मेरी अपनी काव्य-यात्रा उनके गीतों की छाया में ही पली-बढ़ी
पैंतालीस वर्षों की काव्य-साधना की सघन झलक उन्होंने कृति में प्रस्तुत हैकानपुर: 11 अगस्त 2026
डॉ. मुकेश कुमार सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट से
‘ ज़िंदगी गीत है’ : सामाजिक सरोकार और समकालीन परिस्थितियों की सामर्थ्य अभिव्यक्ति
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— डॉ. मुकेश कुमार सिंह
देश के प्रसिद्ध नवगीतकार श्री जयराम जय के गीत-नवगीत संग्रह ‘ज़िंदगी गीत है’ को पढ़ने का अवसर मिला। आदरणीय जयराम सिंह जय से मेरा लगभग दो दशकों का आत्मीय संबंध है। यूँ कहें कि मेरी अपनी काव्य-यात्रा उनके गीतों की छाया में ही पली-बढ़ी है, तो किसी को आपत्ति नहीं होगी। लगभग चार-पैंतालीस वर्षों की अपनी काव्य-साधना की एक सघन झलक उन्होंने इस कृति में प्रस्तुत की है। निश्चय ही उनकी रचनात्मक यात्रा में अभी बहुत कुछ आना शेष है।
कवि जयराम सिंह ‘जय’ अपने गीतों में बेबाक दिखाई देते हैं। फिर वह चाहे प्रकृति का चित्रण हो, सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति हो अथवा व्यवस्था के प्रति आक्रोश—उनकी दृष्टि कहीं भी अपनी संवेदना और सजगता नहीं खोती। माँ वाणी की वंदना करते हुए वे लिखते हैं—
“ अगम अभावों की चादर को
तान-तान कर सोए अब तक।
भीड़ भरे इस कोलाहल में
जाने क्या-क्या खोए अब तक।”
मानव कभी-कभी अभावों को अपनी निष्क्रियता का आधार बना लेता है। कवि माँ वाणी से ऐसी स्थिति से उबरने की प्रेरणा चाहते हैं।
मातृ-वंदना को अत्यंत पवित्र और पूज्य भावभूमि से जोड़ते हुए वे कहते हैं—
“ माँ जैसा इस दुनिया में है
और नहीं दूजा,
इसलिए माँ के चरणों की
होती है पूजा ।”
माँ के हृदय की कोमलता, विशालता और त्याग को कवि ने इस गीत में अत्यंत सहजता से जीवंत कर दिया है।
कवियों ने माँ पर बहुत कुछ लिखा है, लेकिन जयराम ‘जय’ ने पिता के कर्तव्यनिष्ठ और वात्सल्यपूर्ण प्रेम को भी बड़ी आत्मीयता से गीत में ढाला है—
“ पिता हमारे साथ हमेशा
अब भी रहते हैं,
उनके रहते किसी की हिम्मत
जो हमको छू ले।
उनकी मीठी यादों को हम
कभी नहीं भूले,
सुख-सुविधाएँ हमको देकर
दुख खुद सहते हैं ।”
जयराम ‘जय’ ऐसे घर की भी कल्पना करते हैं, जिसकी छत और दीवारें संकल्पों की हों तथा जिसकी चुनाई नेह की ईंटों से हुई हो। उनकी लेखनी सहजता से अध्यात्म की ओर मुड़ती दिखाई देती है। जीवन की क्षणभंगुरता को वे इस तरह अभिव्यक्त करते हैं—
“ वह देखो-देखो हृदय-मुकुर,
दो दिन का जीवन क्षणभंगुर ।”
यहाँ हृदय को दर्पण के रूपक से जोड़ते हुए कवि भारतीय जीवन-दर्शन की उस अनुभूति तक पहुँचते हैं, जहाँ संसार की नश्वरता और मन की चंचलता एक-दूसरे में प्रतिबिंबित होती दिखाई देती है।
कवि यह भी स्पष्ट करते हैं कि जीवन में सुखद अनुभूतियों का प्रकाश है तो दुखों का घना अंधकार भी। फिर उन्होंने गीत को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम क्यों चुना? इस भावभूमि को वे कहते हैं—
“ छटपटाती भावनाएँ,
नेह वाली कामनाएँ
अब न थमती दिख रही हैं,
स्वप्न देखी वर्जनाएँ ।”
आज के तकनीक-प्रधान और अर्थ-केंद्रित समय की विवशताओं तथा उससे उपजे संत्रास को भी कवि ने गीत का विषय बनाया है—
“ सबने अपनी राह में हैं
बो दिए काँटे,
दर्द सबका कौन अब बाँटे।”
तकनीकी युग ने जहाँ मनुष्य को सुविधाएँ दी हैं, वहीं रिश्तों की आत्मीयता को भी कहीं-कहीं कमजोर किया है। इस बदलते संबंध-बोध को कवि बड़ी सटीकता से पकड़ते हैं—
“ औपचारिक हो गए हैं
आजकल रिश्ते,
