आर्य समाज के गठन के साथ उनके कार्यों मे स्वरूप बंधु बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगे ।
स्वरूप परिवार के सदस्य रायबहादुर आनन्द स्वरूप डॉ० ब्रजेन्द्र स्वरूप: बाबू देवेन्द्र स्वरूप
डॉ० वीरेन्द्र स्वरूप: श्रीयुत जागेन्द्र स्वरूप: श्री नागेन्द्र स्वरूप: श्री रागेन्द्र स्वरूप
स्वरूप परिवार द्वारा शिक्षा प्रसार में लगभग ५० पब्लिक स्कूल, प्रबन्धन संस्थान और महाविद्यालय संचालित
अनूप कुमार शुक्ल की सोशल मीडिया पोस्ट से
शिक्षा प्रसारक कानपुर का "स्वरूप" परिवार
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कुलं च शीलं च बलं च यूनां
जानासि नानाभुवनागतानाम।
एषामतस्त्वं भव वावदूका
मूकायितुम क: समयस्त वायम।।
(नैषध, १०/७०)
दमयंती स्वयंवर में भगवान विष्णु भगवती सरस्वती से कहा कि तुम्हे नाना भुवनो से आने वाले राजाओं के कुल, शील, तथा बल का यथार्थत: बोध है । अत: तुम उनका वर्णन करो यह मूक होने का अवसर नहीं है । यही हमारे चरित्रनायक शिक्षा प्रसारक स्वरूप परिवार के लिए भी है ।
कानपुर में सनद प्राप्त वकीलो के प्रथम समूह में शामिल मुंशी श्यामलाल जिन्होंने कोर्ट की रुलिंगो/नजीरो का तर्जुमा "नजायर श्यामलाल" से प्रकाशित कर प्रैक्टिस को आसान बनाया था । इसके लिए उन्होंने १८८१ में परेड में लॉ प्रेस की स्थापना अपने हाते मे कोठी के पास किया था। उस हाते में मुंशी जी ने अपने बहुत से रिश्तेदारो की बसा लिया । उनमें से एक था स्वरूप परिवार । मुंशी श्यामलाल जी ने अपने बहनोई हनुमान प्रसाद जी को वर्ष १८७३ में अलीगढ़ से कानपुर बुला लिया। हनुमान प्रसाद जी के तीन पुत्र थे, आनन्द स्वरूप, सुख स्वरूप व डॉ० बृजेन्द्र स्वरूप । मुंशी श्याम लाल के हाते मे होने वाली सामाजिक गतिविधियों में स्वरूप बंधु भी शामिल होते और बाद मे आर्य समाज के गठन के साथ उनके कार्यों मे भी वह बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगे ।
रायबहादुर आनन्द स्वरूप
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वर्ष १८६७ मे अलीगढ़ में जन्मे बाबू आनन्द स्वरूप जी का आर्य समाज मेस्टन रोड और दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना में महती भूमिका रही । उन्होंने वर्ष १८८६ मे वकालत की परीक्षा पास कर कोर्ट मे प्रैक्टिस करने लगे । वर्ष १९०७ से १९१८ तक म्यूनिसिपल बोर्ड के मेम्बर रहे इसके बाद मांटफोर्ड सुधारो के अनुसार बनी प्रांतीय कौंसिल के वर्ष १९१८ मे नामित सदस्य बने। १९२० के प्रथम चुनाव मे डॉ मुरारीलाल के हट जाने से निर्विरोध निर्वाचित हो गए। वर्ष १९२३ में दूसरे चुनाव मे वह स्वराज्य पार्टी के बाबू नारायण प्रसाद अरोड़ा से ग्यारह हजार वोट से हार गए थे इसके साथ ही उन्होंने वर्ष १९२६ के चुनाव मे अपना पर्चा वापस ले लिया था। बाबू आनन्द स्वरूप जी प्रयाग विश्वविद्यालय की सीनेट मेंबर और आगरा विश्वविद्यालय मे फैकल्टी ऑफ लॉ के डीन रहे । इसके साथ ही आप कानपुर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन भी रहे । पण्डित पृथ्वीनाथ चक के जूनियर रह कर वकालत के गुर सीखे और विधि क्षेत्र मे काफी नाम कमाया । आपने कई किताबें भी लिखी कायस्थ सुधार हेतु "नालए दिल" दूसरी "सुर्मए चश्म", तीसरी "दीदए बसीरत" चौथी दायरा हकीकत है । इसके अलावा कुछ और भी छोटी मोटी किताबे है ।