अभिलाश अवस्थी की सोशल मीडिया पोस्ट से
इस्तीफा, सरकार के आत्मनिरीक्षण, कार्यो की मॉनिटरिंग, इवेल्यूएशन और इंडिकेटर्स के आधार पर नही, मजबूरी में
देश का अगला दशक, उसके छात्र बनाते
युवाओ को लामबंद कर अंतहीन निरर्थक धार्मिक-जातीय विभाजन और अस्मिता की राजनीति को साफ साफ नकारता है
मंत्रियों को जनता नही, मालिकानों से डर है। और मालिकान को परफॉर्मेंस, एफिशिएंसी, रिजल्ट नही चाहिए।
इस्तीफा, सरकार के आत्मनिरीक्षण, कार्यो की मॉनिटरिंग, इवेल्यूएशन और इंडिकेटर्स के आधार पर नही, मजबूरी में
देश का अगला दशक, उसके छात्र बनाते
युवाओ को लामबंद कर अंतहीन निरर्थक धार्मिक-जातीय विभाजन और अस्मिता की राजनीति को साफ साफ नकारता है
मंत्रियों को जनता नही, मालिकानों से डर है। और मालिकान को परफॉर्मेंस, एफिशिएंसी, रिजल्ट नही चाहिए।
कानपुर: 25 जुलाई 2026
मुंबई:25 जुलाई 2026
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पास्ट, कैन नेवर फाइट द फ्यूचर!!
अतीत कभी भी भविष्य से लड़ नहीं सकता
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इस दृश्य के तुरंत बाद, शिक्षामंत्री ने इस्तीफा दे दिया। जिस व्यक्ति को, चार साल पहले ही अक्षमता और अकर्मण्यता के लिए हटा देना चाहिए था, उसे हटाने के लिए भारत के युवा को अनशन, प्रदर्शन और खुलेआम गाली गुफ्तार पर उतरना पड़ा।
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और अब भी यह इस्तीफा, सरकार के आत्मनिरीक्षण, मंत्रिपरिषद के कार्यो की मॉनिटरिंग, इवेल्यूएशन और इंडिकेटर्स के आधार पर नही, मजबूरी में हुआ है।
यह नोट करने की बात है।
एंटायर कैबिनेट जडमूर्ख, बकलोल, घमंडी, नालायको और बेईमानो से भरी है। आप कोई भी विभाग उठाकर देख लें। और इनकी मजबूत उपस्थिति का कारण सिर्फ एक है- वफादारी।
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नेता के प्रति, पार्टी के प्रति,
आरएसएस के प्रति।
इस सरकार के मंत्रियों को जनता नही, इसके मालिकानों से डर है। और मालिकान को परफॉर्मेंस, एफिशिएंसी, रिजल्ट नही चाहिए।
तो जिस गवर्मेंट के निर्माण मे ही मेरिटोक्रेसी बुनियाद नही, उससे परफॉर्मेंस की आशा बेकार है।
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और यह आंदोलन, इस निराशा से उपजी कुंठा का विस्फोट है। यह सूचक भी है, कि जिस तरह का समाज बनाने की कोशिश आरएसएस और उसके हजारों बेनाम संगठन कर रहे थे- वह प्रोजेक्ट स्पेक्टिकुलरली फेल रहा है।
उल्टे, इसने समाज को, इन युवाओ के पीछे लामबंद कर दिया है। जो देश में अंतहीन निरर्थक धार्मिक-जातीय विभाजन और अस्मिता की राजनीति को साफ साफ नकारता है।
और वह युवा, इस मंच पर राहुल गांधी के साथ खड़ा हो गया है।
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यह तस्वीर दर्शनीय है।
एग्जेक्टली वैसी है, जैसी होनी चाहिए।
सेंटर में वे है, जो क्षुब्ध है, पीड़ित हैं, आक्रोशित हैं। राहुल किनारे हैं, हाथ बांधे, उनकी आवाज को सुनते हुए।
बिल्कुल ऐसी ही लीडरशिप चाहिए।
हमे नेता ऐसा चाहिए- जो सुने।
अटेंशन दे, इस देश के बच्चों को प्यार से निहारे।
इस पूरे आंदोलन को, एक बार भी हाईजैक करने की कोशिश राहुल ने नही की। वे जंतर मंतर नही गए, वीडियो शूट न करवाये, बड़बोल बयान न दिए।
मगर अपने राजनीतिक वजूद को चुपचाप, छात्रों के पीछे खड़ा कर दिया।
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देश का अगला दशक, उसके छात्र बनाते है।
जो शिक्षक डॉक्टर, इंजीनियर, इनोवेटर, बिजनेसमैन, सोशल साइंटिस्ट और तमाम पेशों में जाकर हिंदुस्तान को अगले स्तर पर ले जाने वाले हैं।
नेता का काम तो महज उनकी सुनना, समझना, और उसकी सफलता के लिए- जरूरी सिस्टम रास्ते साफ करना है।आने वाले कुछ दशक, (अगर राहुल की यही तासीर बनी रहे,तो) आधुनिक भारत का स्वर्णयुग हो सकते है।
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और 1990 के मंदिर मस्जिद, मुसलमान, कश्मीर, हलाला, तलाक, पाकिस्तान, नफरत और ध्वंस की राजनीति, 2026 में कर रही भाजपा, आरएसएस और उनके तमाम गुंडे संगठन - आज के बाद- भारत का पास्ट हैं।
हीन प्रतिगामी शक्तियों को मैदान छोड़ना ही होगा।बिकॉज द पास्ट,
कैन नेवर फाइट द फ्यूचर!!




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