ढूँढ़ने जाना कहाँ है,
सब यहीं दिखते ।”
कृति का शीर्षक ‘ज़िंदगी गीत है’ भी वस्तुतः इसी जीवन-दर्शन को रेखांकित करता है। कवि के लिए गीत केवल छंदबद्ध अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का स्वाभाविक स्पंदन है—
“हम सभी हैं अधूरे बिना मीत के,
भाव होते न पूरे बिना गीत के।”
यह भी उल्लेखनीय है कि जयराम ‘जय’ केवल सामाजिक सरोकारों या व्यवस्था-विमर्श के कवि नहीं हैं; प्रकृति और प्रेम की कोमल अनुभूतियाँ भी उनके गीतों में समान प्रभाव के साथ उपस्थित हैं। वर्षा की रात का उनका शब्द-चित्र देखिए—
“ वर्षा की यह रात नशीली
मन में आग लगाती है,
भूले-बिसरे मधुर पलों की
पल-पल याद दिलाती है।
यादों की बहकी पुरवाई
बारंबार बुलाती है ।”
बादल को प्रतीक बनाकर लिखा गया यह गीत भी मन को आकर्षित करता है—
“ तुम्हारे गाँव का बादल,
हमारे गाँव आता है,
बड़ी अठखेलियाँ करता हुआ
मुझको रिझाता है।
कभी वह प्यार करता है,
कभी तकरार करता है,
कभी काली घटा बनकर
सरस रसधार करता है।”
प्रिय के बिछोह की वेदना को भी कवि ने बड़ी सहजता से गीत में रूपांतरित किया है—
“ जब आती है याद तुम्हारी
मन आकुल-व्याकुल हो जाता,
जाने कहाँ-कहाँ खो जाता ।”
और आगे—
“ तुम होते यदि पास हमारे,
तो मन की बातें कह लेते।
अनमन सारा घर-आँगन है,
लगता नहीं कहीं भी मन है।
सुविधाओं की भीड़-भाड़ में
लगता सारा जग निर्जन है।”
भावुक कवि की पीड़ा अनेक रूपों में दिखाई देती है—
“ याद के बादल छाए हैं,
नयन फिर भर-भर आए हैं।
मन-मंदिर में रूप तुम्हारा
सहसा झलका,
बिना तुम्हारे भारी मन
कैसे हो हलका।”
इसी भावधारा में एक और मार्मिक अभिव्यक्ति है—
“ *महकी-महकी याद तुम्हारी
अनुरागी मन में,
छलक पड़े आँखों से आँसू,
अगन लगी तन में।”
विरहाकुल मन जब मिलन की स्मृतियों के आँगन में झाँकता है, तो शब्द कुछ इस तरह बहते हैं—
“विरहाकुल मन ताक रहा है
आएँगे बादल,
नेह-राग की पाती पाकर
गाएँगे बादल।”
जयराम ‘जय’ जब तथाकथित प्रगति के गाँव में पहुँचते हैं, तो वहाँ का बदला हुआ दृश्य उन्हें बेचैन करता है—
“ आ गए हैं हम प्रगति के
कौन-से इस गाँव में,
लग रहा बैठे यहाँ के
लोग हैं दो नाव में।
सूखी नहर पर बन गई
सड़क है चौड़ी,
भूमि उर्वर बिक रही पर
भाव है कौड़ी।
काट डाले पेड़ सब,
बैठें कहाँ अब छाँव में ।”
प्रकृति उनके लिए केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि मानवीय स्मृतियों और अनुभूतियों का संवाहक भी है। वर्षा की वही रात, जो कभी नशीली लगती है, स्मृतियों के कारण विषदंती भी हो जाती है। उसके क्षण रह-रहकर डंक मारते हैं। पूरे गीत में मन की इसी जटिल अनुभूति को जिस तरह पकड़ा गया है, वह उल्लेखनीय है। विशेष रूप से ये पंक्तियाँ मन को छूती हैं—
“ मिली न फुरसत साथ बैठ
उलझन सुझाने की,
बीत रही है उम्र उम्र से
उम्र चुराने की।”
ऐसी पंक्तियाँ यूँ ही नहीं गढ़ी जातीं; इनके पीछे दीर्घ साहित्य-साधना और जीवनानुभव की गहरी जमीन होती है।
जब रिश्तों पर बाजारवाद हावी हो जाता है तो उनका स्वरूप क्या रह जाता है, इसकी तीखी झलक कवि इन पंक्तियों में देते हैं—
“ये दुनिया बाजार है भइया,
ये दुनिया बाजार है,
मतलब के सब रिश्ते-नाते,
झूठा हर दरबार है।”
उनके नवगीतों में तल्खी भी है, लेकिन वह तल्खी सभ्यता और शब्द-मर्यादा की सीमा नहीं लाँघती। व्यवस्था पर व्यंग्य का स्वर देखिए—
“आने वाले हैं अच्छे दिन,
आने वाले हैं।
सुनते हैं अब तो अच्छे दिन
आने वाले हैं।
आखिर कब तक काम चलेगा
केवल रोटी-दाल से,
तिलक निर्धनी छूटेगा कब
लगा हमारे भाल से?