आप मंजी हुई उर्दू में व्याख्यान देते थे। वर्ष १९०७ मे स्वरूप परिवार सिविल लाइन्स मे गंगा के किनारे अपना ठिकाना बनाया जो आज तक बना हुआ है । बाबू आनन्द स्वरूप को ब्रिटिश सरकार द्वारा रायबहादुर का मान प्राप्त हुआ एवं आपका निधन १८ नवम्बर १९३१ को कानपुर में हुआ था ।
डॉ० ब्रजेन्द्र स्वरूप
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वर्ष १८७७ मे जन्मे बाबू ब्रजेंन्द्र स्वरूप जी ने भी अपने भाई के नक्शेकदम पर चल कर १८९९ मे वकालत की शुरुआत पण्डित पृथ्वीनाथ चक के निर्देशन में शुरू किया । वह कानपुर बार एसोसिएशन के ७ वर्ष मंत्री,१९ वर्ष उपाध्यक्ष,१७ वर्ष अध्यक्ष रहे । वर्ष १९५२ में आपके नेतृत्व में मेरठ में हुई उत्तर प्रदेश लायर्स कांफ्रेंस की अध्यक्षता आप द्वारा की गई थी । इसके साथ ही आप आगरा विश्वविद्यालय के डीन व सीनेटर भी रहे थे । ब्रजेन्द्र स्वरूप जी वर्ष १९२३ से १९३६ तक म्यूनिसपल बोर्ड के मेम्बर रहे और १९३७ से १९४० तक कानपुर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन भी रहे थे । विधान परिषद के वर्ष १९३० का चुनाव हारने के बाद वह वर्ष १९३७ का चुनाव जीते और तबसे १९५८ तक लगातार विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए थे । आपको आगरा विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ लॉ की उपाधि प्राप्त थी । आप डी ए वी ट्रस्ट , पी पी एन सोसाइटी और आर्य समाज के भी अध्यक्ष रहे थे ।आपका निधन १ अप्रैल १९५९ को कानपुर में हुआ था ।
बाबू देवेन्द्र स्वरूप
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बाबू ब्रजेन्द्र स्वरूप जी के ज्येष्ठ पुत्र देवेन्द्र स्वरूप जी का जन्म १५ अक्टूबर १९११ को हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि स्नातक देवेंद्र स्वरूप जी १९३५ मे वकालत शुरू किया । उन्होंने जनपद न्यायालय के साथ साथ उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय मे भी प्रतिनिधित्व किया था । आप पी पी एन कॉलेज मैनेजमेंट एवं डी ए वी कॉलेज ट्रस्ट और आर्य समाज के भी अध्यक्ष रहे साथ ही पूर्वजों की भांति विधान परिषद सदस्य और बार कौंसिल के उपाध्यक्ष रहे थे । आपके पुत्र शैलेंन्द्र स्वरूप व योगेन्द्र स्वरूप भी लोकप्रिय अधिवक्ताओं मे शुमार किए जाते है ।
डॉ० वीरेन्द्र स्वरूप
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बाबू ब्रजेन्द्र स्वरूप के सबसे छोटे पुत्र वीरेंद्र स्वरूप जी ने भी अपने पूर्वजों की भांति शैक्षणिक, सामाजिक और राजनैतिक कार्यों के साथ साथ शुरुआत फौजदारी वकील के रूप में की थी । वर्ष १९५५ मे वह उत्तर प्रदेश पश्चिम के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए और लगातार चुने जाते रहे इसके साथ ही वह अनेक वर्षो तक विधान परिषद अध्यक्ष भी रहे थे । शिक्षा जगत में आपकी सेवाएं बहुत ही अमूल्य रही। वह दयानन्द शिक्षा संस्थान के सर्वेसर्वा थे। उन्होंने ही अपने पिता की स्मृति दयानन्द ब्रजेन्द्रस्वरूप महाविद्यालय की स्थापना की थी । आपका निधन ५६ वर्ष की आयु में २६ फरवरी १९८० को हुआ था । आपके तीन पुत्र जागेन्द्र स्वरूप, नागेन्द्र स्वरूप व रागेन्द्र स्वरूप थे ।
