ब्रह्मा की कीली वाला ब्रह्मावर्त या बिदूर है
लव-कुश का शौर्य खुलकर सामने आया पिता का विरोध करने की परंपरा कानपुर से ही तो शुरू हुई
नगर प्रमुख का पद पूंजीपतियों को घसीट लाया
महापालिका से अपने स्वार्थों की सिद्धि की
भ्रष्टाचार को जी भर कर पनपने दिया और जनजीवन को सदा के लिए लूला-लंगड़ा बना दिया।Anoop Shukla 1 घंटे
कानुपर : कानुपर कनकैया: डॉ. देवीशंकर अवस्थी
कानपुर बहुत से हैं : आप किस कानपुर चलना चाहते हैं? टूरिस्ट गाइड की तरह बता सकता हूं कि कानपुर वह है जहां ब्रह्मा की कीली वाला ब्रह्मावर्त या बिदूर है: कतकी पूनो को वहां गंगा-स्नान करने से पुण्य-लाभ होता है। वह सृष्टि का आदि बिंदु है—आखिर ब्रह्मा की कीली तो वहीं गड़ी है—तर्क मत कीजिएगा। वहीं आदि काव्य लिखा गया था। वाल्मीकि आश्रम वहीं पर है। लव-कुश का शौर्य वहीं खुलकर सामने आया था—पिता का विरोध करने की परंपरा कानपुर से ही तो शुरू हुई थी। वहीं कहीं सीता की याद राम ने की होगी जिसे बहुत दिन बाद थोड़ी ही दूर पर कान्यकुब्ज (कन्नौज) नगर में बैठे भवभूति ने सुना था। टूरिस्ट गाइड आपको बता सकता है कि भूषण, मतिराम या चिंतामणि यहीं पैदा हुए थे। गुप्तकाल के मंदिरों के अवशेष (भितरी गांव) दिखा सकता है। पर आप जनपद नहीं शहर देखना चाहते हैं और शहर के नए होने का हाल यह है कि स्टेशन से निकलते ही सड़क हाल्सी रोड है और मुहल्ला कलक्टरगंज, फिर तो जनरल गंज, कर्नल गंज, मैकराबर्ट गंज ही नहीं मेस्टन रोड, लाटूश रोड, कंपनी बाग, परेड मैदान भी मिलेंगे। यहां तक कि डिप्टी का पड़ाव और अफ़ीम कोठी भी बताएंगे कि शहर अंग्रेजी राज की पैदावार है। इन्हीं के साथ मनीराम की बगिया होगी, लाठी मुहाल होगा, ग्वाल टोली या खटियाना या गड़रिया मोहाल होंगे, रामनारायण बाज़ार, बकरमंडी होगी, चमनगंज होगा, घुमनी मोहाल पड़ेगा और हर्ष नगर, अशोक नगर, आर्य नगर, स्वरूप नगर, किदवई नगर जैसे नवजागरण या स्वातंत्र्योत्तर काल के नाम भी होंगे ? असल में कानपुर की सही तसवीर उपस्थित करती है यह तुकबंदी जो कानपुर में भी सुनी जा सकती है और उस के आसपास के जिलों में भी : कानपुर कनकैया जेहिमां बना घाट सरसैया, ऊपर चले रेल का पहिया, नीचे बहे गंगा मैया। कानपुर ऐसा ही शहर है। ऊपर रेल का पहिया, विज्ञान का यंत्र- गति का प्रतीक चलता रहता है, पर नीचे गंगा मैया, पौराणिकता और पुरातनता का पूरा आडंबर लिए बहती रहती है। इसी गंगा में प्रतिदिन हजारों लोग अपने पापों को धोने सबेरे सबेरे जाते हैं। इसी गंगा के परमट और सरसैया घाट के किनारे सैकड़ों, हजारों भिखमंगे धर्म-भिक्षायापन कर सड़क के किनारे झोपड़ी बना कर ऐश की जिंदगी काटते हैं।
अच्छा आपको तो शहर देखना है। चलिए, रिक्शा कर लेते हैं। बसें तो यहां बहुत कम ही चलती हैं और वह भी किन्हीं विशेष सड़कों पर ही। टैक्सी भी केवल चार- छह ही हैं- महंगी भी पड़ेगी। अतः रिक्शा ही कर लेते हैं। टूरिस्ट गाइड से आप पूछ रहे हैं कि यहां दर्शनीय स्थान क्या क्या हैं? बिना सोचे टूरिस्ट गाइड कहेगा, 'कांच का मंदिर, फूल बाग, कंपनी बाग, रामदास का मंदिर, जे.के. मंदिर, कमला रिट्रीट, मोती झील। किंतु आज बृहस्पतिवार है, कमला रिट्रीट का पास तो आज मिलेगा नहीं। आपको शाम की ही गाड़ी से जाना है। मोती झील तो शाम को ही देखने योग्य होती है, अभी तो धूप बहुत है। जे.