अनूप शुक्ला महासचिव,कानपुर इतिहास समिति की सोशल मीडिया पोस्ट से
रायबरेली और उन्नाव के दो जिलों के अधिकांश को मिलाकर बनतालगभग 60 या 65 मील लंबे और 30-35 मील चौड़े क्षेत्र में यह फैला हुआ
'बैसवाड़े' का भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में एक विशिष्ट स्थान
बैसवाड़े में जैसा कि नाम से ज्ञात होता है बैस ठाकुरों (बैस) का प्राधान्य
इसी भूमि के पं. रविशंकर शुक्ल और पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र मध्य प्रांत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्रीAnoop Shukla 14 घंटे
बैसवाड़े का संक्षिप्त इतिहास
डॉ देवीशंकर अवस्थी
'बैसवाड़ा' रायबरेली और उन्नाव के दो जिलों के अधिकांश को मिलाकर बनता है। लगभग 60 या 65 मील लंबे और 30-35 मील चौड़े क्षेत्र में यह फैला हुआ है। 'बैसवाड़े' का भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में एक विशिष्ट स्थान है। हिंदी की एक शाखा 'बैसवाड़ी' इसकी प्रमुख भाषा है।
बैसवाड़े में जैसा कि नाम से ज्ञात होता है बैस ठाकुरों (बैस) का प्राधान्य है। बैसवाड़े के प्रमुख स्थान इन्हीं बैस ठाकुरों के बसाए एवं उन्नत किए हुए हैं। बैस ठाकुर ही अधिकतर जमींदार एवं ताल्लुकेदार हैं। जिनमें से प्रमुख राजा साहब मुरारमऊ, राना साहब खजूरगांव आदि हैं। यहां के एक ताल्लुकेदार लाल सुरेंद्र बहादुरसिंह कांग्रेस एम.एल.ए. भी हैं।
सदैव से देशभक्तों, दिलेरों एवं साहित्यिकों को जन्मभूमि रहा है। बैसवाड़े को महात्मा गाँधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, विनोबा भावे ने अलंकृत किया है। यहाँ की सामाजिक दशा पहले अच्छी नहीं थी। रुढ़िवादिता का बोलबाला था। यहाँ स्त्रियों पर बंधन है। आज भी औरतें पर्दे में सड़-सड़ कर मर जाती हैं। पुरुष वर्ग स्त्री जाति के लिए निर्दय और कठोर है। स्त्री किसी मर्ज से पीड़ित है, पुरुष परवाह नहीं करता।
पुरुष के स्त्री-जाति पर जुल्मों की कहानी कहां तक कही जाए। ब्राह्मण यहां तक कहते पाए गए हैं- 'मेहरिया तो पायन कै पनही आय, जब चाहे तब उतारि लेव और पहिरि लेव'। इधर कुछ दिनों से अब कहीं-कहीं लड़कियों की शिक्षा की ओर ध्यान दिया जाने लगा है और शायद कुछ दिनों में और दकियानूसी विचारों के बड़े बूढ़ों के न रहने पर इस क्षेत्र में स्त्री जाति के साथ न्याय हो।
खेती के सिवा यहां अन्य कोई रोजगार नहीं। मिल तथा कल-कारखाने न होने से मजदूर वर्ग बड़े शहरों में चला गया है, इसलिए अब मजदूरों के अभाव में खेती भी अच्छी नहीं होती। यही कारण है कि बैसवाड़े में अन्न का उत्पादन काफ़ी कम हो गया है। कपड़ा, गल्ला तथा अन्य चीजों का जो थोड़ा बहुत व्यापार होता है, वह सब प्रायः ब्राह्मणों के हाथ में है। और ये ब्राह्मण बनियों से भी अधिक बेईमान हैं। अब तो ब्राह्मण जमींदार भी हो गए हैं और ये क्षत्रियों से भी अधिक क्रूर हैं। रायबरेली और उन्नाव के बीच मिलों तथा कारखानों की आवश्यकता है। हमारा ख्याल है कि सरकार की ओर से भी इस ओर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। कृषि प्रधान होने के कारण यदि कपास की खेती को प्रोत्साहन दिया जाए, तो यहां एक-दो कपड़े की मिलें हो सकती हैं, गन्ने की खेती बढ़ाई