हम भी तो अब गीत प्रगति के
गाने वाले हैं।”
इसी क्रम में व्यवस्था पर एक और व्यंग्यात्मक प्रहार है—
“बनी मदारी आज व्यवस्था
और जमूरे हम,
बताओ कैसे हों दुख कम।
बहुत दिनों से सुनते ऊबे
चिकनी-चुपड़ी बातें,
किंतु अभी तक बीत न पाईं
दारुण दुख की रातें।”
जयराम ‘जय’ ने अपने नवगीतों को जनजीवन से जोड़कर उन्हें जनगीत का स्वर देने का प्रयास किया है। उनका यह गीत विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ है—
“ गाँवों की चौपालों ने
बतियाना छोड़ दिया,
इसलिए तो खुशियों ने
मुस्काना छोड़ दिया ।”
इसी तरह उनके अनेक गीत-नवगीत समाज की विसंगतियों पर सीधे प्रहार करते हैं। ‘ मत पी जहर ’, ‘ फिर से सूरज निकलेगा ’, ‘ भाव दाल का ’, ‘ रूठ गई गौरैया ’ आदि रचनाएँ अपने-अपने ढंग से समकालीन जीवन की विडंबनाओं को स्वर देती हैं।
जयराम ‘जय’ के लेखन की एक विशेषता यह भी है कि वे असहमति व्यक्त करते समय शब्दों की मर्यादा और साहित्यिक संस्कार को नहीं भूलते। मेरा स्पष्ट मानना है कि असहमति यदि स्पष्ट हो और शब्दों की मर्यादा के भीतर व्यक्त की जाए तो उसका सौंदर्य कई बार सहमति से भी अधिक प्रभावशाली हो जाता है। उनके एक गीत की ये पंक्तियाँ इसका सुंदर उदाहरण हैं—
“ कानों-कान खबर न आई,
ऐसा क्रियाकलाप हो गया।
अनायास ही मौसम बदला,
परिवर्तन चुपचाप हो गया। ”
अपने नवगीतों में वे बोझिल और घिसे-पिटे शब्दों से बचते हुए टकसाली, बोलचाल के और जनसामान्य से जुड़े शब्दों का प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ साहित्यिकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी बनाए रखती हैं। वे जानते हैं कि नवगीत को जनगीत बनाने के लिए केवल विषय की जनपक्षधरता पर्याप्त नहीं; भाषा का सहज, जीवंत और प्रभावशाली होना भी उतना ही आवश्यक है।
इस दृष्टि से ‘ज़िंदगी गीत है’ गीत-नवगीत की ऐसी कृति है जिसमें सामाजिक सरोकार, समकालीन जीवन की विसंगतियाँ, प्रेम-विरह की अनुभूतियाँ, प्रकृति-सौंदर्य, पारिवारिक संवेदना, अध्यात्म और व्यवस्था के प्रति सजग प्रतिरोध—सभी एक साथ उपस्थित हैं। जयराम ‘जय’ की रचनात्मकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे गीत-नवगीत के साथ-साथ छंदबद्ध काव्य की अन्य विधाओं में भी निरंतर सृजन करते रहे हैं। उनके सवैया और घनाक्षरी छंदों ने पाठकों और श्रोताओं के बीच अपनी पहचान बनाई है। उनके दोहे सारगर्भित, सटीक और संदेशपरक हैं तथा उन्होंने ग़ज़ल के क्षेत्र में भी लेखन किया है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि ‘ज़िंदगी गीत है’ केवल गीतों का संग्रह नहीं, बल्कि कवि की दीर्घ काव्य-साधना, जीवनानुभव और सामाजिक चेतना का दस्तावेज है। इसमें जीवन के विविध रंग हैं—सुख-दुःख, मिलन-विरह, स्मृति-विस्मृति, प्रकृति और मनुष्य, गाँव और बदलता समाज, रिश्ते और बाजार, व्यवस्था और आम आदमी—और इन सबके बीच गीत को जीवन की सार्थक अभिव्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने का सतत प्रयास है।
साहित्य-प्रेमियों और पाठकों से मेरा आग्रह है कि प्रसिद्ध नवगीतकार श्री जयराम ‘जय’ की श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा से प्रकाशित गीत-नवगीत कृति ‘ज़िंदगी गीत है’ अवश्य पढ़ें। मेरा विश्वास है कि यह कृति पाठकों की साहित्यिक जिज्ञासा और संवेदना को समृद्ध करेगी तथा उनके निजी पुस्तक-संग्रह में अपना सार्थक स्थान बनाएगी।
डॉ. प्रोफ़ेसर मुकेश कुमार सिंह: पूर्व निदेशक एवं साहित्यकार: उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्योगिकी संस्थान, सूटरगंज, कानपुर




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