के. मंदिर भी बारह बजे बंद हो जाएगा।' तब तक शहर देखेंगे। यही कलक्टरगंज है। यह नेहरू जी की मूर्ति और फव्वारे तो इसी साल लगे हैं पहले तो सूना चौराहा था। साहब लाख मना करने पर भी ये ठेले वाले नहीं मानते। दोनों तरफ से ठेले चलने के कारण घंटों के लिए रास्ता बंद है। हम लोगों का क्या, छोटा सा रिक्शा जिधर से चाहा निकाल लिया पर इनके मारे रास्ता मिले तब न। है क्यों नहीं, पर थोड़ा चक्कर लगाना पड़ेगा। यह है बादशाही नाका यानी हाल्सी रोड, शहर की प्रमुख सड़क, व्यस्त सड़क, शहर की सब सड़कों को अपने में मिला लेती है इसीलिए हाल ही में इसके किनारे के वृक्षों को काट कर विशुद्ध सड़क बना दिया गया है। सड़क के दोनों ओर सबसे शक्तिशाली व्यापार लोहा और उसकी दुकानें। लोहे की कूटने, पटकने, तोड़ने की तीखी आवाज़, झनझनाहट से पूरी लोहाई गूंजती रहती है। सड़क के किनारे ठेले जिनमें टनों लोहा लादा जा रहा है, उतारे जा रहे हैं। वह देखिए, सड़क के किनारे पराठा वाला बैठा है। पूरे दस साल से यहीं रहता है- सड़क के ही किनारे। यहां सड़क के दोनों ओर इन ठेलों की लंबी कतार लग जाती है। इन ठेले वालों का यही घर है। रात को खाना, गाना-बजाना, नशे में झूमना, कभी-कभी जूता- लात । यह मेस्टन रोड है, पुराना शाही बाज़ार जहां हर प्रकार की सुंदर वस्तुएं मिलती हैं। बाएं हाथ अंदर हटिया बर्तन बाज़ार और पास ही तंबाकू गली है जहां तंबाकू बनाने की खटपट की ताल किसी संगीत की ताल से कम नहीं होगी। प्रयाग नारायण का मंदिर का बाज़ार एक प्रसिद्ध स्त्रियोपयोगी बाज़ार है। इसके बाद जनरल गंज का पुराना फुटकर बाज़ार, जहां क़ीमती से कीमती और सस्ता से सस्ता कपड़ा भी मिलेगा। आधुनिक साज-सज्जा से मुक्त लाला लोग यहां फ़र्श पर ही शुद्ध सफ़ेद गद्दी पर मसनद लगाए बढ़िया मलाई धोती और मलमल का शुद्ध सफ़ेद कुर्ता पहने, पान खाए दिखाई देंगे। पास ही कपड़े का थोक बाजार नौघड़ा है जिसकी गलियां अपने पतलेपन के लिए प्रसिद्ध हैं। शायद ये गलियां शुरू-शुरू में 'वन वे ट्रैफ़िक' को ही ध्यान रख कर बनाई गई होंगी। कभी जल्दी में कोशिश करने पर भी दो व्यक्ति साथ-साथ इन गलियों में नहीं घुस सकते। शक्कर पट्टी, तिलयाना, दालमंडी, बान बाज़ार, किराना बाज़ार भी यथा नाम तथा गुण के प्रतीक हैं। किंतु परेड का मैदान सार्वजनिक कार्यों में आने वाला मैदान - रामलीला, कपड़ा बाजार, पुराने कपड़ों और विभिन्न वस्तुओं का बाजार, जूता बाजार, सब्जी बाज़ार, राजनैतिक सभाएं, मज़दूर सभाएं सभी वहीं दिखाई देंगे। ठीक इसके सामने नवीन मार्केट कपड़े का आधुनिक साज-सज्जायुक्त दो मंजिला बाज़ार है। शहर के नीच में सबसे लंबी सड़क यही है जिसमें सभी प्रमुख बाज़ार, प्रमुख सिनेमाघर, होटल, रेस्त्रां आ जाते हैं। चुन्नी गंज से लेकर माल रोड तक शाम को इस सड़क पर बड़ी रौनक रहती है। जैसे रामपुरी चाकू मशहूर है, इलाहाबादी अमरूद और बनारसी पान, वैसी ख्याति थी आज से कुछ वर्ष पूर्व 'कनपुरिए' की। वह भय और आतंक के कारण सारे देश में प्रख्यात था। कुछ ऐसी सामाजिक और चारित्रिक विशिष्टताएं थीं उसमें कि लोग 'गुरु' कहा करते थे। अनाधिकारिक रूप से कानपुर के बाहर वही नगर का प्रतिनिधित्व करता था। अपराधियों का रैन बसेरा कानपुर यों भी अपराधों में अग्रणी रहा है। पुलिस के आंकड़ों के अनुसार यहां सबसे अधिक हत्याएं होती हैं। किंतु आज वह 'कनपुरिया' कहीं चिराग लेकर ढूंढ़ से भी नहीं मिलता। विगत बीस वर्षों में विभिन्न नगरों, जिलों और राज्यों से आकर बसने वाले लाखों व्यक्तियों की सांस्कृतिक विविधता का केंद्र बन जाने के कारण यह नगर अपने उस कलेवर से भी वंचित हो गया। कानपुर का अपना कोई परिवेश नहीं, न सांस्कृतिक और न धार्मिक। गंगा जी के पावन तट पर बसा होने पर भी जो तीर्थ नहीं बन