रेलवे ने कहा कि ट्रेनों को सुरक्षित चलाना प्राथमिकता देरी को सेवा में कमी नहीं माना जा सकता।
45 दिनों के भीतर ₹35,000 की राशि चुकानी होगी। नहीं तो 12% सालाना ब्याज
कानपुर: 21 सितम्बर 2026
झारखंड सरायकेला-खरसावां: 21 सितम्बर 2026
झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिला उपभोक्ता आयोग ने ट्रेन 8 घंटे 48 मिनट (528 मिनट) लेट होने पर रेलवे को एक यात्री को ₹35,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया है। 2 सितंबर 2026 को आए इस फैसले में उपभोक्ता फोरम ने रेलवे की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि यात्री ने देरी की वजह से हुए किसी वास्तविक आर्थिक नुकसान का सबूत पेश नहीं किया है।
इस मामले से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
1. क्या था पूरा मामला?यात्रा और ट्रेन: सितंबर 2024 में यात्री संजय कुमार ने टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए 12871 इस्पात एक्सप्रेस के स्लीपर क्लास की दो टिकट बुक की थीं।
देरी का विवरण: ट्रेन को सुबह 10:18 बजे टाटानगर से रवाना होकर दोपहर 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था। लेकिन ट्रेन अपने निर्धारित समय से 8 घंटे 48 मिनट की देरी से पहुंची।
शिकायत: इस लंबी देरी से परेशान होकर यात्री ने मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न का हवाला देते हुए रेलवे को कानूनी नोटिस भेजा और उपभोक्ता फोरम में ₹4.50 लाख के मुआवजे की मांग की।
2. रेलवे की दलीलें (जिन्हें कोर्ट ने खारिज किया)
मुकदमे के दौरान रेलवे ने खुद को बचाने के लिए तीन मुख्य दलीलें दी थीं, जिन्हें आयोग ने अमान्य घोषित कर दिया:
नुकसान का सबूत नहीं: रेलवे का कहना था कि सिर्फ ट्रेन लेट होने से वित्तीय नुकसान साबित नहीं होता और यात्री ने इसका कोई दस्तावेजी सबूत नहीं दिया।
अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction): रेलवे ने तर्क दिया कि इस मामले की सुनवाई उपभोक्ता अदालत में नहीं, बल्कि 'रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल' में होनी चाहिए।
सेवा में कमी नहीं: रेलवे ने कहा कि ट्रेनों को सुरक्षित चलाना उनकी प्राथमिकता है, इसलिए देरी को सेवा में कमी नहीं माना जा सकता।
3. उपभोक्ता आयोग का ऐतिहासिक फैसला
सरायकेला जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और सदस्यों ने पाया कि रेलवे यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि ट्रेन की देरी किसी ऐसी वजह से हुई थी जो उसके नियंत्रण से बाहर थी।
अदालत ने दक्षिण पूर्व रेलवे (South Eastern Railway) और इस्ट कोस्ट रेलवे (East Coast Railway) को सेवा में कमी का जिम्मेदार ठहराते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:
₹30,000 मुआवजा: यात्री को हुई शारीरिक, मानसिक और अन्य परेशानियों के लिए।
₹5,000 मुकदमा खर्च: शिकायतकर्ता के कानूनी खर्च की भरपाई के लिए।
भुगतान की समय सीमा: रेलवे को यह कुल ₹35,000 की राशि 45 दिनों के भीतर चुकानी होगी। यदि इस अवधि में भुगतान नहीं किया जाता है, तो रेलवे को 12% सालाना ब्याज भी देना होगा।
यह फैसला देश के रेल यात्रियों के अधिकारों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि कोर्ट ने साफ कर दिया कि अत्यधिक देरी होने पर बिना किसी सीधे वित्तीय नुकसान के दस्तावेज के भी यात्री मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के लिए हर्जाना पाने का हकदार है
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