अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता एवं सुलह परिषद (रिपब्लिक ऑफ इंडिया)
परिचयः डा . लोकेश शुक्ल पीयच . डी . (टेक) ,
                                                            अंतर्राष्ट्रीय सदस्य(UNCITRAL MODEL ACT)

    अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता एवं सुलह परिषद (रिपब्लिक ऑफ इंडिया), (IACC) कानपुर पिनः 208017 भारत में स्थित स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र वाणिज्यिक विवादों के समाधान के लिए महत्वपूर्ण सेवा संस्थान के रूप में उभरी है।  इसकी स्थापना घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी व व्यावसायिक समुदायों के संयुक्त प्रयासों का
परिणाम है। इसका प्राथमिक उद्देश्य वाणिज्यिक विवादों को अदालत से बाहर, समयबद्ध, पारदर्शी और लागत प्रभावी तरीके से सुलझाने के लिए एक विश्व स्तरीय मंच प्रदान करना है। यह परिषद विवादों को अदालत से बाहर, समयबद्ध, पारदर्शी और लागत प्रभावी तरीके से निपटाने के लिए समर्पित है।
      IACC  की कार्यप्रणाली संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग (UNCITRAL) मॉडल कानून पर आधारित है, जो इसे अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता प्रथाओं के साथ संरेखित करता है। यह दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि मध्यस्थता प्रक्रिया निष्पक्ष, न्यायसंगत और विश्व स्तर पर स्वीकार्य सिद्धांतों के अनुरूप हो। परिषद ने बहु-पक्षीय विवादों को समायोजित करने और समग्र पारदर्शिता को बढ़ाने के लिए कई आधुनिक नवाचारों को अपनाया है। ये नवाचार विवाद समाधान प्रक्रिया विशेष रूप से जटिल व्यावसायिक विवादों के संदर्भ में अधिक समावेशी और प्रभावी हैं, ।
IACC की महत्वपूर्ण विशेषता किफायती शुल्क संरचना है। विदेशी मध्यस्थता संस्थानों की तुलना में इसकी प्रशासनिक और मध्यस्थता फीस काफी कम है। यह लागत-प्रभावशीलता विशेष रूप से भारतीय कंपनियों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि
उन्हें देश के भीतर ही उच्च गुणवत्ता वाले विवाद समाधान सेवाओं तक पहुंच प्रदान करती है। यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक बाधाएं न्याय तक पहुंच में बाधा बनें, जिससे भारतीय व्यवसायों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार विवादों को सुलझाने का अवसर मिलता है।

भारत के कई उच्च न्यायालयों सहित कई भारतीय न्यायालय, विवादों को सीधे IACC के पास भेजते हैं। IACC की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता इस तथ्य से भी प्रमाणित होती है कि यह न्यायिक मान्यता परिषद की क्षमता और विशेषज्ञता में उनके विश्वास को दर्शाती है। यह न्यायिक प्रणाली पर बोझ को कम करने और विवादों के त्वरित वैश्वीकरण और बढ़ती हुई अंतर्राष्ट्रीय व्यापार गतिविधियों के साथ विभिन्न देशों के व्यवसायों के बीच विवादों का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। पारंपरिक अदालती प्रक्रियाएं विभिन्न न्यायालयों और कानूनी प्रणालियों के कारण लंबी, महंगी और जटिल होती हैं ऐसे में, मध्यस्थता और सुलह जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों का महत्व बढ़ जाता है। ये तंत्र विवादों को अधिक कुशलता से और सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने में मदद करते हैं, जिससे व्यावसायिक संबंधों को बनाए रखना आसान हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट भारत में पिछले 3 वर्षों  में 11% वृद्धि के साथ लंबित मामले 82,800 से 92,000 है जिसका मुख्य कारणजजों की कमी, जटिल प्रक्रियाएँ, बार-बार स्थगन आदी है।
भारत में हाई कोर्ट (25) कुल लंबित मामले 61.3 लाख है। सबसे अधिक लंबित इलाहाबाद हाई कोट 12.28 लाख, बॉम्बे हाई कोर्ट 6.57 लाख, राजस्थान हाई कोर्ट 6.96 लाख, मद्रास हाई कोर्ट 5.67 लाख, सबसे कम लंबित मणिपुर 5, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम 20 साल से अधिक पुराने मामले शून्य है।
      जिला एवं अधीनस्थ अदालतें कुल लंबित मामले 4.55 करोड़, सबसे अधिक बोझ उत्तर प्रदेश 1.13 करोड़ मामले, इसके बाद महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का है।
औसत निपटान समय सिविल सूट 6.4 वर्ष आपराधिक मामलों में और भी अधिक समय है।
उपरोक्त स्थिति में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता एवं सुलह परिषद आवश्यक विकल्प प्रदान करता हैं जो विवादों को तेजी से और आर्थिक रूप से हल करने में मदद करते हैं। यह व्यवसायों के लिए सहित देश के समग्र न्यायिक माहौल को भी बेहतर बनाता है, भारत में या भारतीय कंपनियो, नागरिकों के साथ विवादों को सुलझाने के लिए  विश्वसनीय सहयोग   विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है।
अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता एवं सुलह परिषद की स्थापना और उद्देश्यः
    IACC की स्थापना घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी विशेषज्ञों, व्यवसायियों और अन्य हितधारकों के सहयोगात्मक प्रयासों से हुई है। इस तरह के एक संस्थान की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत को अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के केंद्र के रूप में स्थापित करना है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