जाए तो शक्कर की मिल हो सकती हैं। अगर तालुकेदारी से हाथ धोने के बाद तालुकेदार अपने मुआवजे की रकम इस काम में लगा दें, तो उनके धन का ही सदुपयोग हो जाए और निर्धनता भी मिट जाए। चूंकि कानपुर से रायबरेली के लिए चौबीस घंटे में एक ही बार ट्रेन का आवागमन है, इसलिए भी यह क्षेत्र व्यापार व्यवसाय में बहुत पिछड़ा हुआ है। इतने बड़े भूभाग में एक भी बड़ी और पक्की सड़क नहीं। कानपुर से रायबरेली तक जो सड़क बनाई गई है, वह इतनी गई-गुजरी है कि उस पर आसानी से बसों या ट्रकों का आवागमन नहीं हो सकता। यातायात की असुविधा इस क्षेत्र को और भी पीछे घसीटे हुए है। राजनीतिक कार्यों में भी यह क्षेत्र उतना प्रगतिशील * नहीं है। भले ही इसी भूमि के पं. रविशंकर शुक्ल और पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र मध्य प्रांत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री हों, पर वे अपनी जन्मभूमि के लिए किस काम के हैं। ऐसे ही अनेक योग्य व्यक्ति बाहर चले गये हैं। गांवों में शायद ही कोई योग्य व्यक्ति रह गया हो, यही कारण है कि बैसवाड़े के गांव बहुत पिछड़े हुए हैं। हम यह मानते हैं कि भारत की स्वाधीनता प्राप्त करने में बैसवाड़ा किसी से पीछे नहीं रहा - सन् 1857 से अब तक बड़ा त्याग और कुर्बानी की गई है, किंतु स्वाधीनता की झलक शायद ही किसी गांव में देखने को मिले। बैसवाड़े की शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उन्नति करने की बहुत बड़ी समस्या है। निकट भविष्य में पंचायती राज होगा, लेकिन बैसवाड़ा अपनी वर्तमान दयनीय दशा में शायद ही पंचायती राज्य का सुख उपभोग कर सके। सरकार को इस भूभाग के हर पहलू पर विशेष ध्यान देना होगा। जमींदारों को संख्या अधिक होने से पंचायत राज्य का सुचारु रूप से संचालन भी टेढ़ी खीर है। अगरजमींदारों ने अपनी मनोवृत्ति में परिवर्तन न किया तो उनकी जमींदारी छिन जाने पर उल्टा ही परिणाम होगा। अतः बहुत भय है कि ये जमींदार अपने साथ सारे बैसवाड़े को न ले डूबें। समझदार जमींदारों को अपनी जमींदारी का मोह छोड़कर अपने पूर्वजों के आदर्श पर चलकर गांवों की सुख-शांति के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। इसी में बैसवाड़े की उन्नति और समृद्धि है।
बैसवाड़े की पावन भूमि में आज के कई धुरंधर राजनीतिज्ञ भी उत्पन्न हुए हैं। मध्य प्रांत के प्रधानमंत्री माननीय पंडित रविशंकर शुक्ल एवं गृहमंत्री पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र को पैदा करने का गौरव बैसवाड़े ही को है।
बैसवाड़े के एक और सुप्रसिद्ध रूप को कविवर श्रीयुत ओंकारनाथ जी पांडेय ही के शब्दों में पढ़िए :
तोता मैना आहिन ना
पढ़ें कहौ कइसे पढ़ी।
खोपरी खपोवे का,
रटबु जाय भारे मां ॥
खेती पाती करै कौन
काजु काछी कुरमिन क्यार।
बनिया न बाटू,
पेरे को कवारे मां ॥
चारि मास आम खाव,
चार अंठुली चबाव।
चारि मास बीत जइहें,
ससुरारि के सहारे मां ॥
करित नाहीं ठठ्ठा,
हम घोटित सिलबट्टा।
बातें गढ़ित गट्टा ऐसी,
रहित बैसवाड़े मां ॥
यही है जग जाहिर, जहान में बैसवारे का संक्षिप्त परिचय।
'जय बैसवारा' - जय-हिंद
(दैनिक विश्वमित्र, दिसम्बर 1950)




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