सका, उत्तर प्रदेश का मैनचेस्टर होते हुए भी जो आधुनिक नहीं हो सका और श्रद्धेय गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अमर बलिदानी का साहचर्य भी जिसे राजनीतिक रूप नहीं दे पाया ऐसा संस्कारद्रोही नगर कानपुर ही है जो अपने ही कलुष और विषाद में खो गया है। गंदे हाते : 16 वर्ष पूर्व स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने यहां के गंदे एवं नर्क तुल्य हातों को देख कर इस नगर को 'जाहिल' नगर की उपाधि दी थी। एक गंदी बस्ती को देखकर उनकी आत्मा कांप उठी थी। क्रोध से उनका चेहरा तमतमा गया था। उन्होंने कहा था, 'इनमें जानवरों को भी नहीं रहना चाहिए—जलाकर इन्हें खाक कर दें।' पर वाह रे कानपुर। जिस हाते ने सारे देश को हिला कर रख दिया था, वह अपनी समस्त कुरूपता और गंदगी के साथ आज भी ज्यों-का-त्यों क्रायम है। इतिहास : इस नगर का इतिहास अधिक से अधिक 150 वर्षों के घेरे में सिमटा हुआ है। स्वातंत्र्य संग्राम के अमर सेनानी तात्या टोपे और मराठा साम्राज्य के अंतिम दीपक नानाराव पेशवा के नाम कानपुर के ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक हैं। सतीचौरा के घाट और बीबी घर में प्रतिकार की भावना से सत्ता के मद में चूर अंग्रेजों की नृशंस हत्याएं आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं।
यह 'इंडस्ट्रियल स्टेट' है। नए और पुराने कारखाने अब यहीं खोले जा रहे हैंー —शहर से काफ़ी दूर। लोहे का फर्नीचर, ताले, पेन, बर्तन, शीशा, मोटरों के छोटे-छोटे पुर्जे, लोहे के अन्य सामान आदि के कारखाने बड़ी शीघ्रता से यहां खुल रहे हैं। इस के अतिरिक्त पूरे शहर में लघु उद्योगों का जाल बिछा ही हुआ है। पीतल का छोटा-मोटा सामान, प्लास्टिक की वस्तुएं, चमड़े का सामान, रंगाई, छपाई के कारखाने, चप्पलों, साइकिलों के कारखाने, बेतरतीबी से जगह-जगह पर दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर सारा शहर औद्योगिक गतिविधियों से भरा पड़ा है। सौ वर्ष पूर्व इस नगर में सर्वप्रथम एल्गिन मिल की स्थापना हुई थी। अंग्रेज कानपुर को एक औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित करना चाहते थे। तब से अब तक हज़ारों मिल कारखाने यहां खुल गए हैं। उत्तर प्रदेश में यह उद्योगों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। यहां के मिल-कारखानों में डेढ़ लाख से भी अधिक श्रमिक काम कर रहे हैं। और यही कारण है कि अब यह नगर मुख्यतः श्रमिकों का नगर बन गया है। पंद्रह लाख की आबादी का यह नगर एक महानगर का रूप धारण करने के सपने देखने लगा है। यहां का मज़दूर पहले की अपेक्षा सुखी है। आज से बीस वर्ष पहले का मज़दूर भूख और बीमारी का प्रतीक था। जी तोड़ कर परिश्रम करने के बाद भी उसके बच्चे भूखे रहते थे। अपनी कभी न मिटने वाली थकान दूर करने तथा अपनी गरीबी पर जी- भर हंसने के लिए वह जहरीली शराब पीकर अपने आपको तबाह कर लिया करता था पर आज वैसी स्थिति नहीं है। एक जमाना वह भी था जब कानपुर ही साहित्यिक गढ़ था। पं. प्रतापनारायण मिश्र, पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्री बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', 'निराला', प्रेमचंद आदि महान साहित्यकार यहां की ही उपज कहे जाएंगे। इनमें से कुछ तो रहते भी यहीं थे और कुछ साहित्यिक क्षेत्र होने के कारण अकसर यहां आया करते थे। गोष्ठियों, विचारों का आदान-प्रदान, नौका विहार आदि होना और एक आदर्श साहित्यिक वातावरण रहता। किंतु समय का चक्र कि साहित्य के क्षेत्र में यह