Ø विश्व स्तरीय मंच प्रदान करनाः  परिषद का लक्ष्य वाणिज्यिक विवादों के समाधान के लिए एक ऐसा मंच प्रदान करना है जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो और जहां विवादों को निष्पक्ष, कुशल और पेशेवर तरीके से हल किया जा सके।
Ø अदालत से बाहर समाधानः यह परिषद अदालती प्रक्रियाओं से हटकर मध्यस्थता और सुलह के माध्यम से विवादों को हल करने पर जोर देती है। यह दृष्टिकोण केवल समय और लागत बचाता है, बल्कि यह पक्षों के बीच गोपनीयता और लचीलेपन को भी सुनिश्चित करता है।
Ø समयबद्ध और लागत प्रभावीः परिषद विवादों को समयबद्ध तरीके से हल करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका अर्थ है कि विवादों को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर निपटाया जाता है, जिससे अनिश्चितता और व्यावसायिक नुकसान कम होते हैं। इसके साथ ही, यह लागत प्रभावी समाधान प्रदान करता है, जिससे छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए भी यह सुलभ होता है।
Ø पारदर्शिताः विवाद समाधान प्रक्रियाओं में पारदर्शिता एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। परिषद यह सुनिश्चित करती है कि उसकी प्रक्रियाएं पारदर्शी हों, जिससे सभी पक्षकारों को प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भरोसा हो।
Ø स्वतंत्रता और निष्पक्षताः एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थान के रूप में, परिषद यह सुनिश्चित करती है कि नियुक्त मध्यस्थ और सुलहकर्ता निष्पक्ष हों और किसी भी पक्ष के प्रति पूर्वाग्रह रखें। यह विश्वास मध्यस्थता और सुलह की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कार्यप्रणाली और लाभः
IACC मध्यस्थता और सुलह दोनों तरह की सेवाएं प्रदान करती है।
1. मध्यस्थता (Arbitation):  मध्यस्थता में, विवादित पक्ष एक या एक से अधिक मध्यस्थों को अपने विवाद को प्रस्तुत करते हैं। मध्यस्थ दोनों पक्षों की दलीलें सुनते हैं और साक्ष्यों की जांच करते हैं, और फिर एक बाध्यकारी निर्णय (पंचाट) देते हैं। यह निर्णय आम तौर पर अदालती फैसले की तरह ही लागू किया जा सकता है। परिषद अनुभवी मध्यस्थों का एक पैनल रखती है जो विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं।
2.सुलह (Conciliation):  सुलह एक कम औपचारिक प्रक्रिया है जहां एक सुलहकर्ता विवादित पक्षों को बातचीत के माध्यम से एक आपसी समझौते पर पहुंचने में मदद करता है। सुलहकर्ता कोई निर्णय नहीं देता, बल्कि वह केवल पक्षों को समझौते तक पहुंचने में सुविधा प्रदान करता है। यह उन मामलों के लिए उपयुक्त है जहां पक्ष अपने व्यावसायिक संबंधों को बनाए रखना चाहते हैं।
IACC कई लाभ प्रदान करती हैः
Ø विवादों का शीघ्र समाधानः  अदालती मुकदमों की तुलना में मध्यस्थता और सुलह प्रक्रियाएं बहुत तेज होती हैं।
Ø कम लागतः कानूनी शुल्क, अदालती शुल्क और अन्य संबंधित लागतें मध्यस्थता में कम होती हैं।
Ø गोपनीयताः मध्यस्थता और सुलह प्रक्रियाएं आमतौर पर गोपनीय होती हैं, जो व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण है ताकि उनकी प्रतिष्ठा और संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक हो।
Ø लचीलापनः पक्ष अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्रक्रिया को अनुकूलित कर सकते हैं, जैसे कि मध्यस्थों का चयन, प्रक्रिया के नियम और स्थान।
Ø विशेषज्ञताः परिषद विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ मध्यस्थों और सुलहकर्ताओं तक पहुंच प्रदान करती है, जिससे जटिल वाणिज्यिक मामलों को प्रभावी ढंग से हल किया जा सकता है।
Ø संबंधों का संरक्षणः  सुलह विशेष रूप से व्यावसायिक संबंधों को बनाए रखने में मदद करती है, क्योंकि यह एक सौहार्दपूर्ण समाधान पर जोर देती है।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता एवं सुलह परिषद (रिपब्लिक ऑफ इंडिया) वैश्विक स्तर पर न्यायिक विवादों के कुशल और प्रभावी सर्वागीण समाधान के लिए महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत को अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान दिलाने में मदद कर रहा है। समयबद्ध, पारदर्शी और लागत प्रभावी तरीके से विवादों को सुलझाने की अपनी प्रतिबद्धता के साथ, यह परिषद व्यवसायों के लिए आकर्षक विकल्प प्रदान करती है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समुदाय  व्यापार और निवेश के माहौल को और बढ़ावा मिलेगा। इसकी सफलता भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाके लिए भी महत्वपूर्ण है।
कानपुर में अपने प्रधान कार्यालय के अतिरिक्त कार्यालय सदस्य विश्व के विभिन्न देशों में भी सक्रिय हैं। अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति इसकी वैश्विक पहुंच और विभिन्न भौगोलिक स्थानों पर ग्राहकों की सेवा करने की क्षमता को दर्शाती है। यह भारतीय कंपनियों को अंतर्राष्ट्रीय विवादों में सहायता कर विदेशी संस्थाओं को भी भारत में या भारतीय कंपनियो, नागरिकों के साथ अपने विवादों को सुलझाने के लिए एक विश्वसनीय सहयोग प्रदान कर रहा है।