मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार को आदेश
चार हफ्तों के भीतर ₹10 लाख की अतिरिक्त राशि दी
असाधारण पारिवारिक पेंशन का लाभ
आदेश संविधान के अनुच्छेद 142: असाधारण शक्ति: 'पूर्ण न्याय' के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री पारितकानपुर: 11 अगस्त 2026
नई दिल्ली: 11 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट का प्रमुख निर्णय
शौर्य चक्र विजेता मोहन सिंह केस
मोहन सिंह, जनरल रिज़र्व इंजीनियरिंग फोर्स (GREF) में कार्यरत थे और 2001 में भारत-चीन सीमा पर सड़क निर्माण के दौरान साथियों की जान बचाते हुए शहीद हुए।
जनरल रिज़र्व इंजीनियरिंग फोर्स (GREF) के ओवरसियर स्वर्गीय मोहन सिंह का बलिदान देश के प्रति अदम्य साहस का प्रतीक है। उनसे जुड़ी कुछ बेहद महत्वपूर्ण और हालिया घटनाक्रम की जानकारियां निम्नलिखित हैं: सर्वोच्च बलिदान (10 जुलाई 2000): मोहन सिंह अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा के पास रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 'हयालियांग-मेतांगलियांग-छागलोहागम' सड़क निर्माण की देखरेख कर रहे थे। काम के दौरान पहाड़ की चोटी से भारी मलबे और विशाल चट्टानों को नीचे गिरते देख उन्होंने तुरंत अपनी जान की परवाह न करते हुए बुलडोजर और मशीनों के ऑपरेटरों को अलर्ट किया और उनकी जान बचाई। इस दौरान वे खुद मलबे की चपेट में आ गए और करीब 70 मीटर गहरी घाटी में गिरकर शहीद हो गए।
शौर्य चक्र से सम्मान (19 अक्टूबर 2001): उनके इस अदम्य साहस और असाधारण वीरता के लिए भारत सरकार ने 19 अक्टूबर 2001 को उन्हें मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया था।
उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।
उनकी पत्नी कुलदीप कौर ने विशेष पारिवारिक पेंशन की मांग की थी, जिसे पहले खारिज कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार को आदेश दिया कि चार हफ्तों के भीतर ₹10 लाख की अतिरिक्त राशि दी जाए और असाधारण पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाए।
यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया, जिससे न्यायालय ने "सर्वोच्च बलिदान" को मान्यता दी।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 भारत के सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी लंबित मामले में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक कोई भी आदेश या डिक्री पारित करने की असाधारण शक्ति देता है, जो पूरे देश में लागू होती है।
मुख्य प्रावधान
पूर्ण न्याय की शक्ति: खंड (1) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ऐसा आदेश दे सकता है जो किसी मामले में न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हो, भले ही मौजूदा कानूनों में उसके लिए कोई स्पष्ट प्रावधान न हो।
पूरे देश में बाध्यता: इसके तहत दिया गया आदेश संपूर्ण भारत में लागू और बाध्यकारी होता है।
अन्य शक्तियाँ: खंड (2) के तहत कोर्ट को किसी व्यक्ति को हाजिर कराने, दस्तावेज मँगवाने या अपनी अवमानना की जाँच करने व दंड देने का पूरा अधिकार है।
प्रमुख उपयोग और क्षेत्र
कानूनी कमियों को भरना: जब किसी मामले में कानून या संसद के बनाए नियमों में कोई रिक्ति या कमी होती है, तब अदालत इस शक्ति का उपयोग करती है।
उनकी पत्नी कुलदीप कौर ने विशेष पारिवारिक पेंशन की मांग की थी, जिसे पहले खारिज कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार को आदेश दिया कि चार हफ्तों के भीतर ₹10 लाख की अतिरिक्त राशि दी जाए और असाधारण पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाए।
यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया, जिससे न्यायालय ने "सर्वोच्च बलिदान" को मान्यता दी।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 भारत के सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी लंबित मामले में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक कोई भी आदेश या डिक्री पारित करने की असाधारण शक्ति देता है, जो पूरे देश में लागू होती है।
मुख्य प्रावधान
पूर्ण न्याय की शक्ति: खंड (1) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ऐसा आदेश दे सकता है जो किसी मामले में न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हो, भले ही मौजूदा कानूनों में उसके लिए कोई स्पष्ट प्रावधान न हो।
पूरे देश में बाध्यता: इसके तहत दिया गया आदेश संपूर्ण भारत में लागू और बाध्यकारी होता है।
अन्य शक्तियाँ: खंड (2) के तहत कोर्ट को किसी व्यक्ति को हाजिर कराने, दस्तावेज मँगवाने या अपनी अवमानना की जाँच करने व दंड देने का पूरा अधिकार है।
प्रमुख उपयोग और क्षेत्र
कानूनी कमियों को भरना: जब किसी मामले में कानून या संसद के बनाए नियमों में कोई रिक्ति या कमी होती है, तब अदालत इस शक्ति का उपयोग करती है।




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