बिलकुल भिन्न हो गया है। पांडित्य तो यहां के हिंदी साहित्यकारों की वसीयत में ही दर्ज है। अतः उन्हें ज्ञान के क्षेत्र में भटकना और मौलिक चिंतन की प्रक्रियाओं से पुनः गुजरना ही होगा। हां, साहित्यिक समारोहों के स्थान पर 'जयंती समारोह एवं अभिनंदन पत्र भेंट' का अवश्य प्रचलन हो गया है। आए दिन अभिनंदन समारोह गूंजते हैं- साहित्यकार के स्थान पर नेता लोगों के ही सही। गोष्ठियों या सांस्कृतिक कार्यक्रमों को कभी-कभी अति आधुनिकता कह कर उड़ा दिया जाता है। कुछ दिनों से सांस्कृतिक क्षेत्र में पुनः इस ओर जागृति दिखाई दे रही है। साहित्य के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियां भी यहां कम नहीं हैं। अनेक संस्थाएं हैं- नाटक साल में पांच ही होते हैं- किंतु फिल्मी और लोकप्रिय संगीतकारों के कार्यक्रम प्रायः साल भर होते रहते हैं। लोगों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए बड़ी भूख है बल्कि अब तो यह एक फैशन हो चला है। शिक्षा : तीन प्रमुख कॉलेज दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज, क्राइस्ट चर्च कॉलेज, एस.डी. कॉलेज जो अपनी विभिन्न विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। विद्यार्थी वर्ग को काफ़ी संघर्षमय दिनों से गुजरना पड़ता है। आंदोलन, गंभीर झगड़े तो इस वर्ग का निश्चित कार्यक्रम है। वर्ष में कुछ महीनों के लिए कॉलेज तो किसी न किसी मांग को लेकर अनशन के कारण बंद ही हो जाते हैं। नवयुवक विक्षुब्ध है- बौखलाहट उसके चरित्र का स्थायी अंग बन गया है। विद्यार्थियों में नेतागीरी व्यावसायिक स्तर पर की जाने लगी है। नगर के अधिकांश कॉलेजों के संचालन सूत्र एक ही व्यक्ति के हाथ में हैं जिसके विरुद्ध प्रायः प्रतिवर्ष विद्यार्थी आंदोलन करते हैं। प्रदर्शन होते हैं और प्रबंधकों के खिलाफ जेहाद करने के लिए भी। किंतु स्कूलों तथा कॉलेजों में व्याप्त भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए प्रबंधक विद्यार्थी नेताओं को पैसे से खरीद लेते हैं। फलतः शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। प्रबंधकों की जेबें गरम हो रही हैं। स्कूल खोलना एक राजनैतिक आवश्यकता बन गया है क्योंकि प्रभाव ने साथ-साथ धनोपार्जन का भी सबसे आसान मार्ग यही है। स्कूलों तथा कॉलेजों की संख्या में नित्य प्रति उन्नति दिखाई दे रही है कितु शिक्षा के स्तर में कोई विशेष उन्नति नहीं हुई। चिकित्सा के क्षेत्र में आलम यह है कि अस्पतालों में शैय्या इतने कम हैं कि कानपुर जैसे बड़े औद्योगिक शहर की बीमारियों का सामना वे नहीं कर सकते। हालत यह है कि लोग बीमार होने पर अपने घर से ही चारपाईयां ले जाने लगे हैं। किसी नेता का जोर हो तो अवश्य अस्पताली वेड मिल सकता है। जन-जीवन जैसे मरणासन्न अवस्था में है। नया नेतृत्व पुराने' अखाड़ियों' के कारण उभर नहीं पाता। राज्य का प्रमुख और सबसे बड़ा नगर होने पर भी यहां का कोई भी प्रतिनिधि आज तक उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री का पद तक नहीं पा सका। नेताओं की पारस्परिक कटुता का राज्य के नेताओं द्वारा फायदा उठाया जाता रहा है। विगत पांच वर्षों तक नगर की सारी राजनीति महापालिका तक सीमित थी। वहां भी नगर प्रमुख का पद नागरिक जीवन में पूंजीपतियों को घसीट लाया जिन्होंने रुपए के बल पर महापालिका से अपने स्वार्थों की सिद्धि की, भ्रष्टाचार को जी भर कर पनपने दिया और जनजीवन को सदा के लिए लूला-लंगड़ा बना दिया।




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