श्रीयुत जागेन्द्र स्वरूप
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डॉ० वीरेन्द्र स्वरूप के ज्येष्ठ पुत्र जागेन्द्र स्वरूप ने अपने पूर्वजों की भांति ही अपने पिता की रिक्त विधान परिषद सदस्य की कुर्सी संभाली और कानपुर झांसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। बाद मे १९८६ से मृत्युपर्यन्त कानपुर उन्नाव स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित होकर विधान परिषद में प्रतिनिधित्व किया था। इसके साथ ही वह उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर भी रहे थे । जागेन्द्र स्वरूप जी के निधन के बाद उनके पुत्र मानवेन्द्र स्वरूप ने भी विधान परिषद चुनाव में हिस्सा लिया लेकिन हताशा रही। उनके द्वारा दयानन्द शिक्षा संस्थान के द्वारा शैक्षणिक सेवा दी जा रही है ।
श्री नागेन्द्र स्वरूप
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डॉ वीरेंद्र स्वरूप जी के मंझले पुत्र नागेन्द्र स्वरूप जी ने पिता की वरासत के रूप में दयानन्द शिक्षा संस्थान का कार्यभार संभाला । इसके बाद वर्ष १९९० में नागेन्द्र स्वरूप जी ने डॉ० वीरेंद्र स्वरूप एजूकेशन सेंटर की स्थापना की और पब्लिक स्कूलो की एक श्रंखला को शुरू किया गया । नागेन्द्र स्वरूप जी द्वारा डी ए वी कॉलेज, डी बी एस कॉलेज का प्रबन्धन भी देखते रहे । वर्ष निधन के बाद संस्थान के सभी दायित्व उनके पुत्र गौरवेन्द्र स्वरूप एवं पत्नी कुमकुम स्वरूप द्वारा संचालित है ।
श्री रागेन्द्र स्वरूप
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डॉ० वीरेन्द्र स्वरूप जी के कनिष्ठ पुत्र रागेन्द्र स्वरूप जी ने जून १९८१ मे अपने पिता की स्मृति में डॉ० वीरेन्द्र स्वरूप मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना कर मिशनरी स्कूलों के एकाधिकार को तोड़ते हुए आधुनिक पब्लिक स्कूलो के क्षेत्र मे प्रवेश किया गया । इस प्रकार उन्होंने डॉ० वीरेंद्र स्वरूप पब्लिक स्कूल क्रमश: सिविल लाइन्स, मैकराबर्टगंज और छावनी , गोविन्दनगर मे खोले गये साथ ही प्रबन्धन संस्थान भी खोला। रागेन्द्र स्वरूप जी राजनीति मे भी सक्रिय रहे इसके साथ ही सत्य संवाद पत्र के संपादक भी रहे थे वर्ष २००२ में उनके निधन के बाद उनके पुत्र अलक्षेन्द्र स्वरूप जो कि उपरोक्त ट्रस्ट के सचिव बने उन्होंने शैक्षणिक सुधारो के साथ ट्रस्ट के नई गति दी उनके द्वारा स्कूलों की श्रंखला को आगे बढ़ाया गया और कानपुर के अलावा लखनऊ, आगरा सहित अन्य शहरों में शाखाओ को शुरू किया गया ।
इस प्रकार स्वरूप परिवार द्वारा शिक्षा प्रसार में लगभग ५० पब्लिक स्कूल, प्रबन्धन संस्थान और महाविद्यालय संचालित है ।
सचिव,कानपुर इतिहास समिति
असिस्टेंट प्रोफेसर शा०शि०, डी बी एस कॉलेज कानपुर
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