पड़ता है:
कारावास: दोषी को 10 वर्ष तक की कैद (साधारण या कठोर कारावास) हो सकती है।जुर्माना: कारावास के साथ-साथ दोषी पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया जाता है।
3. कानूनी प्रकृति (Legal Nature)
भारतीय कानून के तहत धारा 366 को एक बेहद गंभीर अपराध माना गया है, जिसकी प्रकृति इस प्रकार है:
संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense): इस मामले में पुलिस को आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए किसी वारंट की आवश्यकता नहीं होती है। पुलिस सीधे शिकायत पर कार्रवाई कर सकती है।
गैर-जमानती (Non-Bailable): यह एक अजमानती अपराध है। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को पुलिस थाने से जमानत नहीं मिलती, इसके लिए कोर्ट में अर्जी देनी पड़ती है।
गैर-शमनीय (Non-Compoundable):
गैर-शमनीय (Non-Compoundable): इस अपराध में पीड़ित और आरोपी के बीच कोर्ट के बाहर आपस में कोई समझौता या राजीनामा नहीं किया जा सकता।
सुनवाई: इस मामले की सुनवाई सत्र न्यायालय (Court of Session) में की जाती है।
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