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**वर्षा गीत**: संकलन: शुक्ला लोकेश

**वर्षा गीत**: संकलन: शुक्ला लोकेशलखनऊ: 17 जुलाई 2026कानपुर: 17 जुलाई 2026
बरखा ने अपने आगमन से विभिन्न भावनाएँ जगाईं, कभी हँसाने वाली तो कभी रुलाने वाली। खेतों की माटी में खुशी की लहर थी, जबकि लोग बीज बोने में व्यस्त थे। तेज़ पवन ने बहुओं की घूंघटें उड़ा दीं, और हर ओर रपटों की हलचल थी। शहर में पानी भर गया, जिससे लोग मदद के लिए चिल्लाने लगे, लेकिन नेताओं और मंत्रियों ने उनकी आवाज़ नहीं सुनी। कुदरत ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया, जिससे नदियाँ और झरने भी क्रोधित हो गए। इस जल तांडव के बीच, हर कोई चिंतित और घबराया हुआ था।
Lokesh Shukla 2 दिन
**वर्षा गीत**
बरखा ने डैने फैलाये
कहीं हँसाये कहीं रुलाये
खेतों की माटी मुस्काई
बीज बो रहे लोग-लुगाई
तेज पवन की भागदौड़ में
घूंघट उड़े, बहू शरमाई
चारो तरफ रपट की रपटें
हथिया नखत देख इतराये
कहीं हँसाये कहीं रुलाये
घर-घर घुसा शहर में पानी -
कैसे बचें, याद हो नानी
सड़कों पर नावों का खेला -
मदद-मदद की गूंजे बानी
नेता-मंत्री सुनें न कुछ भी -
चाहे जो चीखे चिल्लाये
कहीं हँसाये कहीं रुलाये
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी -
बादल-बादल छाती फाटी
नदियां-झरने क्रुद्ध हुए सब -
कुदरत ने तोड़ी परिपाटी
चारो तरफ देख जल तांडव
हर कोई मन में घबराये
कहीं हँसाये कहीं रुलाये.
Sunita Tiwari 1 दिन
रिमझिम रिमझिम बूॅंदें झरतीं
छम छमक छमक पायल बजती
मेघों ने जब जल बरसाया
छयी छयी, छप छप , बूंदे करती।
पग डारे पानी में बैठी
अपनी ही धुन में है ऐंठी
कोमल पग में माटी साने
फ़िक्र महावर की ना करती।
पैजनियाॅं की छमछम प्यारी
घुॅंघुरू की लड़ियाॅं रतनारी
तनिक घाॅंघरो लियो समेटो
शीश चुनरिया फर फर उड़ती है।
गोरे तन पर बुॅंदियाॅं दिखतीं
कमल पात पर जैसे मोती
मनवाॅं पिहू पिहू रट गाएमानवों पीहू पिहू गीतेस्वाती की है आशा करती।
©सुनीता तिवारी कानपुर
shukla123 2शुक्ल123 2 दिन
उमड़-घुमड़ कर आए बादल
उमड़-घुमड़ कर आए बादल,
वर्षा की लग गई झड़ी।
पक्षी चहके नील गगन में,
फूलों की कली खिल गई।
रिमझिम-रिमझिम पड़े फुहारें,
धरती ने शीतलता धारे।
नाचे मोर, पपीहा गाए,नाचते मोर, पपीते गाते हुए,मन में नव उमंग जगाए।
काले-काले मेघ घिरे हैं,
बिजली चमके चम-चम-चम।
नदियां, पोखरे सब भर आए,
पानी बरसे छम-छम-छम।
मेंढक करते टर-टर शोर,
बागों में झूले पड़े हैं।
हंसते-गाते सब नर-नारी,सभी पुरुष और महिलाएं हंस रहे हैं और गा रहे हैं,कागज की नाव लिए खड़े हैं।
हरी-भरी मतवाली धरती,
धान के खेत लहलहाए।
सावन की ये ठंडी हवाएं,
सबके मन को बहुत लुभाए।
वर्षा गीत से जुड़ी कुछ खास बातेंशास्त्रीय संगीत: भारतीय शास्त्रीय संगीत में वर्षा ऋतु के आगमन के लिए राग मल्हार गाने की परंपरा है।
लोकगीत: उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में सावन-भादों के महीने में कजरी और बुंदेली लोकगीत गाए जाते हैं।
बॉलीवुड गीत: हिंदी सिनेमा में भी वर्षा पर कई सदाबहार गीत बने हैं, जैसे फिल्म परख का मशहूर गाना "ओ सजना बरखा बहार आयी"
mokshमोक्ष8दिन
वर्षा गीतरिमझिम रिमझिम बरसत सावन,
घन घोर घिर आए आसमां।
धरती प्यासी तृप्त हुई आज,
सोंधी मिट्टी की महक महकां। ओ रे बरखा, ओ रे मेहा,
फुहारों में नाच उठा जहां।
हरे-भरे खेत, नदियां उमड़ें,
सावन की रागिनी गुनगुनाएं। पेड़ों की डालियाँ झूम रही,
बूँदों का ताल हर पत्ते पर।
कोयल की कूक, मोरों का नाच,
मन में उमड़ती प्रेम की लहर। ओ रे बरखा, ओ रे मेहा,
धरती माँ को दे दो प्यार।
सूखे तालाब भर दो नयन,
हरियाली फैला दो संसार। कागज की नावें बहती नाले में,
बच्चों की हँसी गूँजती गलियों में।
मिट्टी की खुशबू याद दिलाती,
जिंदगी कितनी सुंदर है सावन में। आओ मिलकर गाएँ यह गीत,
बरसात की हर बूँद को सहेजें।
जल है जीवन, जल है अमृत,
इसकी रक्षा करें, जागरूकता फैलाएँ। बारिश नहीं सिर्फ पानी है,
ये तो प्रकृति का प्यार है।
सावन आए, दिल खुश हो जाए,
धरती हरे-भरे सपनों से सज जाए।

vijendra 2विजेंद्र 2 दिन
🌧️ वर्षा गीत
बूंदों की झड़ी लगी,
धरती ने चादर ओढ़ी हरी,
मन में उमंग, हृदय में तरंग,
सावन की रुत आई प्यारी।
मेघ गगन में नृत्य करें,
बिजली मुस्काए झूम झूम,
प्रेम की गाथा गाए पवन,
वर्षा बने जीवन का सुमन।
🌧️ आया सावन, झूझूमकर वर्षा आई 🌧️
काले-काले बादल छाए,
रिमझिम-रिमझिम सावन लाए।
तपती धरती शांत हुई अब,
बूंदों ने सुर मधुर सजाए।
डाल-डाल पर झूले डाले,
मन में छाए हर्ष निराले।
पपीहा गाए पी-पी की धुन,
कोयलिया कूक सुनाए।
हरी चुनरिया ओढ़ धरा ने,
नया रूप आज दिखाया है।
सरसर बहती ठंडी पवन ने,
तन-मन को हर्षाया है।
कागज़ की कश्ती पानी में,
बचपन की याद दिलाती है।
गर्म चाय और पकोड़ों की,
खुशबू घर-घर से आती है।
आओ मिलकर कदम बढ़ाएं,
वर्षा की बूंदों में भीग जाएं।
इस सावन की पावन बेला में,
सब मिलकर खुशियाँ मनाएँ!

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